अलसाई सी सुबह थी ,अर्जुन रात्रि में ठीक से सो नहीं पाया था, रात्रि की ख़ुमारी अभी भी थी ,तभी अर्जुन के फोन की घंटी बजी ,न जाने इतनी सुबह -सुबह किसका फोन आ गया ? बुदबुदाते हुए ,अर्जुन ने फोन उठाया - तुझे सुबह -सुबह परेशान कर रहा हूँ ,तेरे लिए एक चौंकाने वाली ख़बर है, जल्दी से थाने आ जा !राघव ने कहा।
अभी आता हूँ ,अर्जुन का आलस्य न जाने कहाँ छू हो गया ? तुरंत ही बिस्तर से उठा और तैयार होने लगा।
काव्या चाय लेकर आई थी किन्तु उसने देखा,अर्जुन तो पहले ही बाथरूम में पहुंच चुका है ,अवश्य ही इन्हें कुछ स्मरण हुआ होगा या फिर किसी कार्य से बाहर जाना होगा ,तभी इतनी जल्दी तैयार हो रहे हैं ,यह सोचकर वो नाश्ता बनाने के लिए रसोईघर में घुस गयी। अर्जुन तैयार होकर बाहर जाने लगा। काव्या पीछे से बोली -नाश्ता तो करके जाइये !
कोई बात नहीं ,अभी समय नहीं है ,मैंने चाय पी ली है ,नाश्ता थाने में ही कर लूंगा कहकर घर से बाहर निकल गया।
जब अर्जुन थाने पहुंचा ,राघव उसकी ही प्रतीक्षा में था ,उसे देखते ही बोला -“अर्जुन… मैंने एक पुरानी केस फाइल्स खंगालीं।'गुरुदत्त पांडे' का कोई आधिकारिक मृत्यु रिकॉर्ड नहीं है। लेकिन…”कहकर वो वह रुक गया।
अर्जुन ने अधीर होकर पूछा —“लेकिन, क्या?”
राघव ने धीरे से फाइल खोली और तस्वीर दिखाई।“ये देखो… बीस साल पुराना केस। एक आदमी पर बच्चों के अपहरण का शक था।उसका नाम था—''गुरुदत्त पांडे जूनियर।”
अर्जुन की आँखें चौड़ी हो गईं।“जूनियर… यानी क्या?”
राघव ने ठंडी आवाज़ में कहा—“यानी गुरुदत्त का बेटा, अब भी ज़िंदा है और शायद वही इन सबके पीछे है।”
ख़ामोशी में अर्जुन के कानों में फिर वही बच्चों की फुसफुसाहट गूँजी—“हमें मुक्त करो…!
गुरुदत्त… जूनियर को रोको !
अर्जुन के सामने अब एक नया रहस्य खड़ा था—क्या यह सब उसके पिता की आत्मा का खेल था?या ज़िंदा बेटा ही इस खून-खराबे के पीछे था?
''बारिश में डूबी रात''
रात का समय था,बारिश लगातार हो रही थी और सड़कें वीरान थीं।अर्जुन अपनी गाड़ी से घर वापस लौट रहा था।
धीमी आवाज में रेडियो पर कोई गाना बज रहा था, लेकिन अर्जुन का ध्यान रेडियों के किसी भी गाने की तरफ नहीं था ,ध्यान बार-बार चिट्ठियों और गुरुदत्त जूनियर के नाम पर जा रहा था।
तभी अचानक गाड़ी का टायर फटा,गाड़ी डगमगाकर सड़क किनारे रुक गई ,अब ऐसे समय में क्या नई मुसीबत आ गयी बुदबुदाते हुए अर्जुन कार से बाहर निकला और उसने टॉर्च जलाई। जैसे ही, वह नीचे झुककर टायर को देखने का प्रयास करने लगा, उसे अपने पीछे किसी की उपस्थिति महसूस हुई।उसने तुरंत ही टॉर्च घुमाई—लेकिन वहाँ सिर्फ़ बारिश थी।
फिर भी कानों में धीमी फुसफुसाहट गूँजी—“अब तेरा नंबर है…”
घबराहट के कारण,अर्जुन पसीने से भीग गया, जबकि आसमान से ठंडी बूँदें बरस रही थीं ,उसने टायर बदलने का इरादा छोड़ दिया और घबराहट के कारण वहां से भागना ही उचित समझा ,गाड़ी को वहीं छोड़ वो तेज गति से भागने लगा ,वो इस तरह भाग रहा था ,जैसे उसके पीछे कोई भूत पड़ा हो। लगभग आधे घंटे भागने के पश्चात, उसे लिफ़्ट मिल गयी।
अगले दिन सुबह इंस्पेक्टर राघव, अर्जुन के दरवाज़े पर पहुँचा,उसके चेहरे पर तनाव था।“अर्जुन ! तुम्हें तुरंत मेरे साथ चलना होगा।
क्या हुआ ?
