सो बातों की एक बात -''भटके हुये मन को ,आत्म केंद्रित करना ,उसे स्थिर करना ही' 'ध्यान ''है।''
''बाहरी दुनिया से अपने को मोड़कर ,उससे विरक्त होकर अपने को पहचानना ही ''ध्यान ''है।''
ध्यानमग्न हो जा ,तू ! मस्त मलंग हो जा, तू !
प्रेम में उसके खो जा तू ! बैरागी हो जा ,तू !
ध्यान उसका ही रहे , दुनिया से बेपरवाह हो जा तू !
दिल में बसा ,मूरत उसकी ,भक्ति में ऐसी ,खो जा तू !
न तू ,तू रहे ,न वो ,वो रहे ,ऐसा एकाकार हो ,जा तू !
ध्यान जिसका करे ,मूरत उसकी सामने दिखे ,
विरह बैरागी हो ,ऐसी सुध -बुध में खो जा तू !
तुझमें ''मैं ''न रहे ,''मैं ''में तू ही तू रहे ,
महसूस कर, उसके विरह की पीड़ा ,
प्रेम अश्रुओं में ,बह जा, तू !
उसकी लग्न में खो जा तू !
ऐसे स्वप्नों में खो जा तू !
ध्यानमग्न हो जा ,तू !
