Khoobsurat [part 111]

मधुलिका के फोन पर, कुछ तस्वीरें आती हैं जिन्हें देखकर, मधुलिका परेशान हो जाती है किंतु मन ही मन  अपने को समझाने का प्रयास भी करती है - हो सकता है ,कोई कुमार का या मेरा दुश्मन हो और हमारे बीच गलतफहमी पैदा करना चाहता हो। ऐसा वह कौन सा दुश्मन हो सकता है ? जो हर जगह कुमार के साथ पहुंच जाता है। अपने को समझाते हुए भी, उसका मन परेशान हो उठता है और फिर वह कुमार को फोन करती है। कुमार उससे पूछता है- कि क्या परिवार में सब ठीक हैं ? और वह जवाब देती है ,हां सब ठीक है। तब कुमार पूछता है- जब सब ठीक है, तो तुमने मुझे फोन क्यों किया ?

यह क्या बात हुई ?क्या मैं अपने पति को फोन करके यह भी नहीं पूछ सकती- कि वो कैसे हैं ? ठीक से पहुंच गए हैं या नहीं, नाराज होते हुए मधुलिका बोली। 



मैं ठीक से पहुंच गया हूं ,मैं कोई बच्चा नहीं हूँ झल्लाते हुए कुमार ने जबाब दिया। 

 तब आपको फोन करके एक बार बताना तो चाहिए था क्योंकि मुझे यहां आपकी फिक्र हो रही थी।आप बच्चे नहीं हैं किन्तु घरवालों को फ़िक्र तो होती ही है।  आप पहली बार इतनी दूर गए हैं, चिंता तो लगी ही रहती है।  पापा भी पूछ रहे थे -'बहु ! वह ठीक से पहुंच गया या नहीं।' 

अब कुमार को अपनी गलती का एहसास हुआ और बोला -हां, मुझसे गलती हो गई, मुझे बताना चाहिए था। चलो, तुमने फोन किया, कोई बात नहीं, मुझे भी, घरवालों का पता चल गया। मधुलिका और कुमार आराम से बातें कर रहे थे। जबकि यामिनी सोच रही थी ,कि मधुलिका ने  उससे झगड़ा करने के लिए फोन किया है और अब झगड़ा करेंगी, किंतु ऐसा कुछ भी नहीं हुआ बल्कि कुमार ने ही कुछ तीखे शब्द उसे सुनाये किन्तु तब भी मधुलिका ने बात को संभाल लिया। तब वह एकदम से लगभग दौड़ती हुई कुमार के करीब आई  और बोली -कुमार !चलो न....  पानी में आगे चलते हैं, किंतु उससे पहले ही, कुमार ने फोन काट दिया था। 

 यामिनी के इस व्यवहार पर कुमार ने यामिनी से कहा -यह क्या तरीका है ? मैं बात कर रहा था। 

किससे बात कर रहे थे ? यामिनी ने पूछा, जबकि वह जानती थी, कि मधुलिका का फोन आया है। फोन तो मधुलिका का था लेकिन मेरे किसी क्लाइंट से बात करवाई है ,उसने इसलिए फोन किया था। इस बात से यामिनी चिढ़ गई ,यह किस मिट्टी की बनी है ? मैं तो सोच रही थी - वो, इससे झगड़ा करेगी। मुझे लगता है ,उसने वे तस्वीरें नहीं देखीं ,शायद मैंने ही वे तस्वीरें हटाने में जल्दबाज़ी कर दी। उसे जलन हुई या नहीं किन्तु इन दोनों में झगड़ा नहीं हुआ ,इस बात से यामिनी अवश्य आहत हुई और तब यामिनी,कुमार से बोली -अच्छा अब चलो ,होटल वापस चलते हैं, मुझे बहुत  जोरों की भूख लगी है।

 वापस चलते हुए कुमार ने पूछा-अब तुम कितनी पेंटिंग और बना चुकी हो ? क्या होटल में ही अपनी  पेंटिंग बनाती  हो ?अब वह उसके विषय में जानना चाहता था।  

नहीं,, मेरा पेंटिंग बनाने के लिए एक अलग, कमरा है, जहां पर' मैं' मेरे रंग और कैनवास होता है। 

क्या उस समय मैं, तुम्हारे ख्यालों में रहता हूँ या नहीं , कुमार ने मुस्कुराते हुए पूछा। 

यह तुमने कैसी बात कह दी ? यह पूछो ! कि ख्यालों में कब नहीं रहते हो ? अब तो ख्याल ही, तुम्हारे आते हैं और पेंटिंग्स भी तुम्हारे लिए ही बनती हैं, तभी उसे अपनी उस पेंटिंग का स्मरण हो गया जिसे वह कुमार से छुपाना चाहती थी।

