Sazishen [part 79]

चांदनी ,अपने घर की छत से ,नीलिमा को जाते देख रही थी और मुस्कुरा रही थी ,उसके आव -भाव देखकर ,लग रहा था ,वो नीलिमा को इतनी आसानी से माफ नहीं करने वाली है। वह नीचे आकर ,प्रकाश को कार्य सौंपकर ,बाहर चली जाती है। मिसेज खन्ना ,उसकी सबसे अच्छी दोस्त....... प्रकाश का कहना भी सही था ,मैडम ! विवाह करके मुंबई आई हैं। इतनी जल्दी तो महिलाएं , अपने गृह कार्य भी नहीं समझ पाती हैं और इनकी  न जाने कितनी मित्र बन गयीं हैं ? इतनी तेज तो ,पहले वाली मालकिन भी नहीं थीं । जब पैसा पास होता है ,अच्छे -अच्छों के मित्र बन जाते हैं। गलत सोच के साथ ,नकारात्मक ऊर्जा शीघ्र ही जुड़ती है।  ऐसा ही हाल चांदनी का भी है ,उसकी दोस्त मिसेज खन्ना ! जो किसी का अपमान करने में कोई कसर  नहीं छोड़ती। उसे भी अपने पैसे पर बहुत अभिमान है ,अपने से नीचे काम करने वालों को तो इंसान ही नहीं समझती। आज चांदनी की उससे मिलने की ही योजना थी। उसे देखते ही ,मिसेज खन्ना मुस्कुराई और गर्मजोशी से उसका स्वागत किया। 

आओ !आओ !घड़ी में समय देखकर बोली -वैसे अन्य लोगो के आने में ,अभी समय है ,तुम्हें मुझसे कुछ आवश्यक बात करनी थी ,इसीलिए थोड़ा शीघ्र बुला लिया। आओ ,बैठो ! कहते हुए दोनों एक अलग कमरे में चली जाती हैं। तब एक नौकर दो गिलासों में पानी लेकर आता है। उसे देखकर ,उन्होंने उसे घूरा और बोली -अब आ ही गए हो तो ,यहाँ मेज पर रख दो !


मैडम के तेवर देख ,वह पानी रखकर,बिना देरी किये ,कमरे से बाहर निकल जाता है। 

और सुनाओ मेरी जान! क्या कहना चाहती हो ? मैसेज खन्ना ने ही चांदनी से पूछा। 

तुमसे एक काम करवाना था। 

काम और मैं , उसने चांदनी की तरफ ऐसे देखा जैसे कुछ अनहोनी बात कह दी हो। तुम जानती हो ,मैं काम- वाम नहीं करती, काम तो मेरे नौकर करते हैं। 

यह बात मैं जानती हूं, मुस्कुराते हुए चांदनी बोली-किंतु काम भी तो कई तरह के होते हैं ?

किस तरह का काम करवाना है ? उसके 'भाव' बता रहे थे कि वह कुछ और ही सोच रही है। 

तब चांदनी बोली -एक महिला है, उसको मैंने उसके' गढ़ ' से तो निकाल दिया , किंतु अब मैं उसे किसी नौकरानी की तरह काम करते देखना चाहती हूं, और यदि वह तुम्हारे यहां नौकरानी का काम करें तो कैसा रहे ?

यानी कि तुम मुझसे, उसे 'टॉर्चर 'करवाना चाहती हो, राइट ! किंतु वह महिला है कौन ? तुम उसे कैसे जानती हो ?

बहुत पुराना बदला चुकाना है, बहुत मौज की खाई है उसने, उसे मेहनत की खिलानी है। 

मेहनत की नहीं मेरी जान, बेइज्जती और अपमान की रोटियां खिलानी हैं। कहां है ?वो !आज तो पार्टी थी, आज उसका टेेस्ट हो जाता। वह आई तो थी, किंतु मैंने उसे घास ही नहीं डाली। 

क्या वो , कोई घोड़ी है ,हंसते हुए, मिसेज खन्ना बोलीं -दोनों के पास ही, बहुत धन है , शायद इतना धन नीलिमा के पास कभी नहीं रहा होगा किंतु तहजीब के मामले में दोनों ही, परले दर्जे की गंवार थीं , उनकी बोलचाल और उनका तौर -तरीका ही बतला रहा था। गरीबी से निकाल कर आई हैं, सोच उनकी वही मवा लियों वाली थी। 

यार !तू सही कह रही है, यह बात तो मैं भूल ही गई, खैर कोई नहीं तेरे यहां तो अक्सर पार्टियां होती रहती हैं। वह कल भी आएगी मैंने उसे कल बुलाया है , उसे तेरे घर भेज दूंगी। फिर तो देखना और सोचना तुझे क्या करना है ? तू  फिक्र ना कर........ यह कार्य मेरे बाएं हाथ का है। ऐसियों को मैं बहुत जल्दी सीधा  करती हूं, किंतु तूने बताया नहीं ,उससे तेरी क्या दुश्मनी है ? तू स्वयं उससे बदला क्यों नहीं ले लेती ?

शायद पिछले जन्म की, कहते हुए चांदनी हंस दी। अभी उसे तुझसे 'ट्रेनिंग ' दिलवानी है ,पहले तू उसका अच्छे से कचूमर निकाल ,बाक़ी कसर मैं पूरी कर दूंगी। कहते हुए हंसने लगती है और कमरे में ठहाका गूंजता है। 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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