''दुनिया एक '' मेला ''
प्रिय ,भक्तजनों !
हम अपनी इन बाहरी आंखों से, जब इस दुनिया को देखते हैं तो, यह दुनिया बहुत खूबसूरत नजर आती है। लोगों की भीड़ है ,इच्छाएं, प्रतिस्पर्धा,आकर्षण ,मोह सभी कुछ तो है। मेला भी अस्थाई होता है ,और ये जीवन भी अस्थाई है। इस संसार की भांति इस मेले की चमक -धमक ,रंगीनी ,हमें अपनी और आकर्षित करती है, किंतु इस जीवन की ही भांति ये मेला भी 'क्षणभंगुर' होता है। इस मेले में लोग आते हैं ,सामान खरीदते हैं ,और वहाँ उपलब्ध खेल -खिलौनों और झूलों का आनन्द लेते हैं और अपने -अपने अनुभव लेकर प्रस्थान कर जाते हैं।
जब हम अपने अंदर झांकते हैं ,अंतर्मन की आंखों से देखा जाए तो यह सब एक भ्रम नजर आता है। ऐसा लगता है, यह दुनिया एक' मेले' जैसी प्रतीत होती है,जहाँ सब कुछ मिथ्या नजर आने लगता है। जहाँ विभिन्न प्रकार के इंसानों का, विभिन्न प्रकार के प्राणियों,जीवों का मेला लगा है।जितना भी इस जीवन को जानने का प्रयास करते हैं ,उतना ही इसका रहस्य गहन होता चला जाता है। उस मेले में लोग अपना- अपना प्रदर्शन कर रहे हैं। कोई अच्छा प्रदर्शन करता है, कोई बुरा प्रदर्शन करता है ।
भारतीय संत परंपरा में इस विचार को गहराई से व्यक्त किया गया है - विशेषतः कबीर ने संसार की अ स्थिरता को अत्यंत सरल शब्दों में समझाया -'यहां कोई स्थाई नहीं है, सब यात्री हैं। '
इसी प्रकार गौतम बुद्ध ने भी कहा - 'अनित्य को जीवन का मूल सत्य बताया, दुनिया का मेला केवल एक काव्यात्मक कल्पना नहीं है बल्कि एक गहन आध्यात्मिक बोध है। ''
जीवन भी ऐसा ही है ,जन्म के साथ हमारी यात्रा प्रारंभ होती है -बचपन, युवावस्था ,वृद्धावस्था यह सभी मेले के अलग-अलग पड़ाव हैं, हम संबंध बनाते हैं, उपलब्धियां अर्जित करते हैं ,संपत्ति इकट्ठी करते हैं पर अंततः सब यहीं रह जाता है। भगवतगीता में भी कहा गया है - कि आत्मा न ही जन्म लेती है न ही मरती है ,शरीर बदलता है, परिस्थितियाँ बदलती हैं किंतु आत्मा शाश्वत है। '' यदि हम इस सत्य को समझ लें तो संसार के मेले में रहते हुए भी इंसान मोह के बंधन में नहीं फंसते।
स्वामी विवेकानंद ने कहा था- कि बाहरी उपलब्धियां कभी स्थाई संतोष नहीं दे सकतीं , सच्चा आनंद हमें भीतर से प्राप्त होता है, संसार का मेला हमें बाहर की तरफ खींचता है जबकि अध्यात्म भीतर की ओर लौटने की प्रेरणा देता है
संसार को देखकर लगता है , सभी इंसान ,इस मेले में आकर, गुम हो गए हैं , भूल गए हैं कि हमारा इस जीवन में आने का उद्देश्य क्या था ? यदि अंतर की आत्मा से देखा जाए तो लगता है ,जैसे' ईश्वर ने हमारे लिए यह एक भूल भुलैया तैयार की है।' ताकि इसकी रंगीनियों में हम भटक कर रह जाएं। अच्छे -बुरे सभी कर्म करें, ताकि उन कर्मों के आधार पर दंड या फिर उपहार भेंट दें। जब बच्चा जन्म लेता है तब जीवन कितना सुंदर प्रतीत होता है किंतु वह जन्म लेकर इस संसार की रंगीनियों में भटक कर रह जाता है और खाने- कमाने की, अपनी इच्छाओं की पूर्ति में लिप्त हो जाता है। उसने अपनी आंखों से जो कुछ भी देखा है, संसार में सब कुछ यहीं है। वह इस भ्रमित दुनिया को ही अपना मान बैठता है। वह भूल जाता है कि एक न एक दिन तो मुझे इस दुनिया को 'अलविदा' कहना ही होगा।
इस संसार में हमें अनेक लोग मिलते हैं - कुछ क्षणों के लिए साथ चलते हैं, फिर भीड़ में खो जाते हैं। जीवन में यही होता है, माता-पिता, मित्र, जीवन साथी, सहकर्मी सब हमारे जीवन मेले के 'सहयात्री ' हैं हम अक्सर संबंधों को स्थाई मान लेते हैं और उनसे अत्यधिक अपेक्षाएं बांध लेते हैं और जब अपेक्षाएं टूटती हैं , तो दुख जन्म लेता है। यदि हम यह समझ लें, कि हर आत्मा अपनी स्वतंत्र यात्रा पर है, तो संबंधों में सहजता और करुणा आ जाएगी। हमारी यह समझ विरक्ति नहीं बल्कि परिपक्वता है ,इसका अर्थ यह नहीं कि प्रेम ही ना करें बल्कि ऐसा प्रेम करें, जिसमें स्वामित्व न हो, नियंत्रण न हो ,केवल स्वीकृति हो।
