Qbar ki chitthiyan [part 7]

अर्जुन और राघव ,जब अनाथालय के तहखाने में सबूतों की तलाश में थे तब उन्हें उन बच्चों की आत्माएं दिखीं जो मुक्ति चाहती थीं। तब अर्जुन ने अपने हाथ की डायरी को ज़मीन पर पटककर, उसमें आग लगा दी। डायरी में आग लगते ही,उसमें से काला धुँआ निकलने लगा।  आग ने उस काले धुएँ को निगलना शुरू किया,जिसके कारण वहां पर बच्चों की चीख़ें गूँजने लगीं, जैसे सदियों पुराना दर्द बाहर निकल रहा हो और कुछ देर पश्चात सब कुछ शांत हो गया,हवा रुक गई, दीवारें स्थिर हो गईं।

अब उन्हें लगा शायद, अब सब ठीक हो जायेगा, अभी वे लोग, निश्चिन्त होकर खड़े ही हुए थे ,अचानक कमरे में ठंडी हवाएँ घूमने लगीं,लोहे का घेरा फिर से चमकने लगा और कमरे के दरवाज़े अपने आप बंद हो गए।

एक गहरी, भारी आवाज़ गूँजी—“बहुत देर कर दी अर्जुन !… अब तू ,बच नहीं पाएगा।”


वे उस आवाज की तरफ मुड़े ,दरवाज़े के पास एक आदमी खड़ा था — लंबा, दुबला, झुका हुआ,चेहरे पर जलने के पुराने निशान, आँखों में पागलपन।

“तुम…” अर्जुन ने फुसफुसाकर कहा -“गुरुदत्त जूनियर।”

वह हँस पड़ा — एक डरावनी, गूँजती हुई हँसी।“तुम सोचते हो मैंने अपने पिता के पापों का बदला नहीं लिया? ठहाके मारकर हँसते हुए बोला - मैंने सबको एक-एक कर जलाया है ,और अब… तुम्हारी बारी है।”

गुरुदत्त जूनियर ने जेब से, एक पुराना' माचिस बॉक्स' निकाला और राख के घेरे में आग लगा दी,जैसे ही आग फैली, बच्चों की आत्माएँ फिर से चीख़ने लगीं -“हमें मत जलाओ… हमें छोड़ दो…”

अर्जुन ने उन्हें बचाने के लिए आगे कदम बढ़ाया, लेकिन कोई अदृश्य ताक़त उसे पीछे धकेलने लगी।राघव भी कुछ नहीं कर पा रहा था।

''गुरुदत्त जूनियर'' आगे बढ़ा और अर्जुन के बिल्कुल करीब आ गया,उसकी साँसें अर्जुन के चेहरे से टकराईं ,उसकी सांसों से ,सड़ी हुई लाश जैसी बदबू आ रही थी।

“तूने मेरी नींद तोड़ी है… अब मैं, तेरी ज़िंदगी तोड़ दूँगा।”कहते हुए , अगले ही पल उसने अर्जुन को धक्का दिया। अर्जुन राख के घेरे में गिर पड़ा। राख़ में गिरते ही अर्जुन की आंखों के सामने, सब कुछ धुंधला पड़ने लगा, बच्चों की चीखें,' गुरुदत्त जूनियर' की डरावनी वहशी हंसी और राघव की अर्जुनननन  चिल्लाती आवाज सब एक साथ गूंज रही थीं ,आग उसके चारों ओर घूमने लगी। अर्जुन की आंखें धीरे-धीरे बंद हो रही थी और आखिरी चीज जो उसने देखी, वह थी-' गुरुदत्त जूनियर' का चेहरा, जो धीरे-धीरे उसके ऊपर झुकता जा रहा था

जब धुआँ छँटा और अर्जुन को होश आया, तो ज़मीन पर एक नई चिट्ठी रखी मिली।
उस पर लिखा था -
“तुमने सिर्फ़ एक बंधन तोड़ा है ,बाक़ी अभी भी कैद हैं ,उन्हें पाने के लिए तुम्हें ‘पितृशिला’ तक जाना होगा।”

राघव ने पूछा, “पितृशिला?”

अर्जुन ने गंभीर चेहरा बनाकर कहा -“शहर के बाहर वही पुराना श्मशान… जहाँ सब शुरू हुआ था।
अब कहानी वहीं वापस जाएगी।”

जब अर्जुन और राघव तहखाने से बाहर निकले और घर लौटे, तो दरवाज़ा खुला मिला।
सामान बिखरा था।घर में काव्या कहीं नहीं थी। मेज
 पर बस एक नोट पड़ा था -“अगर उसे ज़िंदा चाहते हो तो ‘पितृशिला’ आओ !–'' गुरुदत्त जूनियर”

अर्जुन के हाथ काँपने लगे।अब ये सिर्फ़ एक केस नहीं रहा।अब ये एक युद्ध  बन गया था।

                                                                ''काव्या की तलाश''

काव्या के गुम हो जाने के पश्चात अर्जुन का धैर्य टूट चुका था,वह मेज  पर रखी ,'गुरुदत्त जूनियर' की लिखी पर्ची को कसकर पकड़े हुए था।

