Jhuthe dikhave se zindagi nahi chalati

पवित्रा के जेठ के लड़के का, रिश्ता तय हो गया था। सारी बातें ठीक थीं , लड़की वालों के भी यहां पैसे की कोई कमी नहीं थी, और लड़के वालों के यहां भी, वे लोग, अच्छा खाते- कमाते थे। लड़का बेंगलुरु में नौकरी करता था, लड़की भी, 'बीटेक' करके अभी घर पर ही थी। लड़के वालों को कोई, जरूरी नहीं थी कि  लड़की नौकरी ही करें, वह उसकी अपनी इच्छा पर निर्भर करता था। वे लोग, एक पढ़ी -लिखी लड़की चाहते थे। जैसे ही रिश्ता तय हुआ,उसके कुछ दिनों पश्चात ही ,लड़के की माता का देहांत हो गया इसीलिए कुछ समय के लिए, उन्होंने विवाह को पीछे टाल दिया,वे लोग शांत हो गए। 


लड़की, लड़के से अक़्सर फोन पर बात कर लेती थी दोनों के विचार मिले या नहीं लेकिन लड़का खुश था।

 अब इस परिवार की संपूर्ण जिम्मेदारी पवित्रा पर ही आन पड़ी, विवाह के सभी कार्य भी पवित्रा को ही करने पड़ेंगे। वो लड़की के विषय में ज्यादा तो कुछ नहीं जानती थी, बस उसे एक बार देखा था। कल को किसी बात में बुराई न मिले इसीलिए पवित्रा किसी भी काम को करने से पहले ,अपने जेठ से पूछ लेती थी। जब लड़की के, कपड़ों की बात आई , तब उन्होंने सोचा -लड़की ,आजकल के जमाने की है, न जाने उसे क्या पसंद होगा, क्या नहीं ? साड़ी और अन्य सामान खरीदने के लिए, होने वाली बहू को, साथ ले जाना उचित समझा। आजकल चलन भी यही चल रहा है। 

 पवित्रा  नहीं चाहती थी, कल को कहने वाले कहें- बेटे की माँ नहीं थी तो इसीलिए चाची ने, किसी भी कार्य में कोई कमी छोड़ी है, या अपनी मनमर्जी चलाई है।'' जब किसी पर उत्तरदायित्व का भार आ जाता है, उसको सही तरीके से करना, लोगों की नजर में सही रहना, यह बहुत कठिन कार्य है। 

जब पार्वती , साक्षी [होने वाली बहु ]को लेकर, साड़ी के शोरूम में गई तो उसने बहुत सी साड़ियां पसंद की। कोई 50,000 की थी तो कोई 70से 80 हजार तक की थी , पवित्रा को साक्षी का इस तरह फिजूल खर्ची करना अच्छा नहीं लग रहा था। वह जानती थी, आजकल की लड़कियां ज्यादातर, सूट, जींस ऐसे ही वस्त्र पहनती हैं। ये तो शुरू- शुरू की बातें हैं, यह सब दिखावे के लिए करना भी पड़ता है। वह जानती थी, इतनी महंगी साड़ियां , यह एक दो बार पहनेगी और अलमारी  में रखी जाएंगीं। लड़की ने साज- सज्जा के लिए ,महंगे से महंगा सामान लिया और कम से कम डेढ़ लाख का लहंगा लिया।

 तब पवित्रा से रुका नहीं गया और बोली -बेटा ! यह जो तुम जो कुछ भी ले रही हो, मैं मानती हूं, तुम उस घर की होने वाली नई बहु हो,साड़ियां और लहंगा ससुराल वालों की तरफ से चढ़ाया जाता है, यहां भी पैसों की कोई कमी नहीं है लेकिन जो कुछ भी तुम ले रही हो, मेरे हिसाब से तो यह बहुत अधिक है ,'फिजूल खर्ची' है। 

नहीं चाची जी ! यह फिजूल खर्ची नहीं है अभी मेरी एक दोस्त की शादी हुई है , उसके ससुरालवालों ने एक लाख का लहंगा भेजा था और वो उस लहंगे को पहन बहुत इठला रही थी ,मैंने तभी सोच लिया था -' कम से कम उससे महंगा लहंगा लूँगी। उसकी साड़ियां भी बहुत महंगी थीं , मुझे भी तो उसे दिखाना होगा कि मैं भी किसी से कम नहीं।

 क्या, यह सब सामान तुम किसी को दिखाने के लिए ले जा रही हो ? क्या ये सब तुम पहन पाओगी ? इतनी महंगी साड़ियां रोज -रोज कोई नहीं पहनता।  एक या दो बार ये साड़ी पहनकर तुम , तुम इन्हें बक्से में ही रख दोगी। आजकल फैशन, बहुत जल्दी बदलता है। आज शीशे की साड़ी का फैशन है तो कल कढ़ाई का फैशन होता है, कभी जरी का काम होता है। इससे तो बेहतर है, तुम कुछ पैसे लेकर, अपने खाते में डाल लो ! और जब भी, जैसे फैशन की साड़ी तुम्हें लेनी हो, तुम ले सकती हो। तुम्हारी सास ने भी तो, अपनी पसंद की कुछ साड़ियां लेकर पहले ही रखी हुई हैं वे भी तुम्हें ही पहननी होंगी। इतनी साड़ियों का क्या करोगी ? आवश्यकता महसूस हो तब अपनी मनपसंद की कोई भी चीज ले सकती हो।

नहीं चाची जी ! यदि मैंने कम या सस्ती साड़ियाँ लीं तो मेरी सहेलियों मुझ पर हंसेंगी, तेरी ससुराल वाले कंजूस हैं या फिर गरीब हैं , उसकी ससुराल वालों ने तो 20 साड़ियां चढ़ाई थीं और सभी एक लाख से ऊपर की थीं , तब मुझे भी तो, उन्हें दिखाना होगा कि मेरा जहां पर रिश्ता हुआ है, वे लोग भी, किसी से कम नहीं हैं ।

