सुबह होते ही, अर्जुन का चेहरा थकावट से झुका हुआ था। बीती रात का आग का हमला, बूढ़े की मौत, और “अनाथालय” शब्द… सब कुछ एक ही धुंधली सी तस्वीर में घूम रहा था।
काव्या ने उसकी हालत देखी ,तो वह समझ गयी ,ये रातभर जागा है , जबरदस्ती उसे कुछ देर के लिए सुला दिया, लेकिन जैसे ही वह अपनी आँखें बंद करता ,जलते हुए बूढ़े की चीखें उसके कानों में गूंजती ,उसकी नींद में भी बच्चों की चीख़ें गूँजती रहीं। सुबह जब उठा ,तब उसे वो अधजला कागज़ स्मरण हुआ ,उसने उस कागज़ को खोला -जिसमें एक शब्द लिखा था 'अनाथालय '
तब अर्जुन सीधा थाने पहुंचा और राघव को पूरी बात बताई ,उसकी बात सुनकर राघव ने' माथा पिट लिया'' और बोला - अर्जुन इस शहर में एक ही पुराना अनाथालय है -''शांति बाल निकेतन। ''लेकिन वो तो बच्चों की रहस्यमयी मौतों के बाद ,बीस साल पहले ही बंद हो गया था।
यही तो कड़ी है ,''गुरुदत्त जूनियर'' का उन बच्चों से कोई न कोई रिश्ता अवश्य रहा होगा ,अर्जुन ने कहा।
किन्तु मैंने सुना है ,वो जगह शापित है ,राघव ने चेताया।
देखते हैं ,क्या मालूम? वहीं जाकर कोई रास्ता मिल जाये।
कुछ देर पश्चात अर्जुन और राघव दोनों अनाथालय में पहुँचे।शहर के किनारे पर ,यह जगह अब खंडहर बन चुकी थी — टूटी खिड़कियाँ, झड़ती दीवारें और जंग लगे गेट। बोर्ड पर से अब आधा नाम मिट चुका था। 'निकेतन' ही रह गया था।
राघव ने दरवाज़े को ज़ोर से धक्का दिया, वह चरमराता हुआ खुल गया।अंदर गहरी बदबू थी, जैसे सालों से किसी ने वहाँ कदम ही नहीं रखा था।
फाइलों में अर्जुन ने पहले ही पढ़ लिया था कि इस अनाथालय में 30 से ज़्यादा बच्चे पले-बढ़े थे,लेकिन अचानक बीस बच्चे एक ही रात में “ग़ायब” हो गए ,कहानी यहीं से शुरू हुई थी।
जैसे-जैसे वे अंदर बढ़े, हवा और भारी होती गई। हॉल में पुराने खिलौने बिखरे पड़े थे — एक टूटी गुड़िया, जंग लगा झूला, और एक लकड़ी का घोड़ा जिसकी आँखें मानो अर्जुन को घूर रही थीं। दीवारें टूटी हुई थीं ,चारों तरफ घास उगी हुई थी। दरवाज़ा बंद नहीं था ,ऐसा प्रतीत हो रहा था ,जैसे किसी ने जानबूझकर खुला छोड़ा हो। जैसे -जैसे वे अंदर बढ़ते जा रहे थे ,अंदर घुसते ही बेहद सड़ी हुई गंध नथुनों में घुस गयी। दीवारों पर बच्चों के द्वारा बनाई ,अधूरी मिटी तस्वीरें थीं।'' कभी यहां ज़िंदगी गूंजती थी''...... राघव ने धीमे से कहा।
अब सिर्फ ''मौत'' बोलती है ,अर्जुन ने जबाब दिया।
राघव ने कहा -“मुझे यह जगह बिल्कुल पसंद नहीं है , चलो ! यहाँ से निकल चलते हैं।”
“नहीं,” अर्जुन ने धीमे से जवाब दिया -“यही वो जगह है जहाँ बच्चों की आत्माएँ बंधी हैं और शायद… ''गुरुदत्त जूनियर'' भी यहीं कहीं है।
कमरे के कोने में अर्जुन को दीवार पर कुछ उकेरा हुआ दिखा,वह पास गया और टॉर्च जलाई,बीस नाम… एक के बाद एक,हर नाम के नीचे एक तारीख़ लिखी थी — और सभी एक ही दिन की थी
राघव ने फुसफुसाकर कहा,“ये वही दिन है जब बच्चे ग़ायब हुए थे…”और अचानक, दीवार की सतह ठंडी हो गई।अर्जुन ने हाथ रखा तो जैसे किसी ने भीतर से पकड़ लिया हो,फिर बच्चों की वही आवाज़ गूँजी —“हम यहीं हैं…“हमें बाहर निकालो…”
उसके पश्चात,वे एक हॉल में गए ,वहां एक टूटी हुई अलमारी थी ,जिसमें कुछ पुरानी फाइलें थीं ,धूल और मकड़ी के जालों में लिपटी उन फाइलों को अर्जुन ने बड़ी सावधानी से उठाया। एक फ़ाइल में २००8 की वही घटना दर्ज़ थी -बीस बच्चों की मृत्यु !
कारण -अज्ञात घटना !के पश्चात अनाथालय बंद !
प्रभारी -श्री राघवेंद्र पांडे [उर्फ़ गुरुदत्त जूनियर ]
उस फ़ाइल को पढ़कर अर्जुन को झटका लगा -राघवेंद्र पांडे !यानी वही.....
