अमृता हिमांशु के शब्दों से आहत होती है , जितनी खुशी से वह, उसके परिवार के लिए कार्य कर रही थी उतना ही, उसे दुख भी होता है। वह स्वयं ही नहीं समझ पा रही थी कि वह यह सब क्यों कर रही है? किंतु उनके लिए यह सब करना, उसको अच्छा लग रहा था। इसीलिए उसके परिवार के साथ वह समय बिताने के लिए यहां पर आई थी , उसे तो यह भी मालूम नहीं था, कि हिमांशु भी इधर आ जाएगा। अब बहरहाल हिमांशु को पता चल ही गया है ,तब वह उस पर नाराज होता है, मां के समझाने पर, वह शांत हो जाता है। हिमांशु अभी, जिम्मेदारियों को नहीं लेना चाहता है , वह अपनी फिल्म के हिट होने की प्रतीक्षा कर रहा था। जब पिता ने समझाया ,तब उसे लगा -शायद उसने , अमृता से यह बातें कह कर, उसके दिल को दुखी किया है, तब वह बाहर निकल जाता है। अमृता तो चाहती थी ,कि अपने सामान को लेकर, वहां से निकल जाए किंतु उसे लगता था कि मेरे इस व्यवहार से उसके मम्मी पापा को दुख होगा। वह यहां हिमांशु के लिए नहीं वरन उसकी मम्मी पापा के लिए आई है। उनको दुख देना नहीं चाहती थी किंतु उसका मन अभी व्यथित था इसीलिए उस कमरे की खिड़की से बाहर निकल जाती है , कहीं एकांत की तलाश में......
हिमांशु के घर से बाहर निकल कर ,वह चलती चली जाती है ,चलती चली जाती है , जब तक थक नहीं जाती ,तब एक छोटी सी पहाड़ी पर बैठ जाती है , और सोचने लगती है - हिमांशु ठीक ही तो कह रहा था, मुझे कोई हक नहीं बनता है ,उसको इस तरह आहत करने का , उसके माता-पिता ,उसकी जिम्मेदारी हैं ,तब मैं उसके उत्तरदायित्व को क्यों उठाना चाहती हूं। मैं क्यों इधर आई हूं ? जबकि मैं आज तक अपने घर भी नहीं गई। आते -जाते लोग उसे देख रहे थे , उन सब से बेपरवाह ,वह अकेली बैठी सोच रही थी। मेरे अपने घर में भी ,मेरा अपना कौन है ? कौन मुझे इस तरह देखकर खुश होगा ? अब तो मेरी दादी भी नहीं रही ,गहरी सांस लेते हुए उसने , एक पेड़ के तने का सहारा लिया। सबसे बेपरवाह, न जाने क्या सोच रही थी ?चुपचाप बैठी थी। क्या सुख है ,क्या दुख है ? मनन कर रही थी , मैंने इतना पैसा कमाया , पैसे को देखकर ही लोग मेरा सम्मान करने लगे , मुझे मानने लगे। किंतु इतने धन वैभव में भी, मैं खुशी तलाश कर रही थी , जो खुशी में पाना चाहती थी वह मुझे, हिमांशु के घर में मिली। उसके माता-पिता की सादगी , उनका अपनापन , उनका प्रेम भरा व्यवहार , सभी तो है, किंतु उनके पास पैसा नहीं है।
हिमांशु एक स्वाभिमानी इंसान है , मैंने अनजाने में ही ,उसके दिल को आहत कर दिया , अब मैं यहां नहीं रहूंगी ,मैं अपने घर चली जाऊंगी , मेरा असली घर वही है। क्यों ?दूसरों के ख़ुशी देखकर , मैं खुश होती हूं, क्यों मैं ,उनमें अपनी जगह और खुशियां तलाशती हूं। तभी उसे लगा ,जैसे कोई उसके पीछे है , उसने मुड़कर देखा , हिमांशु हाथ में पत्तों का दोना लिए खड़ा मुस्कुरा रहा था।
तुम...... कहकर अमृता ने उठने का प्रयास किया।
तुम कहां चली गई थी? मैंने तुम्हें कहां-कहां नहीं ढूंढा ? कम से कम मम्मी को बता कर तो आ सकती थीं , वह नाहक ही परेशान हो रही थीं , चिंता कर रही थीं , न जाने लड़की कहां चली गई ?
