अचानक ही कुमार, उस स्थान पर पहुंच जाता है ,जहाँ शिल्पा प्रतियोगिता में हिस्सा लेने के लिए गयी थी। वहां इतने लोगों को देखकर, वो बेचारी! लड़की घबरा गयी थी, हालाँकि उसके साथ कुछ गलत नहीं हो पाया किन्तु तब भी, वहां उसे अपना बहुत अपमान झेलना पड़ा ,वो तो भला हो, उस रिक्शेवाले का ,जो शोर सुनकर वहां आ गया और अन्य लोगों को बुला लाया किन्तु सभी को शिल्पा की गलती ही नजर आ रही थी ,जब तक उसने, उन्हें वह पर्चा नहीं दिखा दिया। उस समय वह कुछ भी कहना और सुनना नहीं चाहती थी ,चुपचाप कुमार की मोटरसाइकिल पर बैठी और चुपचाप वहां से आ गयी। अपने घर के रास्ते पर उतर जाती है।
तब कुमार कहता है - तुम्हें, तुम्हारे घर पर छोड़ देता हूं, यहां रुक कर क्या करोगी ?
मैं अपने आप चली जाऊंगी कहते हुए शिल्पा उसकी मोटरसाइकिल से उतर गई। कुमार, उसे जाते हुए देख रहा था और वह अपने घर की तरफ चली गई। अभी उसका दिमाग, कुछ भी काम नहीं कर रहा था। वह शीघ्र से शीघ्र अपने घर पहुंच जाना चाहती थी। अपने घर पहुंच कर शिल्पा, सीधे अपने कमरे में गई और बिस्तर पर लेट कर रोने लगी। उसकी मम्मी ने, इस तरह अचानक, बेटी को आते ही, अपने कमरे में जाते देखा तो वो ही, उससे पूछने के लिए ,उसके कमरे में उसके पीछे गईं। बेटी को इस तरह, बिस्तर पर औंधे मुंह लेटे हुए देखकर, वो घबरा गईं और उन्होंने उससे पूछा -क्या कुछ हुआ है ?
नहीं, कुछ भी नहीं,सिर में थोड़ा दर्द है ,आराम करूंगी तो, ठीक हो जायेगा।
कल्याणी जी ,सोच रहीं थीं ,बेचारे बच्चों पर पढ़ाई का, जीवन में आगे बढ़ने का, कितना दबाब रहता है ? तुम इस तरह क्यों लेटी हुई हो ?
बस वैसे ही थोड़ा सा थक गई हूँ, थोड़ा आराम करना चाहती हूं, आप मुझे अकेला छोड़ दीजिये ! कल्याणी जी ने एक दो- बार और बात करनी चाही किंतु कोई लाभ नहीं हुआ इसलिए वह उसे अकेला छोड़कर कमरे से बाहर निकल गईं। इतना तो वो समझ ही गई थीं कि अवश्य ही कुछ बात हुई है।इससे पहले जब भी घर में आती थी ,मम्मी !मम्मी !चिल्लाकर मुझे ढूंढती थी और मिल जाने पर मुझसे लिपटती थी। समय के साथ धीर -धीरे इसके व्यवहार में परिवर्तन आये हैं किन्तु इसने मेरे गले लगना नहीं छोड़ा।सोचा ,एक बार नित्या को फोन करके पूछती हूँ फिर सोचा ,हो सकता है ,उसे भी मालूम न हो,उसका कॉलिज दूसरा है।
शिल्पा देर तक बिस्तर में पड़ी,उस घटना के विषय में सोचती रही ,देर तक उस घटना को सोच, अपमान के घूंट पीती रही ,तभी उसके मानस पटल में एक विचार कौंधा -आखिर ये सब क्या हो गया ? ऐसा कौन कर सकता है ? मैंने किसी का क्या बिगाड़ा था ?ये गलत सूचना देकर ,उसका उद्देश्य मुझे अपमानित करवाने का ही तो नहीं था। वो पर्चा तो..... मुझे नित्या से प्राप्त हुआ और नित्या को तो कुमार ने ही ,वो विज्ञापन दिखलाया था। तब कुमार को वो विज्ञापन किसने दिया ? ये कहीं 'तमन्ना ;के लिए तो जाल नहीं बिछाया था ?नहीं ,ऐसा कैसे हो सकता है ?''तमन्ना'' से किसी को क्या दुश्मनी हो सकती है ? दिमाग़ काम नहीं कर रहा। सोचते -सोचते वो थक चुकी थी ,न जाने कब उसको नींद आ गयी ?
घर में ,प्रवेश करते ही ,नित्या ने अपनी बुआ से पूछा -क्या शिल्पा आ गयी ?
