Nadi

 नीले आँचल को फैला,नन्हीं बूंदों से निकली वो सैर करने,

 लहराती ,बलखाती ,कभी चट्टानों पर, तो कभी मैदानों में। 

मासूम ,सलौना स्वरूप उसका ,चली सबकी प्यास बुझाने। 

जीव हो या जंतु ,मानव हो या दानव,चली समभाव में लहराने।



राहें हों संकरी ,या फिर पथरीली, राह बना आगे बढ़ जाती।

न थकती ,न ठहरती ,अनवरत आगे बढ़ती, चलती ,रहती। 

गगन दर्पण उसका ,गगन के रंग संग , रंग अपना मिलाती।

स्वच्छ ,निर्मल स्रोत ,कभी मानव निर्मित नाले में मिल जाती। 


 जलधारा से आंचल में मीन ,कच्छप, जैसे मोती पलते रहे।  

 बादलों से नाता पुराना, गगन को संदेश, भिजवाती रहे ।

 बैठ ,जीव जंतु तृषा बुझाते रहे, जीवनधन दे मुस्कुराती रही।

जीवनदायिनी माँ, सखी यमुना,सरस्वती से मिल त्रिवेणी बनाती रही।    


प्रसन्न हो ,गगन उमड़ उठता प्यार में, रहा प्रेम अपना बरसाता। 

घुमड़ -घुमड़ धरती की प्यास बुझाता, नदी में समा प्रेम दर्शाता।

बिन किसी भेदभाव ,अमृत बन, अपनी यात्रा में आगे बढ़ जाती। 

आंचल फैला अपना ,सहनशीला बन, वो सागर से मिलने जाती।  

  

  

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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