Qabr ki chitthiyan [part 8]

अर्जुन और राघव काव्या को छुड़ाने के लिए ,''पितृशिला ''पर जाते हैं ,वहां काव्या एक घेरे के दूसरी और बंधी खड़ी थी। जब अर्जुन उसे बचाने के लिए आगे बढ़ता है ,तो ''गुरुदत्त जूनियर ''की शक्ति के सामने अपने को विवश पाता है। राघव भी उसका कुछ बिगाड़ नई पाता। अर्जुन साहस करके, काव्या की ओर बढ़ा, लेकिन आत्माएँ उसका रास्ता रोकने लगीं। 

छोटे-छोटे हाथ, जली हुई आकृतियाँ ,उसे पीछे धकेलने लगीं। ये वही बंधी हुई आत्माएं थीं ,जिन्हें ''गुरुदत्त जूनियर ''ने कैद किया हुआ है ,और अर्जुन उन्हें मुक्ति दिलाना चाहता है। उनकी हर छुअन पर अर्जुन को ऐसा लगा, जैसे-' उसकी त्वचा जल रही हो।'


वह पूरी ताक़त लगाकर चिल्लाया—“मैं, तुम्हें मुक्त करने आया हूँ !तुम्हें कैद करने वाला यही है—''गुरुदत्त जूनियर!”

आत्माएँ ठिठक गईं,उनकी आँखों में पलभर के लिए करुणा झलकी।अर्जुन ने तुरंत जेब से वो जली हुई ,डायरी का बचा हुआ हिस्सा निकाला और आग में फेंक दिया।धुआँ उठते ही, आत्माएँ बहुत तेजी से चीख़ीं, लेकिन इस बार ग़ुस्से में नहीं… राहत में !

अपनी योजना को विफ़ल होते देखकर ,गुरुदत्त जोर से गरज उठा।“नहीं ! तूने उनका बंधन तोड़ दिया!”उसने क्रोध में मशाल हवा में घुमाई और अचानक आग का गोला अर्जुन की ओर फेंका।अर्जुन ने झुककर अपना बचाव किया, लेकिन आग उसके कंधे को छू गई ,उसकी त्वचा जलने लगी, असहनीय दर्द होने लगा,फिर भी अर्जुन उठ खड़ा हुआ,उसने वहीं आस -पास से एक पत्थर उठाकर गुरुदत्त की ओर फेंका। पत्थर 'गुरुदत्त 'के सीने से टकराया, लेकिन वह हिला तक नहीं।

गुरुदत्त हँसा और चिल्लाते हुए बोला -तेरी ताक़त इंसानी है, मेरी ताक़त आत्माओं की है ,तू, मुझे नहीं हरा सकताा...... 

अर्जुन ने दाँत भींचे और क्रोध से बोला -“ तेरा सच… एक दिन तुझे ज़रूर हराएगा।”

अचानक काव्या जोर से चीख़ी -“अर्जुन! मेरा हाथ पकड़ो!”

अर्जुन ने पूरी जान लगाकर, काव्या तक पहुँचने की कोशिश की।गोले की आग जल रही थी, लेकिन आत्माएँ अब उसे रोक नहीं रही थीं ,उन्होंने अर्जुन के लिए रास्ता बना दिया।अर्जुन ने काव्या का हाथ पकड़कर उसे अपनी ओर खींच लिया।जैसे ही, उसने ऐसा किया, गोले के सारे दीये बुझ गए।

श्मशान में अंधेरा फैल गया ,गुरुदत्त क्रोध से काँपने लगा,उसकी लाल आँखें अंगारे की तरह चमक रही थीं -“अर्जुन! तूने मेरी आत्माएँ मुझसे छीन लीं,लेकिन ये लड़ाई यहीं खत्म नहीं हुई है ,अब हर कदम पर' मौत' तेरे साथ चलेगी।”इतना कहकर वह धुएँ में बदल गया और गायब हो गया।

अर्जुन ने काव्या को अपने सीने से लगा लिया,उसकी आँखों में आँसू थे और बोला -“मैंने तुझे खोने नहीं दिया।”

लेकिन तभी ज़मीन पर एक नई चिट्ठी प्रकट हुई ,उस पर लिखा था—“अगर असली गुरुदत्त को जानना है… तो उसके घर जाना होगा।''वहाँ उसकी सच्चाई दफ़्न है।”

अर्जुन ने चिट्ठी अपनी जेब में रखी,अब वह जान चुका था—कहानी का अगला अध्याय गुरुदत्त का घर होगा…जहाँ मौत और सच्चाई दोनों उसकी प्रतीक्षा कर रहे थे। 

काव्या काँपती आवाज़ में बोली—“अर्जुन, ये हमें बार-बार मौत की तरफ़ क्यों खींच रहा है? हम ऐसे रास्ते पर क्यों जा रहे हैं ? जहाँ से लौटने की गारंटी नहीं?”