इस पृथ्वी पर आकर इस जीवन में ' मैं 'के कवच में हम अपने को सुरक्षित महसूस करते हैं। वासना मोह रिश्तो में फंसकर रह जाते हैं और उन संबंधों को अपना मानकर भ्रमित हो जाते हैं । जिस प्रकार मेले में कई कलाकार होते हैं -कोई जादूगर, कोई मदारी, कोई नाटक करने वाला, वे अलग-अलग भूमिकाएं निभाते हैं ,परंतु प्रदर्शन समाप्त होते ही वो अपने वास्तविक स्वरूप में लौट आते हैं।
इसी प्रकार हम भी जीवन में अनेक भूमिकाएं निभाते हैं -पुत्र ,पुत्री, पति -पत्नी अधिकारी, नागरिक इत्यादि परंतु हमारी वास्तविक पहचान इन भूमिकाओं से परे है जब हम स्वयं को केवल उस भूमिका तक सीमित कर लेते हैं तो अहंकार उत्पन्न होता है।
रमन ऋषि ने भी,आत्म चिंतन का मार्ग बताया है -''मैं कौन हूं ''यदि इस प्रश्न पर गंभीरता से चिंतन किया जाए तो ज्ञात होता है, कि हम न केवल शरीर हैं, न केवल विचार, हम चेतना है। दुनिया का मेला हमें बाहरी पहचान देता है पर अध्यात्म हमें आंतरिक पहचान से परिचित कराता है।
इंसानी फ़ितरत दूसरे से अपनी तुलना करने लगती है ,उसके पास अधिक धन है ,धन से अपनी सफलता असफ़लता को मापने लगते हैं। यदि जीवन को मेला समझ लिया जाये तो तुलना का कोई महत्व नहीं रह जाता है। बाहरी वस्तुओं की तुलना करता है किन्तु दूसरे के आंतरिक सुख ,शांति से तुलना नहीं करता। जीवन जितना सादा रहेगा ,उतना ही जीवन शांति पूर्ण व्यतीत होगा।
जब जीव की ज्ञानेंद्री खुलती है तब उसे आभास होता है वह तो इस जीवन में, किसी कार्य के उद्देश्य से आया था वह कार्य करके उसे नियत समय पर जाना होगा। उस ज्ञानेंद्रिय के माध्यम से वह महसूस करता है, कि यह जो जीवन है यह दुनिया की रंगीनियों के मेले में भटक का हुआ है। इस मेले से विरक्त होना है वापस अपने घर भी तो जाना है।
अब प्रश्न यह उठता है—यदि दुनिया मेला है, तो हम यहाँ क्यों आए हैं? क्या केवल भटकने के लिए ? नहीं ! मेले में लोग आनंद लेने, सीखने और अनुभव प्राप्त करने आते हैं। उसी प्रकार जीवन भी आत्मा के विकास का अवसर है।
दुःख और सुख, सफलता और असफलता—ये सभी अनुभव आत्मा को परिपक्व बनाते हैं। यदि हम हर परिस्थिति को सीख के रूप में स्वीकार करें, तो जीवन का मेला अर्थपूर्ण हो जाता है।
श्री अरविन्द ने,' मानव जीवन को दिव्यता की ओर विकास की प्रक्रिया माना। संसार का मेला आत्मा के लिए एक प्रयोगशाला है, जहाँ वह स्वयं को पहचानती है।'
“दुनिया एक मेला” सुनकर लोग सोचते हैं कि क्या हमें संसार त्याग देना चाहिए किन्तु सच्चा अध्यात्म पलायन नहीं सिखाता, वह जागरूक सहभागिता सिखाता है।
जैसे समझदार व्यक्ति मेले में आनंद भी लेता है, पर यह भी जानता है कि यह अस्थायी है, वैसे ही ज्ञानी व्यक्ति संसार में रहते हुए भी भीतर से मुक्त रहता है। वह कर्म करता है, पर फल में आसक्त नहीं होता।
यह शिक्षा हमें भगवद्गीता के कर्मयोग में मिलती है—''कर्तव्य करो, पर परिणाम की चिंता में स्वयं को मत बाँधो।''हर मेला समाप्त होता है। दुकानदार लौट जाते हैं, झूले उतर जाते हैं, भीड़ छँट जाती है। मैदान फिर शांत हो जाता है।
मृत्यु भी जीवन-मेले का समापन है। यह भय का विषय नहीं, बल्कि एक परिवर्तन है। यदि जीवन को मेला समझा जाए, तो मृत्यु अंत नहीं, बल्कि अगले अध्याय का आरंभ प्रतीत होती है।आध्यात्मिक दृष्टि से मृत्यु उस आत्मा का एक पड़ाव मात्र है, जो अनंत यात्रा पर अग्रसर है।
“दुनिया एक मेला” का अर्थ यह नहीं कि जीवन व्यर्थ है; बल्कि हमें ''सजग यात्री ''बन इस जीवन को जीना चाहिए।इस जीवन में लिप्त न होकर ,अपने आपको पहचानें। अनुभव लें ,भयभीत न हों।
संसार के मेले में भटकने की आवश्यकता नहीं; बस जागरूक होकर चलना है। जो यह समझ लेता है कि यह सब एक अस्थायी आयोजन है, वह उसी क्षण भीतर की स्थायी सत्ता—आत्मा—की ओर मुड़ जाता है। अंततः, मेला समाप्त होगा। पर यदि हमने इस यात्रा में 'आत्मबोध' प्राप्त कर लिया, तो यही मेला' मुक्ति 'का मार्ग बन जाएगा।
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