Qabr ki chitthiyan [part 4]

                                                      ''आग के बाद की खामोशी''

अब तक आपने पढ़ा ,'अर्जुन सान्याल' जो एक पत्रकार है ,उसे एक पत्र आता है ,जो आठ मार्च को रोहिणी सैक्टर पंद्रह के स्कूल में बीस बच्चों की मृत्यु की सच्चाई को सामने लाने के लिए कहता है। अब इस कार्य में अर्जुन अपने मित्र इंस्पेक्टर राघव की सहायता लेता है ,उस केस की छानबीन करते हुए वो दोनों स्कूल से होते हुए, पुराने श्मशान में चले जाते हैं ,जहाँ अचानक ही वहां पड़ी घास में आग लग जाती है। श्मशान में अचानक उठी आग, अब बुझ चुकी थी। जली हुई घास की राख,अब हवा में उड़ रही थी किन्तु अर्जुन ने अपने हाथ में जो बक्सा पकड़ा हुआ था,वह बक्सा अभी भी गर्म था, मानो उसके भीतर कोई अदृश्य आग जल रही हो।


राघव का माथा घबराहट और आग की तपन से पसीने से भीग चुका था।

“अर्जुन… ये सब इंसानी खेल नहीं है, मैंने अपने जीवन में बहुत केस देखे हैं, लेकिन आज जो देखा… उसे किसी तर्क से नहीं समझा सकता।

अर्जुन ने धीरे से बक्से को ठीक से बंद किया और किसी दृढ़ निश्चय के साथ राघव से बोला - ये तो बस शुरुआत है, राघव ! अब हमें उस आदमी को ढूँढना होगा… जिसका नाम 'गुरुदत्त पांडे' है , वही हमें अगला सच बताएगा।”

राघव ने भौंहें चढ़ाईं,और अर्जुन की तरफ देखा ,वो मन ही मन सोच रहा था ,इतना सब हो जाने के पश्चात भी..... ये अब आगे बढ़ना चाहता है,तब बोला -और अगर ये आदमी भी मर चुका हो,तब क्या होगा ?

अर्जुन ने ठंडी और गहरी सांस भरी,“तो उसकी परछाईं ज़रूर ज़िंदा होगी।”कहकर मुस्कुरा दिया।

अगले दिन अर्जुन पुराने रिकॉर्ड्स की खोज में, शहर की बहुत पुराने पुस्तकालय में  पहुँच गया। वहाँ पुराने अखबारों और रजिस्टरों का ढेर पड़ा हुआ था।उसने उस पुस्तकालय के क्लर्क से बात की और कहा -मुझे एक व्यक्ति का पता लगाना है ,क्या आप इसमें मेरी सहायता करेंगे। 

मैं आपकी बस इतनी ही सहायता कर सकता हूँ ,कि कौन सी फाइल कहाँ रखीं हैं ,बाकि सब आपको स्वयं ही खोजना होगा। 

अर्जुन उसकी बात से सहमत हो गया और घंटों की परिश्रम के पश्चात उसे एक काम की चीज मिली ,वो थी ,एक अखबार की कतरन मिली—साल 1994, हेडलाइन में लिखा था:

“गुरुदत्त पांडे – नगर श्मशान का चितानायक”

लेख में स्पष्ट लिखा था कि' गुरुदत्त' श्मशान घाट का मुख्य देखभाल करने वाला था।उसी के हाथों से दर्जनों लोगों की चिताएँ जलाई गईं थीं ,लेकिन अचानक एक रात वह ग़ायब हो गया।न जाने कहाँ गया ?कोई नहीं जानता ,कुछ 
लोगों का कथन था - कि उसे किसी अभिशाप ने निगल लिया।

अखबार की उस कतरन के आखिरी हिस्से में, उसकी एक धुंधली सी तस्वीर थी—'करीब पचास साल का अधेड़ उम्र व्यक्ति , लंबी सफ़ेद दाढ़ी, गहरी आँखें।अर्जुन ने उस  तस्वीर को गौर से देखा और तुरंत जेब में रख लिया।मन ही मन सोच  रहा था ,इसकी तलाश में “अब इस शहर का हर कोना खंगालना पड़ेगा।”वहां से निकलकर अर्जुन सीधा राघव के पास गया और उसे सारी बात बताई और उसे वो अख़बार की कतरन भी दिखाई। 

अर्जुन की बातें सुनकर ,राघव अब भी आश्वस्त नहीं हुआ और बोला -देखो, अर्जुन ! एक आदमी तीस साल पहले ग़ायब हो चुका है।आज अगर ज़िंदा भी होगा तो अस्सी साल का बुड्ढा होगा।हमें भूत पकड़ने की बजाय, असली अपराधी पर ध्यान देना चाहिए।”

अर्जुन ने राघव की बात सुनी तो गम्भीर स्वर में कहा—अगर गुरुदत्त मर चुका है, तो उसके बारे में चिट्ठी में क्यों लिखा है? उस आत्मा ने हमें उसी का नाम क्यों दिया?”

