''हम ईश्वर को कब याद करते है ?''
प्रियजनों !
मनुष्य का जीवन निरंतर गतिशील है—आशाओं, संघर्षों, उपलब्धियों और विफलताओं का एक जटिल ताना-बाना है। इन संपूर्ण प्रक्रियों के मध्य एक प्रश्न बार-बार उठता है - हम ईश्वर को कब याद करते हैं ? क्या ईश्वर हमारे लिए केवल संकट का सहारा मात्र हैं ? क्या वे केवल दुख के क्षणों में स्मरण किए जाने वाले एक अदृश्य आधार हैं ? या फिर वे हमारे जीवन के प्रत्येक श्वास में उपस्थित एक चैतन्य सत्ता हैं ?
यह प्रश्न केवल धार्मिक नहीं, बल्कि गहन मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक है। इसका उत्तर हमें अपने भीतर उतरकर खोजना होता है। अक़्सर लोग ईश्वर को तब याद करते हैं ,जब जीवन में संकट आता है। बीमारी, आर्थिक कठिनाई, संबंधों का टूटना, परीक्षा का भय, या मृत्यु का साया—इन परिस्थितियों में मनुष्य का आत्मविश्वास डगमगा जाता है। उस क्षण, उसे अपनी सीमाओं का अनुभव होता है ,वह समझ जाता है ,कि अब उसे किसी आलंबन की आवश्यकता है।जो उसे शारीरिक ही नहीं ,मानसिक रूप से भी सहारा दे। एक ऐसी अदृश्य शक्ति ,उसके जीवन में उसे, आगे बढ़ाने में सहायक हो। वो कार्य करना उसे ही है किन्तु उसे विश्वास रहता है ,कोई तो है ,जो उसके साथ है। इसी विश्वास को वह ईश्वर का दर्ज़ा देता है।
जब विज्ञान, बुद्धि और सामाजिक सहारे सीमित प्रतीत होते हैं, तब मनुष्य का मन किसी सर्वोच्च सत्ता की ओर मुड़ता है। वह प्रार्थना करता है, व्रत रखता है, मंदिर-मस्जिद-गुरुद्वारे की शरण लेता है। ईश्वर का यह स्मरण प्रायः आवश्यकता-प्रेरित होता है। इसमें श्रद्धा नहीं, एक विश्वास होता है, परंतु उसके साथ ही भय भी जुड़ा होता है। यह स्थिति मनोविज्ञान के दृष्टिकोण से स्वाभाविक है। जब व्यक्ति उस परिस्थिति को स्वयं नियंत्रित नहीं कर पाता ,तब वह किसी उच्चतर नियंत्रण की कल्पना करता है। ईश्वर का स्मरण उसे मानसिक स्थिरता देता है, किंतु प्रश्न यह उठता है—क्या यह स्मरण स्थायी है ?उसने यह स्मरण आवश्यकतानुसार किया। अक्सर देखा गया है कि जैसे ही संकट टलता है, ईश्वर का स्मरण भी क्षीण होने लगता है।
लोग ईश्वर को सफलता के समय भी याद करते हैं। परीक्षा में उत्तीर्ण होना, व्यापार में लाभ, संतान की प्राप्ति, या किसी लक्ष्य की पूर्ति—इन क्षणों में वो ईश्वर को धन्यवाद देने के लिए स्मरण करता है। यह स्मरण पहले की अपेक्षाकृत शुद्ध होता है, क्योंकि इसमें भय नहीं, बल्कि कृतज्ञता होती है। कृतज्ञता आध्यात्मिकता का एक उन्नत चरण है। जब व्यक्ति यह स्वीकार करता है कि उसकी उपलब्धियों में केवल उसका प्रयास ही नहीं, बल्कि एक अन्य शक्ति का भी योगदान है, तब उसका अहंकार घटता है और आंतरिक प्रसन्नता ही उसे ऐसा करने के लिए प्रेरित करती है।
