Khoobsurat [part 116]

यह सब क्या हो रहा है ? मधुलिका जितना कुमार पर विश्वास करने का प्रयास  करती है, उतना ही उसके विपरीत हो जाता है,जब भी सोचती है ,मैं ही गलत हूँ ,मुझे अपने पति अविश्वास नहीं करना चाहिए था किन्तु तभी कुछ न कुछ ऐसा हो जाता है ,वह अविश्वास करने पर मजबूर हो जाती है।  वह कुमार के करीब जाना चाहती है ,उससे दूर होता, नजर आता है।आज भी जैसे आँखों के समक्ष यही छुपा -छुपी का खेल चल रहा है ,वो उसके सामने नजर आते -आते, न जाने कैसे गायब हो जाता है?


अपने शक़ के चलते, वो कुमार पर निगरानी रखती है ,किन्तु जब उसे ऐसा संदेहात्मक कुछ भी नहीं लगा ,तब वो उससे मिलने जाना चाहती थी ,वह खुश थी किन्तु यहाँ आकर उसे लग रहा था, जैसे वह उससे अजनबी सी हो गई है।वह मेरे बच्चे का पिता और मेरा पति है किन्तु वो अधिकार जिससे वो कहे -'हम आपके साथ ही चलेंगे,वो अधिकार महसूस नहीं हो रहा था। ''  तभी वह फिर नजरों से ओझल हो जाता है कुछ समझ नहीं आ रहा, कहां चला गया ? तब मधुलिका सोचती है -'क्यों ना मैं, उस कलाकार से ही मिल लूँ। 

यह सोचकर वह काउंटर पर बैठी, इस लड़की से पूछती है -मुझे 'यामिनी जी' से मिलना है, वे  कहां मिलेंगीं  ?

मेेम ! वो इस तरह किसी से नहीं मिलतीं ,वैसे भी आप उनसे नहीं मिल पाएंगीं , वो अभी-अभी यहां से अपने पति के साथ गई हैं। 

कौन पति ? मन ही मन मधुलिका सोच रही थी, यह किस पति की बात कर रही है ?मुझे तो यहां कुमार के सिवा कोई भी दिखाई नहीं दिया। कहीं कुमार को.... इससे आगे वह सोच नहीं पाई।तब उसने पूछा -उनके पति का क्या नाम है ?

मैम !मुझे क्या मालूम ?हमें जितनी बातें बताई जाती हैं ,उतना ही काम करते हैं ,अब उनका पति कौन है ?उसका क्या नाम है ?हमें न ही इन बातों में रूचि है ,न ही हमने पूछा ,हम अपने काम से मतलब रखते हैं। 

अच्छा ,ये बात तो बता सकती हो, वो मैडम कहां पर रुकी हैं ? मैं स्वयं उनसे जाकर मिल लूँगी मधुलिका ने पूछा। 

आपको एक बार बता तो दिया ,मैडम !हर किसी से नहीं मिलती हैं, आपको यदि कोई पेंटिंग खरीदनी है तो आप हमसे बात कीजिए ,हम यहाँ इसीलिए बैठे हैं।  

नहीं, मुझे, 'यामिनी मैडम 'से ही मिलना है ,ज़िद करते हुए बोली। 

इनको ऐसा क्या काम आन पड़ा ?मन ही मन वो लड़की बुदबुदाई,तब वो बोली -देखिये !मैंने आपसे पहले ही कह दिया है ,मैडम, व्यक्तिगत तौर पर किसी से नहीं मिलती हैं ,यदि आपको उनके लिए कोई संदेश छोड़ना हो तो आप छोड़कर जा सकती हैं।

आप समझ नहीं रहीं हैं ,आप मेरी बात समझिये ! मेरा उनसे मिलना बहुत जरूरी है ,मधुलिका ने अपनी विवशता ज़ाहिर की। 

मधुलिका को खुशामद करते हुए देखकर, उस लड़की ने पूछा - वैसे आप,उनसे मिलना क्यों चाहती है ?क्या आप उन्हें पहले से जानती हैं ? मुझे तो नहीं लगता ,आपका उनसे कोई रिश्ता है।

