नित्या , शिल्पा से बातें तो नहीं कर रही थी, किंतु वह महसूस कर रही थी कि शिल्पा अंदर ही अंदर, कुछ परेशानी में तो है और वह अपनी परेशानी किसी से बता भी नहीं रही है इसीलिए वह उससे बात तो नहीं करती है किंतु उसका मन बदलने के लिए, आज वह, बच्चों जैसी हरकत करती है,, जिसके कारण दोनों बहनों की दूरियों में थोड़ी कमी आती है। एक कमरे में रहकर भी दोनों, ऐसे रह रही थीं - जैसे एक- दूसरे से अपरिचित हों। आज उन्हें इस तरह भागते- दौड़ते देखकर, कल्याणी जी को भी अच्छा लगा और बाहर आकर उन्होंने पूछा - आज दोनों बहनें कैसे बच्चों की तरह उछल- कूद कर रही हो ?
अंदर से आते हुए, नित्या बोली -बुआजी !अभी हम इतनी बड़ी भी नहीं हुईं हैं ,आपके लिए तो अभी हम, बच्ची ही हैं। अब देखिये न..... आपकी लाड़ली कितनी थक गयी ?इसीलिए इसके लिए इसकी पसंद की ''कोल्ड कॉफी ''लाई हूँ ,बहुत दिनों से इसने मेरे हाथ से कुछ खाया -पिया नहीं है, इसीलिए कमजोर हो गयी है ,कहते हुए शिल्पा से कहती है - ले ! कोल्ड कॉफी पी।
देखा !ये तुम्हारा कितना ख़्याल रखती है ?कहने के लिए ही, ये तुम्हारी बहन नहीं है वरन बड़ी बहन होने के पूरे फ़र्ज निभा रही है ,शिल्पा के समीप ही बैठकर कल्याणी जी उससे कहती हैं।
नित्या जानती है,कि शिल्पा को' ठंडी कॉफी' पसंद है, साथ में उसके मनपसंद 'केले के चिप्स' भी ले आई , नित्या भी वहीं बैठकर कॉफी पीने लगी। आज शिल्पा को उसके हाथ की बनाई कॉफी को पीने का, अलग ही आनन्द आ रहा था। बहुत दिनों पश्चात, उसे लग रहा था जैसे वह आज अपने घर में है। न जाने, इतने दिनों से, अपने घर में रहकर भी, कहीं खो गई थी ? उसने अपने घर को, अपने बगीचे को, आसपास नजरें घूमाकर देखा। यह वही घर तो है, जिसमें उसका बचपन बीता और अब वह जवानी की दहलीज पर आगे बढ़ रही है किंतु न जाने, कौन सी दुनिया में खो गई थी उसे यह घर ,अपना नजर ही नहीं आ रहा था।
उसने नित्या की तरफ देखा, और सोचने लगी- यह मेरे लिए कितना सोचती है और मैंने इसको कितने गलत जवाब दिए हैं ,कितना रूखा व्यवहार किया है ? आज उसका,अपने आप से, अपने घर से, नवीन परिचय हो रहा था। शारीरिक रूप से वह यहां रह रही थी किंतु मानसिक रूप से, वह अपनी समस्याओं में उलझी हुई थी। जो यहां रहकर भी, न रहने के बराबर था। उसका जी चाहा, कि वह बहुत देर तक रोये, अपने मन को हल्का कर ले, नित्या से सारी बातें बता दे किंतु अपने बहकते विचारों को, उसने तुरंत ही रोक लिया। वहीं पर कॉफी का मग रखकर ,अपनी माँ के कंधे से लगकर बैठ गयी।
बहुत देर तक, अपने जीवन की उन घटनाओं को सोचती रही ,कुछ देर मुस्कुराकर फिर से गंभीर हो गयी और सोचने लगी -नित्या को, कुछ भी बताने से पहले मैं, कुमार से मिलना चाहती हूं ,एक बार वह मिल जाए ,तो सभी समस्याएं दूर हो जाएंगीं। न जाने मैं, कहाँ फंसती जा रही हूँ ,इससे बाहर आने का कोई उपाय भी तो नजर नहीं आ रहा। एक मन कहता है -कुमार भी, इन साज़िशों में शामिल हो सकता है किन्तु दूसरे ही पल वो, उसे अपना रक्षक नजर आता है।
क्या सोच रही हो ?कल्याणी जी ने पूछा -तुम ठीक तो हो ! कहते हुए उसके हाथ पकड़कर देखती हैं और पूछती हैं - कई दिनों से मैं देख रही हूँ ,आजकल तुम कुछा ज्यादा ही सोचने लगी हो ,तुम्हारी पढ़ाई ,चित्रकारी ठीक तो चल रही है या नहीं।क्या किसी ने कुछ कहा है ?