अर्जुन की बात सुनकर ,राघव चुप हो गया,उसकी चुप्पी में डर और सवाल दोनों छिपे थे।

 शाम का समय था ,अर्जुन अपने घर की बालकनी में बैठा था, चाय पीते हुए ,बाहर के मौसम का लुत्फ़ उठा रहा था बारिश की हल्की-हल्की बूँदें गिर रही थीं,तभी नीचे गली में उसे एक औरत दिखलाई दी —वह सफ़ेद साड़ी में लिपटी हुई थी , हाथ में लालटेन लिए हुए थी। 

उसने धीरे-धीरे सिर उठाकर अर्जुन की ओर देखा,उसकी आँखें अजीब थीं—गहरी, धंसी हुई, लेकिन उनमें एक चमक थी,उसने धीरे से कहा—“गुरुदत्त पांडे को मत ढूँढो… वरना मौत तुम्हारे घर आएगी।”

अर्जुन तभी तेजी से उठा और सीढ़ियों से भागते हुए नीचे आया ,लेकिन गली सुनसान थी।
न लालटेन, न वो औरत—कुछ भी नहीं था। 

अर्जुन जब वापस ऊपर आया तो काव्या पहले से ही उसकी प्रतीक्षा कर रही थी ,उसके हाथ काँप रहे थे,उसके चेहरे पर घबराहट स्पष्ट नजर आ रही थी ,अर्जुन को देखते ही बोली -अर्जुन, मैं तुमसे सच जानना चाहती हूँ। मुझे हर रात अजीब से सपने आते हैं और मैं उन सपनों से डरकर उठ जाती हूँ। ये सब मेरे साथ क्या हो रहा है ?मुझे ,बच्चों की चीख़ें सुनाई देती हैं… और कोई मुझे पुकारता है—‘काव्या… हमारी चिट्ठी पढ़ो।’ये सब क्या है?”कहते हुए वो रोने लगी। 

अर्जुन के पास कोई जवाब नहीं था।उसने बस, काव्या को गले लगा लिया  विश्वास दिलाते हुए बोला -''मैं कसम खाता हूँ, तुम्हें कुछ नहीं होने दूँगा।”लेकिन अंदर ही अंदर वह जान गया था—काव्या भी ,अब इस खेल का हिस्सा बन चुकी है।

अगले दिन अर्जुन और राघव शहर के पुराने मंदिर पहुँचे,वहाँ एक बूढ़ा साधु बैठा हुआ था, जिसे लोग “भैरवनाथ” कहते थे।वह दशकों से वहीं रह रहा था, और शहर के हर अंधेरे रहस्य को जानता था।

अर्जुन ने अपनी जेब से वो अख़बार की कतरन निकाली और उसमें से उस बूढ़े व्यक्ति को तस्वीर दिखाते हुए पूछा—“क्या आप इसे पहचानते हैं? ये गुरुदत्त पांडे है। ”

साधु ने उस तस्वीर को ध्यान से देखा और अपनी आँखें बंद कर लीं,जैसे ध्यान लगा रहा हो, एकदम से उसकी आवाज़ भारी होने लगी -
“गुरुदत्त… वो आदमी, जिसने बच्चों की आत्माएँ बेच दी थीं,उसने एक रात, गुप्त मन्त्रों से बीस बच्चों की चिताएँ जलाकर उनकी आत्माएँ बाँध दीं थीं ,लेकिन उसकी अपनी मौत… बहुत रहस्यमयी हुई थी।लोग कहते हैं - उसकी आत्मा भी अभी तक  मुक्त नहीं हुई है। वो अब भी, श्मशान के उस हिस्से में है… जहाँ कोई जाता नहीं है ।”

राघव ने काँपते स्वर में पूछा—“क्या मतलब है ,आपका?”

साधु ने धीमे से कहा—“उसका शरीर मिट्टी में नहीं… राख में दबा है,और उसकी आत्मा… हर उस इंसान का पीछा करती है, जो उसका नाम लेता है ।”

दहशत के कारण ,अर्जुन की रगों में खून जम गया,उसने जेब से निकाली चिट्ठी देखी।उस पर वही नाम लिखा था—गुरुदत्त पांडे ''

उसी रात्रि से, अर्जुन के कमरे में अजीब सी घटनाएँ होने लगीं,लाइट बार-बार टिमटिमाने लगी।आईने में उसकी अपनी परछाईं विकृत दिखने लगी—कभी चेहरा लंबा, आँखें खून से भरी तो कभी बड़े -बड़े दाँत और बाहर को निकली हुई बड़ी -बड़ी आँखें !और अचानक उस आईने में उसने देखा—गुरुदत्त पांडे की वही शक्ल, सफ़ेद दाढ़ी वाला आदमी, उसकी ओर घूरता हुआ,अर्जुन उसकी आँखों को अधिक देर तक न देख सका उसने झटके से आँखें बंद कर लीं। कुछ देर के पश्चात जब अपनी आँखें पुनः खोलीं तो आईना सामान्य था।

किन्तु उसने देखा , फर्श पर राख बिखरी हुई थी…और राख पर लिखा था—
“अब मैं तेरे साथ हूँ। ''


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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