Jail [part 102]

 अमृता रिश्तों की उलझन में इतनी उलझी , ऐसी उलझी ,सुलझ न सकी ,कैसे हैं ? ये रिश्ते ! दर्द ही देते हैं ,आज तक इन रिश्तों से क्या मिला ? चाचा -चाची ने भाई छीन लिया ,माँ भी नहीं रही ,ऐसा क्यों होता है ? जब किसी से सुख मिलता नजर आता है ,तो भगवान को अच्छा नहीं लगता। मुझे लगता है ,मेरी ख़ुशी ,उस ऊपर वाले को भी मंजूर नहीं। आज तक, उसने छीनने के सिवा दिया ही क्या है ? एक सौतेली माँ दी ,जिसे मैं ''फूटी आँख भी नहीं सुहाई। ''पिता जब तक ही अपने रहे ,जब तक नई माँ नहीं आ गयी। उसके पश्चात तो उनके लिए मेरा होना न होना ,एक जैसा ही था। अमृता सोचे जा रही थी -उसने सोच लिया था ,वो रोयेगी नहीं किन्तु ये आँखें ,ये भी मेरा कहा नहीं मानतीं। बहे जा रहीं हैं ,मन का दर्द घुमड़ -घुमड़कर बाहर आ रहा है।  इतने रिश्ते होने पर भी ,आज वो अकेली है ,उसके साथ कोई नहीं खड़ा ,जीवन में आगे बढ़ने के लिए कितनी मेहनत की ?आज जिस मुकाम पर मैं हूँ ,लोग वहां तक पहुंचने के लिए तरसते हैं। किन्तु मेरी खुशियां ,मेरे ग़म सब मेरे हैं ,बाँटने वाला कोई नहीं। इस घर में ,अकेली पड़ी है ,मर भी गयी तो...... कौन मेरे इंतजार में है ?किसी को क्या फर्क पड़ता है ? निराशा से भरी ,बिस्तर पर निढाल पड़ी थी।


 

सच्चे प्यार की तलाश में ,इतने लोगों से मिली ,कोई सच्चा प्यार नहीं मिला ,न ही मैं, किसी पर ,विश्वास कर सकी ,और न ही प्यार...... जिससे प्यार किया , वह मेरे प्यार को संभाल ना सका , उसने मुझे अपने प्यार के काबिल समझा ही नहीं , जबकि मैं उस पर मर मिटी थी या  वह मेरे प्यार के काबिल नहीं था। क्या जीवन भर इसी तरह रहना होगा ? अब मैं किसी पर विश्वास नहीं कर पाऊंगी , अब मेरी जिंदगी में कोई नहीं आएगा , अमृता ने मन ही मन  निश्चय किया। रोते-रोते, सोचते -सोचते निढाल हो चुकी थी। कुछ भी समझ नहीं आ रहा था , किसके पास जाऊं ,कहां जाऊं ? कौन है ?मेरा ! रोते-रोते सिर  भी दुखने लगा था न जाने, कब नींद आ गई ?

खुशियों की तलाश में, एक सुंदर जगह जाती है, सुंदर बाग बगीचे हैं , परियां हैं , उन्हीं में माँ भी कहीं  है। जो एक पेड़ के नीचे झूले पर बैठी हुई ,झूल रही थी ,सफेद कपड़ो में बिल्कुल परी जैसी लग रही थी। मां को देखते ही अमृता उनसे लिपट गई। माँ ! मैं बिल्कुल अकेली हो गई हूँ , क्या मेरी किस्मत में प्यार है, ही नहीं, ना ही मां का, ना ही पिता का और ना ही पति का प्यार मुझे मिला।  शायद ,मैं अपनी किस्मत में सुख  लिखवा कर लाई ही नहीं , मां के कंधे से लिपटकर बहुत देर तक रोती रही। 

मां ने,उसके  सिर पर हाथ फेरा, तू तो मेरी बहादुर बच्ची है , दुख भी तो उन्हीं को मिलते हैं ,जो दुख झेलने की ताकत रखता है , कमजोर होती तो ,कब की टूट गई होती ? तूने यह सब सुख - साधन जो भी किए हैं सब तेरी अपनी मेहनत के हैं , क्यों परेशान होती है ? तुझे  प्यार करने वाला ,कहीं ना कहीं मिलेगा अवश्य ! बस तू अपने को खोने मत देना। कहते हुए, मां ,झूले से उठ कर चल दी। 

मां मुझे छोड़ कर कहां जा रही हो ? कुछ देर तो ठहर जातीं , मैं अकेली क्या-क्या कर लूंगी ? कुछ नहीं कर पाऊंगी किंतु माँ  नहीं रुकी , रुक जाओ मां ! रुक जाओ ! कहते हुए ,वो  चिल्ला दी , देखते ही देखते सब बाग -बगीचे सब गायब हो गए ,रह गई तो सिर्फ अकेली अमृता.......  जो चिल्ला रही थी -मां ,रुक जाओ ! अमृता की आंख खुल गई , वो उठ बैठी ! उसने  चारों तरफ हैरानी से देखा , जैसे मां यहीं कहीं होगी उससे मिलेगी।

 तभी बाहर से , उसकी मैनेजर आई और बोली मैडम ! आप ठीक तो हैं , अमृता' हाँ 'में गर्दन हिलाई मैम ! आप ,चाय लेंगी या कॉफी !

अमृता ने अजनबी की तरह उसे देखा और बोली- कॉफी ले आओ !

