नीले आँचल को फैला,नन्हीं बूंदों से निकली वो सैर करने,
लहराती ,बलखाती ,कभी चट्टानों पर, तो कभी मैदानों में।
मासूम ,सलौना स्वरूप उसका ,चली सबकी प्यास बुझाने।
जीव हो या जंतु ,मानव हो या दानव,चली समभाव में लहराने।
राहें हों संकरी ,या फिर पथरीली, राह बना आगे बढ़ जाती।
न थकती ,न ठहरती ,अनवरत आगे बढ़ती, चलती ,रहती।
गगन दर्पण उसका ,गगन के रंग संग , रंग अपना मिलाती।
स्वच्छ ,निर्मल स्रोत ,कभी मानव निर्मित नाले में मिल जाती।
जलधारा से आंचल में मीन ,कच्छप, जैसे मोती पलते रहे।
बादलों से नाता पुराना, गगन को संदेश, भिजवाती रहे ।
बैठ ,जीव जंतु तृषा बुझाते रहे, जीवनधन दे मुस्कुराती रही।
जीवनदायिनी माँ, सखी यमुना,सरस्वती से मिल त्रिवेणी बनाती रही।
प्रसन्न हो ,गगन उमड़ उठता प्यार में, रहा प्रेम अपना बरसाता।
घुमड़ -घुमड़ धरती की प्यास बुझाता, नदी में समा प्रेम दर्शाता।
बिन किसी भेदभाव ,अमृत बन, अपनी यात्रा में आगे बढ़ जाती।
आंचल फैला अपना ,सहनशीला बन, वो सागर से मिलने जाती।