परंतु यह भी देखा गया है कि कई बार सफलता अहंकार को जन्म देती है। व्यक्ति स्वयं को ही कर्ता मान लेता है वहां ईश्वर का स्मरण गौण हो जाता है। जब तक सब अनुकूल है, तब तक ईश्वर की आवश्यकता नहीं समझी जाती।इस प्रकार, स्मरण का स्वरूप परिस्थिति-निर्भर हो जाता है।
बहुत से लोग ईश्वर को इसलिए याद करते हैं क्योंकि यह उनकी परंपरा का हिस्सा है। सुबह-शाम की पूजा, आरती, जप, या विशेष त्योहारों पर उपासना—ये सब पारिवारिक संस्कारों के रूप में पीढ़ी दर पीढ़ी चलते हैं।यह स्मरण नियमित होता है, परंतु कई बार यांत्रिक भी हो सकता है। यदि मन उसमें संलग्न नहीं है, तो वह केवल एक सामाजिक या सांस्कृतिक क्रिया बनकर रह जाता है।
आध्यात्मिक दृष्टि से स्मरण तभी प्रभावी होता है जब उसमें सजगता और भावना का समावेश हो अन्यथा वह केवल एक आदत बन जाता है।
जब जीवन का अर्थ ही एक प्रश्न बन जाए ,तब एक गहरा और प्रामाणिक स्मरण उत्पन्न होता है जब व्यक्ति अस्तित्व के प्रश्नों से जूझता है—“मैं कौन हूँ?”, “मेरे जीवन का उद्देश्य क्या है?”, “मृत्यु के बाद क्या होता है?”।ऐसे प्रश्न सामान्यतः जीवन के किसी मोड़ पर उठते हैं—कभी किसी प्रियजन की मृत्यु के बाद, कभी असफलता के बाद, और कभी बिना किसी स्पष्ट कारण के भी। यह जिज्ञासा व्यक्ति को आध्यात्मिक खोज की ओर प्रेरित करती है।
भारतीय दर्शन में इसे विवेक जागरण कहा गया है। जब व्यक्ति अस्थायी और स्थायी के बीच अंतर करना सीखता है, तब उसका मन ईश्वर की ओर स्वतः आकर्षित होता है। यह स्मरण भय या लाभ की इच्छा से नहीं, बल्कि सत्य की खोज से प्रेरित होता है।
संत और महापुरुष ईश्वर को केवल विशेष अवसरों पर नहीं, बल्कि प्रत्येक क्षण स्मरण करते हैं। उनके लिए ईश्वर कोई दूरस्थ सत्ता नहीं, बल्कि जीवन की मूल चेतना हैं।उदाहरण के लिए, कबीर ने कहा—
“दुख में सुमिरन सब करे, सुख में करे न कोय,
जो सुख में सुमिरन करे, तो दुख काहे को होय।”
इस दोहे में एक गहरी आध्यात्मिक अंतर्दृष्टि है। कबीर संकेत करते हैं कि यदि व्यक्ति सुख के समय भी ईश्वर को स्मरण करे, तो उसका मन संतुलित रहेगा और दुख का प्रभाव कम होगा।
इसी प्रकार तुलसीदास ने ‘रामचरितमानस’ में निरंतर नाम-स्मरण को मुक्ति का मार्ग बताया है। उनके अनुसार, ईश्वर का नाम केवल संकट-निवारण का साधन नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि का माध्यम है। यदि हम इस प्रश्न को मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखें, तो पाएँगे कि ईश्वर का स्मरण, व्यक्ति की आंतरिक अवस्था का प्रतिबिंब है।
असुरक्षा की भावना → ईश्वर स्मरण एक सहारे के रूप में
कृतज्ञता → ईश्वर स्मरण एक धन्यवाद के रूप में
जिज्ञासा → ईश्वर स्मरण एक खोज के रूप में,क्या ईश्वर है ?है तो, कहाँ ?