अर्जुन ने काव्या की तरफ देखा ,जो अभी एक बड़े हादसे से गुजरी है ,बेहद डरी हुई है ,अर्जुन सोच रहा था -ये भी, अब इसका हिस्सा बन चुकी है ,प्यार से काव्या की हथेली थामते हुए बोला -“क्योंकि सच वहीं मिलेगा,अगर हम इससे बचकर भागे, तो ये खेल कभी खत्म नहीं होगा,वो हमारा पीछा करेगा। बचकर भागने से बेहतर है ,उसका डटकर सामना किया जाये और काव्या… अब ये सिर्फ़ मेरी जिज्ञासा नहीं रही, ये ज़िंदगी और मौत का सवाल बन गया है।”

राघव, जो अब तक ख़ामोश खड़ा था, धीरे से बोला—“मैं तुम्हारे साथ हूँ ,लेकिन याद रखना अर्जुन !जो'' गुरुदत्त जूनियर'' ने कहा था… अब मौत तेरे हर कदम पर है।”

शहर के पुराने रजिस्ट्री ऑफिस से, फाइल निकालते-निकालते उन्हें घंटों लग गए ,थककर बुरा हाल हो चुका था। आख़िरकार पता चल ही गया —''गुरुदत्त का पुश्तैनी मकान शहर से बाहर, मंगला गाँव में है।''

अर्जुन, राघव और अबकि बार उनके साथ काव्या भी थी ,वे गुरुदत्त के पुश्तैनी मकान की तलाश में मंगला गाँव की ओर रवाना हो चुके थे। जब वे उस गांव में पहुंचे ,वह गांव लगभग वीरान हो चुका था। उनकी गाड़ी जैसे ही उस गांव में दाख़िल हुई, हवा का रुख़ ही बदल गया।

वे दोनों गाड़ी से उतरे ,ताकि कोई इंसान उन्हें दिखलाई दे ,किन्तु वहां टूटे-फूटे घर, सुनसान गलियाँ और जगह-जगह झाड़ियों में उलझी पगडंडियाँ !ऐसा लग रहा था- मानो यहाँ दशकों से कोई इंसान न रहा हो।किसी इंसान की तलाश में वे उस गांव में भटक रहे थे ,अब वे सोचने लगे ,क्या हमारा इस गांव में हमारा आना व्यर्थ रहा? वे वापस जाने की सोच ही रहे थे ,तभी उन्हें एक बुज़ुर्ग चरवाहा दिखलाई दिया जो वहाँ भेड़ें चरा रहा था।

राघव ने उससे पूछा—“बाबा !क्या आप जानते हैं, यहाँ गुरुदत्त का घर कहाँ है?”

बुज़ुर्ग उसका नाम सुनते ही एकदम चुप्प हो गया,उसकी आँखों में डर उतर आया।वह धीरे-धीरे बुदबुदाया—
“उस घर का नाम मत लो !वो घर नहीं, मौत का अड्डा है।”
इतना कहकर उसने मुँह फेर लिया और आगे बढ़ गया किन्तु जाने से पहले हाथ के इशारे से दिशा दिखा गया। 

अर्जुन ने गहरी साँस खींची,“यही तो सबूत है… यही घर सही जगह है। 

उस चरवाहे के इशारे के अनुसार वो आगे बढ़े ,जैसे ही वे हवेली के सामने पहुँचे, वहां का दृश्य खून जमा देने वाला था।

लोहे का टूटा दरवाज़ा, जिस पर जंग और खून जैसे धब्बे ,ऊँची दीवारों पर काँटेदार झाड़ियाँ लिपटी हुईं थीं 
टूटी खिड़कियाँ और अंदर अंधेरे में हल्की-हल्की सरसराहट।
हवेली पर नाम लिखा था—

“श्रीगुरुदत्त निवास, 1952”।

काव्या ने काँपते हुए कहा—“ये जगह तो… जिंदा कब्र जैसी लग रही है।”

हवेली के अंदर कदम रखते ही, एक भारी सन्नाटा फैल गया। हॉल में पुराने लकड़ी के फर्नीचर सड़े-गले पड़े थे। दीवारों पर धूल जमी,कुछ फटी तस्वीरें थीं—एक तस्वीर में,' गुरुदत्त सीनियर', लंबी दाढ़ी और गेरुए वस्त्रों में था।  

दूसरी में वही आदमी, लेकिन इस बार हाथ में छोटे बच्चों के साथ… मुस्कुराते हुए।

काव्या ने तस्वीर देखी और डरते हुए बोली—“कैसा आदमी होगा, जो मासूम बच्चों की हत्या करके भी हँस सकता है?”

अर्जुन ने धीरे से कहा—“शैतान भी कभी इंसान होता है…इस तस्वीर में उसका इंसानी चेहरा है, शैतानी  चेहरा नहीं। राघव ने टॉर्च की रोशनी उस दीवार पर डाली।वहाँ एक जगह ताज़ा निशान दिखे—जैसे किसी ने हाल ही में, दरवाज़ा खींचा हो।उन्होंने फर्श के कोने से एक छिपा हुआ, दरवाज़ा खोज निकाला। वह भारी ज़ंजीर से बंधा हुआ था। 

राघव ने ज़ोर लगाया, जंग लगी ज़ंजीर शीघ्र ही टूट गयी , दरवाज़ा खुलते ही, एक सीलन भरी बदबू नाक में घुस गई।

“ये तहख़ाना है…” अर्जुन बुदबुदाया।

वे सीढ़ियों से नीचे उतरने लगे ,हर कदम पर सीढ़ियाँ चरमरातीं, जैसे उनके नीचे उतरने का विरोध कर रही हों। तहख़ाने में पहुँचते ही, टॉर्च की रोशनी ने दीवार पर कुछ दिखाया—लाल रंग से लिखा हुआ मंत्र -

“रक्त ही द्वार है,बिना रक्त के कोई प्रवेश नहीं।”

काव्या उसका अर्थ समझते ही चीख़ पड़ी -“मतलब यहाँ आने के लिए… किसी का ख़ून चाहिए?”


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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