हाँ, आ तो गयी है ,किन्तु आते ही, अपने कमरे में चली गयी और तभी से वहीँ लेटी है ,न ही कुछ खाया और न ही कुछ पिया।
थक गयी होगी ,पेंटिंग बनवाने के लिए कोई भी स्थान दे देते हैं,घंटों बैठे रहना पड़ता है।
क्या वह पेंटिंग बनाने के लिए गई थी ,कहाँ ?
हां,क्या आपको उसने नहीं बताया, आज प्रतियोगिता थी, वह उसी के लिए गई थी।
तुम दोनों न जाने क्या-क्या करती रहती हो ? न हीं तुमने बताया न हीं उसने, मुझे तो नहीं लगता वह किसी प्रतियोगिता में गई थी वह तो शीघ्र ही घर वापस आ गई थी।
आप परेशान न हों , मैं अभी चलकर उससे बात करती हूं ,और मेरे साथ भोजन भी करेगी कहकर वह विश्वास के साथ , कमरे में चली गई , तो देखा, शिल्पा सो रही थी। वहां जाकर उसने अपना सामान रखा और सोचने लगी इसे उठाऊं या नहीं, यह तो कभी दिन में नहीं सोती है, आज कैसे सो रही है? इसकी तबीयत तो ठीक है, यह सोचकर वह उसके माथे पर हाथ रखती है। माथा तो ठंडा है, बुखार भी नहीं है। किंतु नित्या के इस तरह छूने से, शिल्पा की आंख अवश्य खुल गई। नित्या ने देखा, उसकी आंखें लाल थीं। उसके चेहरे की उदासी देखकर, वह समझ गई अवश्य ही कुछ हुआ है।
आज इस तरह क्यों लेटी हुई है, तबीयत तो ठीक है ,क्या तू प्रतियोगिता में नहीं गई थी ? नित्या ने उससे पूछा।
सोने से मन थोड़ा शांत हो गया था, किंतु नित्या के प्रश्न पूछते ही, उसके सामने फिर से वहीं घटना चलचित्र की तरह घूमने लगी। शिल्पा ने उसकी बातों का जवाब देने से पहले पूछा -तुम्हें वह विज्ञापन किसने दिया था ?
कुमार ने हीं तो दिया था, वही लेकर आया था कि यहां प्रतियोगिता हो रही है और तुम्हें उसमें हिस्सा लेना चाहिए। क्या कुछ गलत हो गया ?
वहां कोई प्रतियोगिता नहीं थी, यह बात तुम्हें कुमार से पूछनी होगी, यह विज्ञापन उसे कहां से मिला ? तभी शिल्पा के मन में विचार आया, वह विज्ञापन तो मैंने कुमार को भी दिखलाया था। तब भी उसने मुझसे कुछ नहीं कहा। वह तो कह रहा था -'हां तुम्हें, इस प्रतियोगिता में भाग लेना चाहिए।' अब मैं तो उससे यह भी नहीं पूछ सकती कि यह विज्ञापन उसे कहां से मिला है ? किसने दिया है ? किंतु नित्या तुम पूछ सकती हो , क्योंकि वह तुम्हारे लिए ही यह विज्ञापन लेकर आया था।
यह तुम क्या कह रही हो? क्या वह विज्ञापन झूठा था ?
इतनी देर से वही तो कह रही हूं , वह झूठा था वहां कोई प्रतियोगिता नहीं हो रही थी, और न ही आज तक कोई प्रतियोगिता वहां पर हुई है।
फिर ये झूठा विज्ञापन हमारे पास भेजने का, किसी के पास क्या उद्देश्य हो सकता है ?
अब तुम्हें ये बात ,कुमार से ही पूछनी होगी।
तुम भी तो पूछ सकती हो ,अब तो वह तुम्हारे कॉलिज में ही पढ़ता है।
नहीं ,पूछ सकती ,वो मुझसे यही कहेगा ,मैंने तो तुम्हें कोई विज्ञापन लाकर नहीं दिया, तो मेरा पूछने का अधिकार भी नहीं बनता। जब उसे मैंने वो पर्चा दिखलाया था ,तब मुझसे पूछ रहा था -'तुम्हें यह कहाँ से मिला ? तब मैंने ऐसे ही झूठ बोल दिया था ,कहीं बंट रहे थे, इसीलिए मुझे भी मिल गया।
इसका अर्थ तो यही हुआ ,वो विशेष रूप से मेरे लिए था ,जो कांड तुम्हारे साथ हुआ ,वो मेरे साथ हो सकता था,मेरे बदले तुम चलीं गयीं। इसका मतलब वो एक ही पर्चा था ,मुझे भी तो तुमसे ही प्राप्त हुआ। पता तो लगाना होगा।