प्रेम → ईश्वर स्मरण एक आत्मिक संबंध के रूप में,ऐसा संबंध जैसा राधा का अपने प्रिय से था।
इनमें से अंतिम अवस्था—प्रेम—सबसे परिपक्व है। जब व्यक्ति ईश्वर को किसी अपेक्षा से नहीं, बल्कि आत्मीयता से स्मरण करता है, तब उसका संबंध लेन-देन से ऊपर उठ जाता है। एक और महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है—क्या केवल स्मरण ही पर्याप्त है? यदि स्मरण केवल शब्दों में है, परंतु जीवन में उसका प्रतिबिंब नहीं, तो वह अधूरा है।
सच्चा स्मरण व्यक्ति के आचरण में प्रकट होता है—सत्यनिष्ठा, करुणा, संयम और सेवा के रूप में। यदि हम ईश्वर को याद करते हैं, परंतु व्यवहार में अहंकार, द्वेष और छल को स्थान देते हैं, तो हमारा स्मरण सतही है।आध्यात्मिकता केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है; यह एक जीवन-शैली है। ईश्वर-स्मरण कोई सहज उपलब्धि नहीं है। इसके लिए अभ्यास आवश्यक है। कुछ प्रमुख साधन निम्नलिखित हैं:
ध्यान – मन को एकाग्र कर आंतरिक शांति का अनुभव करना।
जप – किसी पवित्र नाम या मंत्र का नियमित उच्चारण।
स्वाध्याय – आध्यात्मिक ग्रंथों का अध्ययन और चिंतन।
सेवा – निस्वार्थ भाव से दूसरों की सहायता करना।
इन साधनों के माध्यम से स्मरण धीरे-धीरे जीवन का स्वाभाविक अंग बन सकता है।
“हम ईश्वर को कब याद करते हैं?”—इस प्रश्न का उत्तर विविध हो सकता है। कोई संकट में याद करता है, कोई सफलता में, कोई परंपरा से, और कोई सत्य की खोज में। परंतु मूल प्रश्न यह है- कि हम उसे किस भाव से याद करते हैं?यदि स्मरण केवल भय या स्वार्थ से प्रेरित है, तो वह अस्थायी रहेगा। यदि वह कृतज्ञता, जिज्ञासा और प्रेम से प्रेरित है, तो वह जीवन को रूपांतरित कर सकता है।
आदर्श स्थिति यह है कि ईश्वर-स्मरण किसी विशेष परिस्थिति तक सीमित न हो। वह हमारी चेतना का अभिन्न अंग बने। जब प्रत्येक कर्म, प्रत्येक विचार और प्रत्येक श्वास में ईश्वर की उपस्थिति का बोध हो, तब जीवन में संतुलन, शांति और संतोष स्वाभाविक रूप से विकसित होते हैं।
अंततः, ईश्वर को याद करना कोई बाहरी क्रिया नहीं, बल्कि एक आंतरिक जागरण है। यह जागरण तब पूर्ण होता है जब हम ईश्वर को केवल कठिन समय में नहीं, बल्कि हर क्षण, हर स्थिति में अपने जीवन का साक्षी और आधार मानते हैं। यही सच्ची आध्यात्मिकता है।
आप लोग यहाँ सत्संग सुनने आये हैं किन्तु ध्यान ,मन दोनों ही ,गृहस्थ जीवन की विपत्तियों में पड़ा है।शायद सत्संग सुनने से थोड़े बुरे कर्म ही कट जाएँ अथवा इस विचार से आये हैं ,कि कुछ देर यहाँ बैठकर सत्संग सुनने से हमारा भी बेडा पार हो जायेगा। ऐसा नहीं है ,प्रवचन महात्मा दे रहे हैं और आपका ध्यान उनके प्रवचनों में भी नहीं है। तब आपका उद्धार कैसे सम्भव है ? जो भी करना है ,आपको ही करना है ,सत्संग का उद्देश्य तो मात्र आप लोगों को ,उस परमात्मा की राह दिखाने से है ,उसके प्रति प्रेम जाग्रत करने से है। आगे तो आप लोगों को ही बढ़ना है ताकि आप उसे महसूस कर सकें।