वो तो ,चली गयी, किन्तु अमृता अभी भी परेशान थी ,वो पुनः उसी स्वप्न में खो जाना चाहती है ,अपनी माँ की गोद  में सो जाना चाहती है ,किसी निरीह हिरणी की तरह ,उस कमरे को निहार रही है। तब तक उसकी मैनेजर कॉफी लेकर आ गयी थी। 

वो समझ रही थी ,कि ये किस स्थिति से गुजर रहीं हैं ? ऐसे में ,उसके साथ खड़े रहना ,अपना फर्ज समझ रही थी। कुछ देर ,उसके कमरे को निहारती रही उसके पश्चात कमरे की खिड़की से बाहर देखने लगी। तभी उसे जैसे कुछ याद आया बोली - मैडम ! जब आप सो रहीं थीं ,कोई सर ! आये थे ,शायद ,आप उनसे पहले भी मिल चुकी हैं ,किसी फ़िल्म के विषय में कहना चाह रहे थे। 

हाँ -हाँ ...... वो खन्ना साहब होंगे ,तुमने मुझे उठाया, क्यों नहीं ? एकाएक बिस्तर से अमृता उठ बैठी ,उसमें  अजब सी फुर्ती आ गयी। 

मैम ! आप सो रही थीं ,पहले तो मैंने आपको उठाना उचित न समझा ,फिर सोचा ,शायद जरूरी हो ,इसीलिए उठाने गयी तो उन्हीं ''खन्ना साहब '',ने  ही मना कर दिया ',उन्हें सोने दो !' कहते हुए ,मुझे रोक दिया। बाद में आते हैं ,कहकर चले गए। 

अमृता ने कॉफी पी और अपने को  तरो -ताजा करने के लिए ,नहाने चली गयी ,अपना ग़म वो किसी आने वाली ख़ुशी के लिए ,बिस्तर पर ही छोड़ गयी ,नहाते समय भी वो, सोच रही थी -शायद किसी फ़िल्म का ऑफर लेकर आये होंगे ,नहाने के पश्चात ,उनसे बात करूंगी ,यही सोचते हुए ,नहा रही थी। जो अमृता अभी कुछ घंटों पहले ,ग़म के अंधेरों में डूबी थी। उस ग़म का चोला उसने ,शीघ्र ही उतार फेंका। आईने में अपने को देखते हुए बोली -किसी एक  के लिए ,अपनी पूरी ज़िंदगी तो बर्बाद नहीं की जा सकती ,अच्छा ही है ,शीघ्र ही ,उस मुसाफिर की पहचान हो गयी और स्टेशन आते ही ,उसे उतार दिया ,न जाने ,कब तक उसके बिछाए जाल में फंसी रहती ? मुँह पर पाउडर की परत लगाते हुए ,सोच रही थी ,मैं तो जैसे अपना  अस्तित्व ही खो चुकी थी ,कहते हुए ,उसने अपना गाउन पहना ,आईने में देखते हुए बोली -'अमृता 'इज बैक 'और मुस्कुराई ,खन्ना साहब को फोन लगाया - हैलो !  

तभी उसकी मैनेजर आई और उसे देखकर आश्चर्य से बोली -मैम ,आप !वो आश्चर्य से उसे देख रही थी ,वो रतो सोच रही थी ,कुछ दिनों तक तो यहाँ मातम की स्थिति होगी ,आखिर उनकी ज़िंदगी में ,इतना बड़ा हादसा हुआ है। अमृता ने उसको इशारे से चुप रहने  के लिए ,कहा। अपनी बात पूरी करके तब उसने अपनी नई मैनेजर दृष्टि की तरफ देखा ,और खुश होते हुए बोली -खन्ना साहब ने ,मुझे एक नई फ़िल्म के लये बुलाया है ,कल हम उनसे मिलेंगे ,कहते हुए ,पूछा -तुम्हें कुछ कहना था। 

वो मैम ,'डिनर 'तैयार है दृष्टि ने बताया।  


ओ.के. कहते हुए वो अपने कमरे से बाहर आई ,और पूछा खाने में  क्या बनाया है ? दृष्टि ने कोई जबाब नहीं दिया ,वो तो अभी अपने विचारों से भर ही नहीं आ पा रही थी ,मन ही मन सोच रही थी ,कुछ दिनों से कैसे हालातों से गुजरी हैं किन्तु अब कोई इन्हें देखे तो, कोई कह नहीं सकता वो ,अपनी ज़िंदगी के कितने बड़े हादसे से गुजरी हैं ?कोई आम महिला होती तो रो -रोकर सारा घर सर पर उठा लेती ,रिश्तेदारों और सहानुभूति के लिए ,परिवारवाले भी इकट्ठा हो जाते किन्तु न ही ,इन्होने किसी से सहायता ली , न ही किसी को बुलाया , न ही बताया।  बड़े लोगों के दुःख -दर्द भी ,अपने ही होते हैं ,उन परेशानियों को झेलने की ताकत भी इनमें बड़ी होती है। क्या सोच रही हो ? खाना खाते हुए , अमृता ने दृष्टि से पूछा ,उसकी आवाज से , दृष्टि का ध्यान टूटा ,चौंकते हुए बोली -कुछ नहीं !

तब तुम भी खाना खा ही लो ! मंगू ताई दृष्टि को भी खाना दो ,आखिर इसे भी तो पता चले ,आप कैसा स्वादिष्ट खाना बनातीं हैं। 


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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