शहर में एक और मौत हुई है… और मामला अजीब है।”
दोनों घटनास्थल पर पहुँचे—वह एक पुराना गोदाम था,अंदर ज़मीन पर एक आदमी की लाश पड़ी थी।उसका चेहरा बुरी तरह से जला हुआ था, मानो उसे जैसे आग में धकेला गया हो।
लेकिन सबसे भयानक बात यह थी—लाश के बगल में राख से खींचा वही गोला बना हुआ था और उसके बीचों-बीच एक चिट्ठी रखी थी।अर्जुन ने उस चिट्ठी को उठाया और कांपते हाथों से उसे खोला।
उसमें लिखा था -"गुरुदत्त का खून अब तुम्हारे शहर में बह रहा है,एक-एक करके अब सब मरेंगे और अगला नाम… अर्जुन।”
राघव ने अर्जुन की ओर देखा -“इसका मतलब साफ़ है, कोई तुझे निशाना बना रहा है ,राघव ने कहा।
पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद पता चला—मृत आदमी का नाम' श्यामलाल 'था और वह, वही व्यक्ति था जो कभी 'गुरुदत्त पांडे' का सहयोगी रहा था।श्मशान में बच्चों की चिताएँ जलाने के वक्त वह भी वहीं मौजूद रहता था।
अब अर्जुन की समझ में आने लगा— कोई अपना पुराना हिसाब चुकता कर रहा है,पहले गुरुदत्त, अब उसके साथी… और अगला शिकार मैं हूँ।”
राघव ने ठंडी आवाज़ में कहा—कहीं ऐसा तो नहीं , गुरुदत्त जूनियर अपने पिता के गुनाहगारों को खत्म कर रहा है।”
जब अर्जुन घर लौटा तो उसने देखा कि काव्या रो रही थी,अर्जुन ने जब काव्या से उसके रोने का कारण पूछा ,तब काव्या ने, उसके कमरे की दीवार की तरफ इशारा किया ,जिस पर राख से लिखे शब्द थे—
“काव्या, अब तेरी बारी।”
काव्या काँपते हुए बोली—“अर्जुन, कोई हमारे घर तक पहुँच चुका है।मुझे यहाँ से ले चलो, कहीं दूर…”अब मुझे यहां नहीं रहना है
अर्जुन ने उसे गले लगाया, लेकिन अंदर से वह भी टूट रहा था।अब सिर्फ़ उसकी नहीं, काव्या की जान भी खतरे में थी।
रात्रि में अर्जुन को एक अनजान नंबर से कॉल आया,उस फोन वाले ने धीमी और भारी आवाज़ में कहा—
“अगर गुरुदत्त जूनियर की सच्चाई जानना चाहता है, तो कल रात रेलवे कॉलोनी के खंडहरों में आ जाना,लेकिन ''अकेले।”
कॉल कट गया,अर्जुन ने राघव को फोन करने की कोशिश की, लेकिन लाइन बार-बार डिस्टर्ब हो रही थी।
जैसे कोई ताक़त उसे रोक रही है।
रात्रि के लगभग 12 बजे अर्जुन' रेलवे कॉलोनी' पहुँचा,वहाँ बहुत पुरानी टूटी इमारतें थीं, चारों तरफ अंधेरा।सन्नाटे में सिर्फ़ पटरियों पर चलते हुए उसकी नजरें इधर -उधर घूम रहीं थीं ,तब उसे एक कमरे की तरफ लगा जैसे वहां कोई है ,तब वो उसी दिशा में बढ़ चला,वहां अँधेरे में आँखें फाड़ -फाड़कर देखने का प्रयास कर रहा था।
तभी अचानक पीछे से किसी ने कहा—“तुम्हें यहाँ नहीं आना चाहिए था।”
अर्जुन ने पलटकर देखा—एक बूढ़ा आदमी, फटेहाल कपड़े, काँपते हाथों से लालटेन पकड़े था ,उसकी आँखें डर से भरी थीं।
“तुम कौन हो?” अर्जुन ने पूछा।
बूढ़ा धीरे से बोला—“मैं वही हूँ… जिसने' गुरुदत्त' की चिता जलाई थी।”
अर्जुन सन्न रह गया,“मतलब… तुम' गुरुदत्त पांडे' को जानते हो?”
बूढ़े ने सिर हिलाया,“हाँ… और मैंने उसका सच अपनी आँखों से देखा है।उसने बच्चों को जलाया, उनकी आत्माएँ कैद कीं ,लेकिन उस रात… उसका बेटा भी वहाँ था,वो सब देख रहा था।”
अर्जुन का दिल जोरों से धड़कने लगा -“गुरुदत्त जूनियर…?”
बूढ़ा काँपती आवाज़ में बोला—“हाँ, और वही अब सबको मार रहा है। अभी बात पूरी भी नहीं हुई थी कि अचानक खंडहर की खिड़कियों से आग का गोला अंदर फेंका गया।
तेज़ धमाके के साथ, पूरा कमरा जलने लगा,बूढ़ा आदमी चीख़ते हुए राख में बदल गया,अर्जुन किसी तरह बाहर भागा।
बाहर आते ही, उसने अंधेरे में एक परछाईं देखी—लंबा कद, हाथ में मशाल !चेहरा साफ़ नहीं दिखा, लेकिन उसकी आँखें चमक रही थीं।
वह चिल्लाया—
“अर्जुन! तेरा खेल खत्म!”और अगले ही पल वह परछाईं अंधेरे में गायब हो गई।
अर्जुन ज़मीन पर गिरा पड़ा था,उसकी शर्ट पर राख और खून के दाग थे,लेकिन उसके हाथ में एक अधजला कागज़ आ गिरा था, जो शायद उसी बूढ़े का था।
उस पर सिर्फ़ एक लाइन साफ़ दिख रही थी—“सच जानने के लिए अनाथालय जाओ…!”
अर्जुन के दिमाग़ में सवाल गूँज रहे थे—'गुरुदत्त जूनियर' का अनाथालय से क्या रिश्ता था?और क्यों हर सुराग उसे, बच्चों की मौत से जोड़ रहा था?
