Khoobsurat [part 117]

अपनी बेचैनी में मधुलिका ,मंकु को लेकर ताजमहल के समीप पहुंच जाती है और वहां पहुंचकर,  आस -पास देखती है ,कहीं कुमार यहाँ, हमसे पहले तो नहीं आ गया।  उसकी ताजमहल को देखने में कोई रूचि नहीं थी। एक नजर ताजमहल की तरफ डाली ,और मन ही मन सोचा -'इसे' प्यार की निशानी' कहते हैं, ,जीते जी तो वो भी इसे न देख सकी ,जिसके लिए इसे बनवाया गया था। ऐसी' प्रेम की निशानी' से क्या लाभ ?


मुझे लगता है ,कुमार भी मुझे मारकर ही दम लेगा। प्यार की यही सज़ा है ,जिसने भी सच्चा प्यार किया और निभाना चाहा ,वो सुकून से कब जिया है ? अब उसे एक-एक पल, एक-एक युग के बराबर लग रहा था प्रतीक्षा करते-करते वह परेशान हो गई थी,आस -पास लोगों को बाँहों में बांहें डालकर घूमते देखा  किन्तु उसका तो दिल रो रहा है। वहां सभी रिश्ते, उस समय उसे बनावटी नज़र आ रहे थे। 

आज इसके साथ कल को किसी और के साथ होंगे , तब उसने कुमार को फिर से फोन किया फोन की घंटी तो जा रही थी , किंतु कुमार फोन नहीं उठा रहा था, क्या करें ? घबराहट के कारण उसे रोना आ रहा था। क्या कारण हो सकता है ? वह अब फोन भी नहीं उठा रहा। एक- दो बार नहीं उसने, कई बार फोन लगाया लेकिन कुमार ने फोन नहीं उठाया। अब तो दिन भी छिपने लगा था, मैं ही गलत थी, मैंने उस पर विश्वास किया, उसने मुझे धोखा दिया है।  अब तक, वह मुझे धोखा ही देते हुए आया है। वह अवश्य ही इस लड़की से संपर्क में था, न जाने,अब वो कहां से हमारी जिंदगी में आ गई है।

अब रात्रि ,वहां तो नहीं बिता सकती थी ,इतने पैसे भी नहीं थे ,जो किसी होटल में ठहर जाती ,सोचा था ,जब कुमार साथ है तो इतने पैसे रखकर क्या करना है ? यही सोचकर निश्चिन्त थी।  वह गाड़ी करती है और घर में वापसी के लिए  प्रस्थान करती है। मन को शंकाओं ने घेर लिया था ,वे तस्वीरें भेजकर किसी ने मुझे समझाना चाहा था, लेकिन मैंने इस ओर ध्यान ही नहीं दिया था। मैंने अपना घर स्वयं ही बर्बाद किया है।आँखें आंसुओं से भर आईं किन्तु तुरंत ही उसने ,अपने आंसू पोंछ लिए।  मां का चेहरा देखकर अब मंकु भी शांत हो गया था वह भी डर गया था, उसे लग रहा था कि मम्मी अवश्य ही किसी बात को लेकर परेशान है। गाड़ी में बैठे-बैठे मां की गोद में सो गया।

एक पल को सोचा ,पुलिस में खबर कर दूँ फिर सोचा ,अभी घर की बात घर में ही रहे तो, अच्छा है। हो सकता है ,मेरे इस फैसले से कुमार नाराज हो जाये और कहे -'तुम्हें इतना तमाशा करने की क्या आवश्यकता थी ? मैं कोई बच्चा नहीं हूँ ,जो खो जाता। ''एक गहरी स्वांस ली और गाड़ी की सीट के  पीछे सिर टिकाकर ,आँखें मूंदकर अपने आपको शांत करने का प्रयास कर रही थी। 

उसकी आँखों के सामने ,वो कलाकार यामिनी बार -बार घूम रही थी ,जिसके पेट में बच्चा भी है। तभी कुमार आकर उसे बांहों में भर लेता है और दोनों अपनी ही दुनिया में मस्त हैं।कुमार उससे कह रहा था -तुम मेरे इस बच्चे का ख़्याल रखना ,यह देखकर मधुलिका की बेचैनी इतनी बढ़ गयी ,उसकी आँखें खुल गयीं। उसने गाड़ी के शीशे से बाहर झाँका ,बाजार में रौशनी थी ,अँधेरा हो चुका था। तब उसने ड्राइवर से पूछा -भइया !अभी और कितना समय लगेगा ?

मैडम !अभी एक घंटा और लग जायेगा,उसने जबाब दिया।  

 रात को लगभग 10:00 बजे वह अपने घर पहुंची, कुमार के कारण देरी हो गई थी , उसने वहां पर आने के लिए कहा था और फिर आया नहीं और जब उसे याद दिलवाने के लिए उसने फोन किया तब उसने फोन भी नहीं उठाया। मना रहा होगा'' रंग रेलिया' अपनी उस पत्नी के साथ, क्रोध तो इतना आ रहा था कि उसे फोन ही ना करें और उससे बात भी ना करें  किंतु उससे सवाल पूछना तो जरूरी था ,पूछना चाहती थी -उसने मुझे धोखा क्यों दिया और यह यामिनी उसकी पत्नी कब से बन गई ? अनेक प्रश्न उसके मन में थे जो वह कुमार से पूछना चाहती थी लेकिन कुमार नहीं आया और न ही उसने फोन उठाया। उसने मंकु को सुलाया। ससुर से खाने के लिए पूछने गयी किन्तु अब वे सो चुके थे। ये सभी ज़िम्मेदारियाँ उसे बेमानी नज़र आ रहीं थीं ,जिसके कारण ये सभी रिश्ते जुड़े हैं ,वो तो मुझे किसी अजनबी शहर में बच्चे के साथ अकेला छोड़कर न जाने कहाँ चला गया ?उसने इतना भी नहीं सोचा ,मेरी मधु उसके बिना अकेली कैसे करेगी ?