 कुमार चार दिन और उस होटल में यामिनी के साथ रहा और फिर वापस लौट आया किंतु अबकी बार कुमार थोड़ा बदल सा गया था , दोबारा इस दुनिया में लौट कर आना उसे अच्छा नहीं लग रहा था। किंतु यह जीवन है, सब अपनी सोच और अपने तरीके से नहीं चलता है। कुछ समाज के  दृष्टिकोण से, कुछ परिवार की जिम्मेदारियों के कारण, अपनी इच्छाओं को भी दबाना पड़ता है। वह चाहता तो यामिनी के साथ वहीं  रह जाता किंतु ऐसा संभव नहीं था। 

कुमार जब घर वापस आया ,तो कुछ खोया -खोया सा लग रहा था  ,उसकी नजरों के सामने अभी भी यामिनी की वो बातें ,उसका वो मुस्कुराना ,उसका साथ ,उसका प्यार, उसे यहां के वातावरण में घुलने -मिलने नहीं दे रहा था।कई बार किसी के साथ बरसों रहकर भी वो अनुभूति नहीं होती ,जो सुखानुभूति  ,स्मृतियाँ ,कुछ पल या कुछ दिनों का साथ ही  दे जाता है। ऐसा ही कुमार के साथ भी हो रहा था। उसे यामिनी को छोड़कर आना, अच्छा नहीं लग रहा था ,उसका बस चलता तो उसे भी ,अपने साथ ले आता किन्तु ये सम्भव नहीं था। लौटते समय जब उसने यामिनी की आँखों में देखा ,उसका मौन सब कह गया था। 

 जबकि मधुलिका, सभी बातों को भूलकर, उसके लिए भोजन बना रही थी ,उसके कपड़े संभाल रही थी। उसके इर्द -गिर्द घूमकर उससे पूछ रही थी - सफ़र कैसा रहा ?वहां का वातावरण ,वहां के लोग कैसे थे ?वो यामिनी को भूले भी तो, मधुलिका के प्रश्न उसे फिर से याद दिला देते। कुमार ने कुछ बातें बताई या यूँ कह लीजिये !औपचरिकता निभा रहा था किन्तु उसने समुन्द्र के किनारे जाने का ज़िक्र नहीं किया। तब मधुलिका ने ही पूछा -क्या वहां तुम समुन्द्र पर नहीं गए ,वहां समुन्द्र तो है,न...  

नहीं ,इतना समय ही नहीं मिला ,काम में इतना व्यस्त रहा ,उसके इतना कहते ही ,मधुलिका को जैसे झटका लगा और वो चुप हो गयी ,न ही कुमार ने उसे और कुछ बताया और न ही, यह जानने का प्रयास किया कि वो एकदम से शांत कैसे हो गयी ?कुमार भोजन करके चुपचाप अपने बिस्तर पर लेट गया। उसने मधुलिका से और कोई बात नहीं की।उस परिस्थिति को देखकर ऐसा लग रहा था ,जैसे मधुलिका ज़बरन ही उससे बात कर रही थी। 

 मधुलिका, कुमार को देख और महसूस कर रही थी, पहले जब भी कभी वह बाहर से घूमकर आता था तो उसे काम करते देख ,कमरे में उसके आने की , प्रतीक्षा करता रहता था, तब वह रसोईघर के सारे काम समेट कर उसकी बाहों का तकिया बनाकर कुमार के समीप लेट जाती थी।  किंतु अब वह प्रतीक्षा नहीं करता , बल्कि थकान का बहाना करके सो जाता है। आज भी उसने ऐसा ही किया, अब तक तो मधुलिका  शिल्पा को लेकर चिंतित हो रही थी किंतु जब उसने कुमार को बिस्तर पर सोते हुए देखा, उसे तुरंत ही, फोन वाली बात स्मरण हो आई। मन ही मन सोचने लगी - क्या, मैं कुमार से पूछूं, कि वह कहां गया था ?किसके साथ था?  चुपचाप उसकी तरफ देखा और पीठ करके लेट गई।

 कुमार भी अभी तक सोया नहीं था किंतु न जाने क्यों ? अब मधुलिका के प्रति उसकी संवेदनाएं बदलती जा रही थीं,ऐसा नहीं कि वह मधुलिका को पसंद नहीं करता ,बल्कि उसे एहसास है, कि वो मेरे बच्चे की माँ है ,मेरी गृहस्थी को इसने बख़ूबी संभाला है ,उसे छोड़ना भी नहीं चाहता किन्तु उसका साथ भी अब अच्छा नहीं लग रहा ,अज़ीब ही स्थिति है।

 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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