 मैं उनकी कोई नहीं हूँ किन्तु उनकी कलाकृतियों की प्रशंसक हूं, व्यक्तिगत तौर पर उनसे मिलकर उन्हें बधाई देना चाहती हूं। 

इस तरह मैडम आपसे नहीं मिलेंगीं , मधुलिका वहीं बैठ गई, उसके मन में बहुत बड़ी परेशानी चल रही थी , आखिर ये क्या हो रहा है, इसके साथ तो मेरा पति कुमार था , फिर यह लड़की कुमार को उसका पति क्यों कह रही है ? मंकु उसे बार-बार तंग कर रहा था, मधु ,अपनी ही परेशानी में उलझी थी ,अबकी बार उसने मंकु  को डांट दिया, उसे तो लग रहा था, जैसे उसकी दुनिया ही उजड़ रही है ,ऐसे में उसे मंकु की आवाज कहां सुनाई देती ?कुछ पल की मुस्कुराहट उसे इतना बड़ा दुःख दे जायगी ,यह तो उसने सोचा ही नहीं था।  उसने मन ही मन ठान लिया था ,अब तो वह उससे मिलकर भी जाएगी।उसकी हालत देखकर कोई भी कह सकता था -'जैसे वो कई महीनो की बीमार हो। 'उसे, कुमार के व्यवहार ने बिमार सा कर दिया था,तब उसकी बेचैनी इतनी बढ़ गई थी कि उसने कुमार को फोन लगा दिया और कुमार से पूछा -आप कहां हैं ?

उसका फोन देखते ही, कुमार झुँझला गया और बोला -मैंने तुमसे पहले ही कहा था' कि मैं मीटिंग में हूं ,,क्या तुम्हें एक बात समझ में नहीं आती।' 

मैं जानती हूं, आप मीटिंग में है ,व्यंग्य से बोली ,किस मीटिंग में हो ?सब जानती हूँ लेकिन मीटिंग किस जगह पर है ? यह पूछना चाहती हूं,' मंकु' आपसे मिलने की जिद कर रहा है। हम लोग दयालबाग के उस स्थान पर है जहां पर' कला प्रतियोगिता 'है। 

मधुलिका की बात सुनकर एकदम से कुमार चुप हो गया ,कुछ देर पश्चात बोला -मैं, वहां नहीं हूं, मुझे आने में अभी समय लगेगा , यह कहकर उसने फोन काट दिया।

 अवश्य ही कुछ तो गड़बड़ है। बेचैनी से वह इधर-उधर टहलने लगी। वह फिर से उस काउंटर वाली लड़की से मिलने के लिए गई, और उससे पूछा - उन मैडम के पति का क्या नाम है ?

अरे आप, उनको लेकर क्यों इतनी परेशान हो रही है ? उनके पति का कोई भी नाम हो ,आपको ,उनसे कोई मतलब नहीं होना चाहिए, मधुलिका उससे कैसे कहे ? उसके साथ तो मैंने अपने पति को देखा है। बेचैनी इतनी बढ़ गई, एक बार उस होटल का पता चल जाता, तो उसे छोड़ती नहीं ,पता तो चले, यह कौन है ? उसने अब अंदाजा लगाया, उस समय मेरे पास किसी ने जो तस्वीरें भेजी थी उसमें जो लड़की थी, उसका चेहरा नहीं दिख रहा था। हो सकता है, यही वह लड़की हो और कोई मुझे यह तस्वीरें भेज कर सचेत कर देना चाहता था। घबराहट के कारण उसके हाथ काँप रहे थे,बार -बार अपने हाथों के नाख़ून दांतों से चबाने लगती।  दिमाग काम नहीं कर रहा था, कि वह क्या करें ? इस अनजान शहर में किसी को जानती भी नहीं है, किसी से क्या पूछे ? प्रतीक्षा ही कर सकती है।

मंकु को ताजमहल दिखलाने के लिए, दिखलाने के लिए नहीं, बल्कि कुमार ने उनसे वहीं  मिलने का वादा किया था यही सोच कर वह मंकू को लेकर वहां से निकल जाती है। 



laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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