राघव ने अर्जुन के कंधे पर हाथ रखा,और बोला -“अर्जुन, ये अब व्यक्तिगत हो गया है लेकिन हम अभी जल्दबाज़ी में कोई भी ऐसा कदम नहीं उठा सकते,जिसके लिए बाद में हमें पछताना पड़े। 

अर्जुन को जबसे पता चला था कि मेरे कारण ,काव्या गायब हो चुकी है ,तबसे रोते -रोते  उसकी आँखें सूजकर लाल हो गयी थीं ,अर्जुन ने लाल आँखों से, राघव की ओर देखा और क्रोध और पछतावे से बोला -“ये खेल अब बहुत हो चुका।अगर आज रात मुझे काव्या नहीं मिली … तो मैं भी ,उस राख में बदल जाऊँगा।

काव्या को कुछ नहीं होगा ,तुम्हें धैर्य और हिम्मत से काम लेना होगा ,मैं तुम्हारे साथ हूँ ,अब हमें ''पितृशिला ''की यात्रा के लिए प्रस्थान करना चाहिए। तुम तैयारी कर लो !हम लोग रात्रि में निकलेंगे। 

रात का समय था ,चाँद बादलों के पीछे छिपा था और हवाएँ अजीब सी गंध लेकर बह रही थीं।अर्जुन और राघव, दोनों ने गाड़ी रोककर' पितृशिला' श्मशान की ओर कदम बढ़ाए।यह जगह अब पहले से भी, ज्यादा डरावनी लग रही थी।काई लगी कब्रें, जले हुए लकड़ी के ढेर और टूटी-फूटी समाधियाँ ! चारों ओर उल्लूओं और गीदड़ों  की आवाज़ें गूँज रही थीं,वहां पर भयावही शांति थी,वो सन्नाटा भी डरा रहा था। वे आगे बढ़ते रहे ,श्मशान के बीचोंबीच एक विशाल पत्थर था—“पितृशिला”।

यह वही जगह थी, जहाँ वर्षों से चिताएँ जलाई जाती थीं लेकिन आज वहाँ कुछ अलग था।पत्थर पर राख से खींचा गया एक बड़ा गोला बना था।उस गोले में 10 छोटे-छोटे दीये जल रहे थे।

अर्जुन फुसफुसाया -“ये वही 10 आत्माएँ हैं… जो अब भी कैद है। 

तुम ये सब छोडो ! पहले काव्या को ढूंढों ,वो जिन्दा है ,आत्माओं के पीछे भागना बंद करो !अचानक उनकी नज़र काव्या पर पड़ी—गोले के दूसरी तरफ़ काव्या खड़ी थी,उसके हाथ-पाँव बंधे हुए थे , आँखों पर पट्टी थी ,वह धीरे-धीरे कराहते हुए पुकार रही थी -“अर्जुन… बचाओ…!”

अर्जुन दौड़कर उसकी ओर बढ़ा, लेकिन तभी एक हवा का झोंका उठा और गोले की आग तेज़ हो गई और काव्या की ओर अदृश्य दीवार खड़ी हो गई।अर्जुन उस दीवार से टकराकर पीछे गिर पड़ा -“काव्या..... !

तभी अंधेरे से एक आवाज़ गूँजी -“बहुत कोशिश कर ली, अर्जुन !अब देख… मेरी दुनिया कैसी है ?”

पेड़ों की छाया से एक लंबा आदमी बाहर आया, तन पर गेरुए कपड़े, गले में हड्डियों की माला और हाथ में जलती हुई मशाल !उसका चेहरा झुर्रियों भरा हुआ था लेकिन उसकी आँखें खून जैसी लाल थीं जो अँधेरे में भी चमक रहीं थीं। 

“मैं हूँ,' गुरुदत्त जूनियर'' वो वारिस… जिसने अपने पिता का काम अधूरा नहीं छोड़ा।”

अर्जुन ने गुस्से से कहा -“तेरे पिता का काम बच्चों की हत्या करना और बेचारे बच्चों की आत्माओं को कैद करना था ,और तू भी वही कर रहा है।”

गुरुदत्त हँस पड़ा और बोला -“ये हत्यायें नहीं… ये 'बलिदान' है।आत्माएँ मेरी ताक़त हैं और अब तेरी बीवी भी इसी ताक़त का हिस्सा बनेगी।” कहते हुए ,गुरुदत्त ने मंत्र पढ़ना शुरू किया -उसके शब्द अजीब थे, मानो किसी पुरानी भाषा के हों,जैसे ही उसने मंत्र पढ़ा , गोले के दीये एक-एक करके तेज़ चमकने लगे।

हवा में, धुएँ से, बच्चों की आकृतियाँ उभरने लगीं—वही 10 आत्माएँ, चीख़ती और कराहती हुई।

अर्जुन ने राघव से कहा,“अगर ये आत्माएँ पूरी तरह बंध गईं, तो काव्या मर जाएगी।”

अर्जुन के इतना कहते ही ,राघव ने पिस्तौल निकाली और गुरुदत्त की ओर तान दी ,लेकिन गुरुदत्त ने एक उँगली उठाई और अचानक राघव हवा में उछलकर दूर जा गिरा और उसके हाथ से पिस्तौल भी छूट गई।

गुरुदत्त गरजा—“ये साधारण हथियार मुझे नहीं रोक पायेंगें ,कहते हुए ठठाकर हंसने लगा। 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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