मंकु के साथ वहीँ जो खाया था ,वही खा लिया था किन्तु इतनी परेशानी में भूख किसे हैं ?वो भी अपने बेटे के साथ उसके समीप ही लेट गयी। न जाने, कब उसे नींद आई ?जब उसकी आँख खुली ,उसके फोन की घंटी बज रही थी। फुर्ती से उसने फोन उठाया ,हैलो !कहते हुए उसने घड़ी में समय देखा ,साढ़े आठ बज रहे थे। 

उधर से आवाज आई - मैं आगरा थाने से ''पुलिस इंस्पेक्टर कुणाल'' बोल रहा हूँ , क्या आप किसी ''कुमार श्रीवास्तव'' को जानती हैं ?

जी ,वो मेरे पति हैं ,घबराकर मधु ने पूछा -इंस्पेक्टर साहब !क्या बात है ?मन ही मन सोच रही थी ,शायद इन्हें 'रंग -रेलिया ''करते हुए पुलिस ने 'रंगे हाथों पकड़ लिया होगा ।''

इंस्पेक्टर ने हिचकिचाते हुए कहा -दरअसल, बात यह है, हमें यहां एक 'डेड बॉडी'' मिली है। उसके चेहरे की पहचान तो नहीं हो रही है किंतु जब उसके कपड़ों से तलाशी ली गई तो उसमें' कुमार श्रीवास्तव' नाम का कार्ड मिला है, उनके सामान की तलाशी ली गयी तो.... उनके पास से एक फोन भी मिला जिसमें इसी नंबर से बहुत सारी 'मिस कॉल 'थीं इसीलिए हमने आपको फोन लगाया। क्या मैं जान सकता हूं कि आप कौन हैं ?और आपका उनसे क्या  रिश्ता है ?

 किंतु उधर से कोई आवाज नहीं आई, वह बार-बार हेेलो! हेेलो !कर रहा था लेकिन उसे कोई जवाब नहीं मिला क्योंकि उसके इतना कहते ही ,कि उन्हें 'डेड बॉडी 'मिली है ,जिससे 'कुमार श्रीवास्तव 'जी का पता चला '' सुनते ही मधुलिका चक्कर खाकर गिर पड़ी थी। आवाज सुनकर उसका बेटा अवश्य उठ गया था उसने देखा, मम्मी जमीन पर पड़ी है। फोन पर कोई हेेलो !हेेलो कर रहा है। तब उसने फोन उठाया, और बोला -हेेलो !मैं बोल रहा हूं , अंकल आप कौन हैं ?

बेटा! यह जिसका यह फोन है, वह कौन थी ?

अंकल !वो मेरी मम्मी हैं, अभी जमीन पर सो रही है, आप मुझे बताइए ! मैं मम्मी को बता दूंगा। इंस्पेक्टर समझ गया जो महिला अभी उससे बात कर रही थी, वह शायद यह बात बर्दाश्त नहीं कर पाई तब इंस्पेक्टर ने पूछा -बेटा ! 'कुमार श्रीवास्तव' आपके कौन हैं ?

 वो मेरे पापा हैं ,मंकू ने जवाब दिया।

 आपको अपने घर का पता मालूम है, इंस्पेक्टर ने बड़े प्यार से पूछा ,वह समझ गया था, उनके घर पर विपत्ति आई है, और यह केस मुझे ही संभालना होगा। 

मंकु ने कुछ- कुछ, हा, ठीक और कुछ- कुछ न समझी जैसा जवाब दिया, जितना उसे समझ आया उसने जवाब दिया। तब  इंस्पेक्टर ने मंकु से कहा -बेटा !क्या तुम्हारी मम्मी अभी भी फर्श पर सो रहीं हैं ?

हाँ ,अंकल !अपनी माँ की तरफ देखते हुए बोला। 

अब आप रसोई में जाकर वहां से पानी लाकर अपनी मम्मी के चेहरे पर डालो ! वो उठ जाएंगीं। थोड़ी देर में हम लोग आते हैं। इंस्पेक्टर को बच्चे की बात पर विश्वास तो नहीं था किंतु मंकुने जो कुछ भी बताया उसके आधार पर वह समझ गया था कि ये लोग आगरा में घूमने के लिए आए थे और कुमार श्रीवास्तव न जाने क्यों इनसे अलग हो गया और उसके साथ न जाने कैसे ये हादसा हो गया ? मुझे तो लगता है, यह हत्या हुई है इंस्पेक्टर कुणाल ने, हवलदार रामदीन से कहा। 

सर ! यह तो स्पष्ट दिख रहा है, यह कोई दुर्घटना नहीं है, बल्कि सोची -समझी साज़िश के तहत हत्या लग रही है।  

 


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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