उसकी बात सुनकर ,अमृता फीकी सी मुस्कान से बोली- सॉरी! मैंने नाहक ही तुम्हारे दिल को दुखा दिया , वैसे मेरा ऐसा कोई इरादा नहीं था , इन लोगों का साथ मुझे अच्छा लग रहा था इसीलिए मैं यहां चली आई , मैं कल ही यहां से चली जाऊंगी।
अमृता की बात सुनकर हिमांशु उसके करीब बैठ गया , और बोला -तुम तो, मेरी बात का बुरा मान गईं , तुम स्वयं सोचो ! यदि तुम मेरी जगह होतीं तो तुम क्या करतीं ? मुझे मेरे पिता की बीमारी के बारे में पता ही नहीं है , मैं उनकी कोई सहायता नहीं कर पाया , इस बात का मुझे दुख है।
मेरा उद्देश्य तुम्हें दुख पहुंचाना नहीं था , मैं जानती थी, तुम उस फिल्म के लिए परेशान हो ? यह फिल्म तुम्हारा भविष्य संवार भी सकती है और बिगाड़ भी सकती है , इसीलिए मैंने सोचा , तुम परेशान ना हो, जैसे तुम्हारे माता-पिता वैसे ही मेरे भी, एक बेटी ने ,अपने माता-पिता के लिए ,ये सब कर दिया ,तो कौन सा एहसान कर दिया ? जब तुम्हारी फिल्म हिट हो जाए , तब उधार समझकर ,मेरा पैसा चुका देना , कह कर मुस्कुरा दी।
अच्छा मैं ,अपनी गलती मानता हूं , बात को बिना समझे ही, मैंने उस समय अपनी प्रतिक्रिया दी। लो ! अपने तोड़े हुए 'काफल 'तो खा लो ! इन्हें भी वहीं छोड़ आई , कहते हुए, एक काफल उठाकर , उसके मुंह की तरफ ले गया , किंतु अमृता ने उससे पहले ही ,वह फल उसके हाथ से ले लिया। यदि तुम्हें यहां आना था और मेरे घर का मालूम भी था ,तब तुम मुझे भी तो बता सकती थीं , हम दोनों साथ ही आ जाते , मैं तुम्हारा गाइड बन जाता कहते हुए हंसने लगा और बोला -थोड़ी मेरी भी कमाई हो जाती।
मुझे लगा था ,तुम मुझे अपने साथ ,अपने घर लाने में ,थोड़ी झिझक महसूस करोगे, उस फल को खाते हुए बोली -अभी भी तुमने देखा न....... तुमने कितना बड़ा तमाशा कर दिया ?
उसके लिए मैं, दिल से क्षमा चाहता हूं , हिमांशु को अपनी गलती का एहसास हुआ।
मैं कल ही , मुंबई अपने घर चली जाऊंगी , अमृता ने उससे कहा।
इसका अर्थ है ,तुमने मुझे अभी भी माफ नहीं किया। अब मैं आ गया हूं ,तो तुम्हें यह सारा गढ़वाल दिखाऊंगा , समय रहा तो और भी स्थानों पर घूमने चलेंगे।
क्यों? अब क्या हो गया? जो तुम्हारी बुद्धि अब काम करने लगी , उस समय तो ऐसे प्रतिक्रिया कर रहे थे जैसे मैंने कोई बहुत बड़ी गलती कर दी है।
हां , अचानक तुम्हें देखकर मैं समझ नहीं पाया कि क्या करूं ,क्या कहूँ ? मैं तो सोच रहा था , तुम अचानक ही मेरे पीछे चली आई हो , मुझे बाद में पता चला कि तुम तो मुझसे पहले ही यहां रह रही थीं।
अमृता ने महसूस किया हिमांशु अब उसे आप की जगह तुम करके बात कर रहा है ,मैडम !तो उसने कहना ही छोड़ दिया, ऐसे व्यवहार कर रहा था जैसे साथ के दोस्तों से करते हैं। क्या तुम यह फल नहीं खाते , तुम्हें अच्छे नहीं लगते , या मैंने तोड़े हैं इसलिए नहीं खा रहे हो , अमृता ने पूछा।
नहीं ,नहीं ऐसी कोई बात नहीं है, कहते हुए ,वह भी खाने लगा।
देख रहे हो ! यह ऊंची -ऊंची पहाड़ियां,आसमान को छू लेना चाहती हैं , इनकी ऊंचाई देखकर, कितना अच्छा लगता है ? जितनी ये ऊँची हैं , उतनी ही गहरी भी ,ऊंचाई के साथ -साथ कितनी शांत भी हैं ? जो भी हलचल होगी, इनकी गहराई में छिपी होगी ,उस हलचल को कोई नहीं देख पाता। सिर्फ इनकी ऊंचाई देखते हैं ,इनकी ऊंचाई की भी एक सीमा है ,उस सीमा पर ये अडिग खड़ी हैं ,किन्तु जब भी हवा चलेगी ,बरसात होगी ,सबकुछ इनके बाहरी रूप को ही झेलना होता है। ये सब झेलती हैं ,किन्तु इनकी ऊंचाई ही सबको नजर आती है। किन्तु इसके आस -पास की हरियाली ,इसके सूनेपन को दूर करती है ,इसका साथ निभाती है ,तुम ही सोचो !यदि ये हरियाली ,पेड़ ,पौधे ,फूल इत्यादि न होते ,तब क्या ये पहाड़ी इतनी मनोरम दिखती ,जैसी अब लग रही है। ऊंचाई तो हर कोई पाना चाहता है ,किन्तु इस हरियाली की तरह ,उनके रिश्ते साथ नहीं रह पाते ,या साथ नहीं निभा पाते ,वो पीछे छूट जाते हैं। तब इस चट्टान की तरह ,ऊंचाई पर खड़ा अकेला इंसान ,कैसा महसूस करता होगा ? इन चट्टानों में तो जान नहीं है ,भावनाएं नहीं है किन्तु इंसानो में होती हैं ,वो चट्टान बन स्थिर नहीं रह सकते ,मन की हलचल को तो छुपा सकते हैं किन्तु अपने करीब हरियाली तो चाहते ही हैं ,जो उसे अपने लगें।
तब तक ,हिमांशु एक जंगली फूल तोड़ लाया और अमृता के बालों में लगा दिया।