 पवित्रा ने इससे ज्यादा, उससे कुछ भी कहना उचित नहीं समझा, उसका फर्ज बनता था कि वह उसे समझाएं किंतु उसने समझना ही नहीं चाहा। नई-नई बात थी, कहीं बात का बतंगड़ ना बन जाए ! इसीलिए वह फिजूल खर्ची होते देखकर, भी चुप रही। जब पवित्रा के जेठ के सामने, सभी सामानों का बिल गया तो वह बहुत नाराज हुए और बोले -10 लाख की साड़ियां ऐसा तुमने क्या खरीद लिया इनमें क्या हीरे मोती लगे हुए हैं। माना कि हमारे पास पैसों की कोई कमी नहीं है, लेकिन इतनी फिजूल खर्ची भी हमें अच्छी नहीं लगती।  तब उन्होंने पवित्रा से पूछा -तुम तोउसके साथ गयीं थीं ,तुम्हें उसे समझाना चाहिए था ,क्या तुमने, उस लड़की को बताया नहीं था उसकी सास ने भी तो कुछ साड़ियां लेकर रखी हुई हैं, उनका क्या होगा ?

पवित्रा बोली -भाई साहब !मैंने तो बहुत समझाने का प्रयास किया किंतु वह कुछ भी समझने के लिए तैयार ही नहीं थी , अब ऐसे मौके पर मैं उससे ज्यादा कुछ कह भी नहीं सकती थी ,दुकान पर बैठ गई और जो चीज लेनी थी उसे लेती रही।

 इस तरह की फिजूल खर्ची से तो, अच्छे भरे के भरे घर खाली हो जाते हैं। कोई कायदे की बात हो तो हम उसे मना नहीं करेंगे लेकिन इस तरह के खर्चे भी हमें बर्दाश्त नहीं होंगे। 

उसकी सहेलियों की ससुराल से भी तो इतनी ही महंगी साड़ियां और सामान आए थे इसीलिए उन्हें दिखाने के लिए उसने ऐसा किया। 

पवित्रा तुम जानती ही हो कि अब तुम्हारी दीदी नहीं रहीं, तुम्हें उसे समझाना होगा कि इस तरह के'' झूठे दिखावे से जिंदगी नहीं चलती, घर -गृहस्थी नहीं चलती'', उसे हमें बताना होगा जितनी उसके आदमी की कमाई है, उसमें ही उसे अपना खर्चा चलाना होगा तभी तो आजकल, झगड़े बढ़ रहे हैं और बात तलाक तक आ जाती है। बिना सोचे- समझे कुछ भी खरीद लेना, दिखावे की यह झूठी जिंदगी हमें पसंद नहीं है। उससे हमें बात करनी होगी। 

भाई साहब ! मैं उसे एक बार फिर समझाने का प्रयास करूंगी, पढ़ी-लिखी लड़की है, समय के साथ-साथ धीरे-धीरे समझ जाएगी। 

नहीं, जिसे दिखावा इतना पसंद हो कि वह किसी का कहना भी न माने, न ही, किसी की बात को ध्यान से सुने ! वह फिर आगे कैसे सुन लेगी, मुझे आज ही उसके माता-पिता से बात करनी होगी। कहते हुए ,उन्होंने उसके पिता को फोन लगा दिया और बोले -भाई साहब ! आप जानते हैं, हमारे यहां पैसे की कोई कमी नहीं है किंतु हमें फिजूल खर्ची और दिखावा भी पसंद नहीं है हम बनावटी जीवन में विश्वास नहीं करते। हम जो हैं, अपनी आदत और व्यवहार से जाने जाते हैं, न कि पैसे के बल पर दिखावा करते हैं। हो सकता है अब आपकी बेटी ने, सहेलियों को दिखाने के लिए, ऐसा किया है किंतु उसकी यह सोच उचित नहीं है।आगे  बेटी को घर- गृहस्थी सम्भालनी है, जो आवश्यक है , इस पर खर्च वह किया जाता है दिखावे से जिंदगी नहीं चलती।

साक्षी के पिता उसे समझा पाए या नहीं, विषय यह नहीं है, विषय यह है कि'' दिखावे की जिंदगी के लिए, कई बार लोग, अपने बजट से, आगे बढ़ जाते हैं, जिसके कारण कई बार उन्हें अनेक परेशानियों का सामना करना पड़ता है और यह समस्या अक्सर नई युवा पीढ़ी में आती है, जो ना ही समझना चाहते हैं और न ही समझ कर चलना चाहते हैं। कुछ अपने आराम के लिए और कुछ, दिखावे के लिए खर्चे बढ़ा लेते हैं जिसके कारण आगे आने वाली परेशानियों का सामना उठाना पड़ता है और जब उन्हें रोका जाता है, तब वही घर में क्लेश होता है , मारपीट- झगड़े होते हैं और अलग होने तक भी नौबत आ जाती है। यह तो लड़की के परिवार वालों को भी सोचना चाहिए, आज उसके पिता के पास बहुत धन है, किंतु यह जरूरी तो नहीं कि उसका पति भी उतना ही कमा रहा हो , उसे बाकी की संपूर्ण जिंदगी तो अपने पति की कमाई में ही, बितानी होगी , ऐसे में यदि वह अपने पति से कुछ ज्यादा ही अपेक्षाएं रखती है तब भी वह झगड़ों का कारण बन जाता है। हमें झूठे दिखावे इत्यादि प्रपंचों से बचना चाहिए।  

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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