राघव ने भी हैरानी से वो फ़ाइल देखी,इसका मतलब जूनियर यहीं प्रभारी था और ये हादसा कोई हादसा नहीं ,कुछ और ही था।
राघव ने घबराकर पिस्तौल निकाल ली,“अर्जुन, यह सब खेल है। चलो,यहाँ से बहुत हो गया!”
लेकिन अर्जुन की आँखें अब किसी और ही दुनिया में थीं।
तभी ठंडी हवा लगने लगी, कमरे में अचानक एक अजीब सी नमी फैल गयी, फिर बच्चों की हल्की-हल्की हंसी सुनाई देने लगी, अर्जुन धीरे से फुसफुसाया -''सुना''
हां, राघव ने जवाब दिया ,राघव की आवाज काँप रही थी।
वो हंसी ! अब ,धीरे-धीरे रोने में बदल गई, हमें घर जाना है.... हमें क्यों जलाया गया ? हम दोषी नहीं थे.... वे आवाज़ें हर कोने से आने लगीं , दीवार से, फर्श से यहां तक की छत से भी.....
राघव ने पीछे हटने की कोशिश की और बोला- अर्जुन ! यहां कुछ भी ठीक नहीं है लेकिन अर्जुन उन आवाजों के पीछे-पीछे चलता हुआ अनाथालय के तहखाना की तरफ जाने लगा। वे एक संकरी सीढ़ी से नीचे उतरने लगे।
सीढ़ियों के नीचे एक तहख़ाना था — अँधेरा, गीला और सड़ा हुआ। जैसे किसी ने जानबूझकर इसे बंद कर रखा हो। तहखाना का दरवाजा जंग लगा और भारी था, काफी कोशिश करने के बाद अर्जुन ने उसे खोला, अंदर का नजारा देखकर उसकी सांसें थम गईं ।
तहख़ाने के बीचों-बीच बीस लकड़ी के बक्से रखे थे,हर बक्से पर वही गोला बना था।
अर्जुन ने एक बक्सा खोला — अंदर राख थी।
दूसरा खोला — उसमें बच्चों के पुराने खिलौने थे।
तीसरा खोला — उसमें एक चिट्ठी थी।
उसमें लिखा था -"हमारे नाम मिटा दिए गए, लेकिन हम मिटे नहीं।''गुरुदत्त'' ने हमें आग में झोंका।अब उसका बेटा भी वही खेल खेल रहा है।अगर हमें मुक्त करना है, तो ‘शुद्धि-कक्ष’ ढूँढो।वही जगह है जहाँ हमारी आत्माएँ कैद हैं।
दीवारों पर राख से बीस नाम लिखे थे। हर नाम के नीचे बच्चों के हाथों की छोटी-छोटी हथेलियों के निशान।कमरे के बीचोंबीच एक बड़ा लोहे का गोला पड़ा था, जैसे कोई ''अनुष्ठान यंत्र'' हो।
और उसके पास ही एक डायरी रखी थी।अर्जुन ने उसे उठाया,उसके पहले ही पन्ने पर लिखा था:
“मैं राघवेंद्र पांडे हूँ।
मेरे पिता ने मुझे सिखाया था कि मौत से भी बड़ी ताक़त है ‘बंदी आत्माएँ’।
मैंने वही किया… बीस आत्माएँ अब मेरी हैं।वे हमेशा मेरे आदेश पर चलेंगी।”
अर्जुन की आँखें फैल गईं।वह थोड़ा आगे बढ़ा ,तहख़ाने के पीछे भी ,एक छोटा-सा दरवाज़ा था, आधा सड़ा हुआ।
अर्जुन ने उसे ज़ोर से धक्का दिया,अंदर जो उन्होंने देखा, उसने उनकी सांसें रोक दीं।
कमरा गोलाकार था।बीच में एक बड़ा लोहे का घेरा — राख और खून से बना।दीवारों पर बच्चों के हाथों के निशान, कुछ छोटे-छोटे खिलौने और राख से लिखे मंत्र।
और कमरे के बीचों-बीच… हवा में तैरती बीसआकृतियाँ।धुंधली, पारदर्शी, लेकिन बच्चों जैसी,उनकी आँखों में दर्द और ग़ुस्सा दोनों थे।
“हमें मुक्त करो…”
“हमने क्या किया था…”
“उसे रोको…”
राघव अब तक जो कुछ देख रहा था, उसने उसकी पुलिस ट्रेनिंग की सारी सीमाएँ तोड़ दीं।“हे भगवान…” वह बुदबुदाया।
अचानक कमरा हिलने लगा।हवा में राख घूमने लगी और दीवारों पर लिखे नाम लाल होकर चमकने लगे।अर्जुन और राघव पीछे हटे, लेकिन दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया।
और फिर धुएँ से आकृतियाँ बनने लगीं—छोटे-छोटे बच्चे, जली हुई त्वचा, ख़ाली आँखें।वे चुपचाप अर्जुन की तरफ़ बढ़ने लगे।
“हमें आज़ाद करो…”
“हम दर्द में हैं…”
“हमें मुक्ति दो…”
राघव ने पिस्तौल निकाली लेकिन अर्जुन ने रोका।“गोली नहीं… इन्हें मुक्ति चाहिए।”