माँ के उस स्पर्श से और माँ के इस तरह प्यार से पूछे जाने पर, शिल्पा अंदर से पिघलने लगी ,उसके अंदर कुछ तो था ,जो उसे मजबूर कर रहा था ,उसके अंदर की घुटन बहती सी महसूस हो रही थी ,वो बाहर आने को आतुर हो रही थी ,उसके नेत्र सजल हो उठे ,उसकी आँखों में, सभी आकृतियां कुछ पल के लिए धुंधली सी हो गयीं।
शिल्पा को फिर से सोचते हुए देखकर और उसके मन की व्यथा को पढ़ते हुए ,नित्या लगा ,कहीं ये बुआजी के सामने कुछ बोल न दे !उन्हें तो कुछ भी मालूम नहीं है कि इनकी बेटी किस दौर से गुज़र रही है ? क्यों, इन्हें, उसी दर्द में घसीटना ?यह सोचकर नित्या अब जोर से, बिना पढ़े ही, बोलने लगी- हमें ज्यादा सोचना नहीं चाहिए, जिंदगी जैसी चल रही है, उसे चलते रहने देना चाहिए, ये ज़िंदगी बड़ी नखरीली है, इसे हाथ बढ़ा आगे रोकने का प्रयास नहीं करना चाहिए बल्कि अपनी समस्याओं का निदान करते हुए, आगे बढ़ते रहना चाहिए किसी के कहने यह अथवा न कहने से, जिंदगी रूकती नहीं है, वह अपनी गति पर चलती ही रहती है इसी तरह इंसान को भी, आगे बढ़ते रहना चाहिए।''
तुम दोनों के मध्य, ये सब क्या चल रहा है ,कल्याणी जी को कुछ भी समझ नहीं आया कि नित्या ये सब बातें क्यों बोल रही है ?
बुआजी ! ये 'नैतिक शिक्षा 'की किताब में है ,आपकी समझ से बाहर है,ये हम दोनों के बीच की बात है।
यह सब ज्ञान किस लिए दिया जा रहा है ? शिल्पा ने भी पूछा।
हम ज्ञान देने वाले कौन होते हैं, न कोई साधु न सन्यासी ! यह सामान्य ज्ञान है, जो हर मनुष्य में रहता है किंतु कई बार परिस्थितियां ऐसी हो जाती हैं, वह इंसान ज्ञानी होने के पश्चात भी, अज्ञानियों की भांति कर्म करने लगता है। वह अपनी, संपूर्ण कला को भुला देता है, जिस कला से उसे सुख मिलता है ,आत्म संतोष प्राप्त होता है, उस कला को तो उसने न जाने कहां छोड़ दिया है ? वह कला उसे ढूंढ रही है, वह जानना चाहती है, आखिर उसके जीवन में मेरा क्या महत्व है ?
तुम दोनों ,जो भी कर रही हो ,मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा ,तुम्हारे पापा आने वाले हैं ,मुझे और भी कार्य हैं ,मैं चलती हूँ ,मेरी अपनी भी तो ज़िम्मेदारियाँ हैं ,तुम दोनों की तरह ख़ाली नहीं हूँ, कहकर कल्याणी जी चलीं गयीं। उनकी बातें सुनकर दोनों ही, बड़े जोर से हंसी।
नित्या के कहे शब्द, शिल्पा के हृदय में, बसते चले गए और वह स्वयं ही सोचने पर मजबूर हो गई सही तो कह रही है, जो कला मुझे सुकून देती थी, आत्म संतोष देती थी, उसे मैंने भुला दिया है, और मैं न जाने, कहां-कहां भटक रही हूं ? यह सोचकर वह तुरंत ही, अपने कमरे में जाती है और अपने खोये रंगों को ढूंढने लगती हैं किंतु तभी उन रंगों के मध्य , उसे कुमार का चेहरा फिर से दिखलाई देता है, आज एक सप्ताह हो गया, क्या उसे अपनी पढ़ाई पूरी नहीं करनी है ? वह कहां चला गया ? कहीं उसे कुछ हो तो नहीं गया होगा। उन्हें विचारों में तल्लीन वह ड्राइंग के पन्नों पर आकृतियां बनाती रही और बिगाड़ती रही।''विचलित मन'' ,एक स्पष्ट आकृति कहाँ सुझा पाता है ?इस समय यही हाल शिल्पा का था।
