ठाकुर तेजप्रताप ,पंडित चेतराम के मना करने पर भी ,नहीं माना। जमींदार साहब और पंडित जी को गांववालों के हवाले कर, कुछ गांववालों को संग में लेकर ,जंगल की ओर चल देता है ,अँधेरे में उस जंगल के करीब जाकर ,स्वयं ही डरने लगता है ,तब उन लोगों से ,वापस चलने का बहाना करता है किन्तु उन्हें भी जोश आ रहा था। तभी एक ने ,बड़ी सी परछाई देखी ,डर के कारण , सभी दौड़ने लगे किन्तु जो भी पीछे रह गया उन्होंने महसूस किया ,वो उस बड़ी सी परछाई का शिकार हो चुका है किन्तु उसे देखने से या उसकी जान बचाने से ज्यादा उन्होंने अपनी जान बचाना बेहतर समझा। ''सिर पर पांव रखकर ''दौड़ लगा दी। तब भी ,दो लोगों का पता नहीं ,क्या हुआ ?एक पेड़ पर चढ़ गया ,ठाकुर साहब ने ,जमींदार साहब की पीछे वाली जमीन के खंडहर में छुपकर जान बचाई।
प्रातः काल सभी गांव के लोग ,अपने -अपने कार्य के लिए ,घर से निकल रहे थे ,तभी उन लोगों में से किसी एक की दृष्टि ठाकुर साहब के , लठैत पर पड़ी ,जो अभी भी बेहोशी की हालत में ,गांव की सड़क पर पड़ा था ,लोगों ने उसे उठाकर सही जगह पर लिटाया और बेहोशी दूर करने के लिए ,उसके मुँह पर पानी के छींटे मारे ,तब भी बहुत देर में ,उसे होश आया ,तब भी हैरान परेशान सा उन सभी को देख रहा था। गांव का गांव उसे देखने के लिए उमड़ पड़ा जिसने भी सुना अपना कामधाम छोड़कर ,वहीं उपस्थित हो गया। उनके चेहरों पर अनेक सवाल नजर आ रहे थे ,जिनका जबाब वही दे सकता था। जैसे ही वो थोड़ा वर्तमान में आया ,सबसे पहले उसने अपने आप को छूकर देखा ,तब उसे विश्वास हुआ कि वह मरा नहीं जिंदा है। उसने थोड़ा और पानी पिया। गांववालों को जब लगा अब वो स्वस्थ है ,तब उससे प्रश्न पूछा - रात्रि में क्या हुआ था ? ,बाकि के लोग कहाँ हैं ?ठाकुर साहब कहाँ हैं ? क्या पंडित और जमींदार साहब ठीक कह रहे थे।
उसने रात्रि की घटना सबको विस्तार से बता दी ,उसने बताया ,उसे नहीं मालूम ,उन लोगों का क्या हुआ ?जिन्दा हैं या........ कहकर उसने अपने हाथ ऊपर की तरफ उठा दिये।
सभी गांववालों ने आपस में ,विचार -विमर्श करके सबसे पहले ,पंडित जी और जमींदार को छोड़ दिया उसके पश्चात ,बाकि के लोगों की तलाश में निकल पड़े ,जंगल की तरफ जाने वाले रास्ते में अपने -अपने हथियार लेकर पहुंचे ,तब जिस स्थान को उस लठैत ने बताया था ,वो तो इतना डरा हुआ था ,वो उनके साथ आया ही नहीं ,उसने बस वो जगह बताई ,उसी स्थान पर वो लोग पहुंचे किन्तु वहाँ के हालात देखते ही, सभी की हालत खराब हो गयी ,किसी -किसी से वो दृश्य देखे ही नहीं गए। लाश के नाम पर कुछ टुकड़े पड़े थे। सभी ने आस -पास का निरीक्षण किया ,तब एक बच्चे की दृष्टि ,पेड़ पर पड़ी ,उसने शोर मचाया ,वो देखो ऊपर ,सभी ने देखा ,एक लठैत दो बड़ी मोटी टहनियों के कारण उसका शरीर लटका पड़ा था ,कोई नहीं जानता था ,वो मर गया या जिन्दा है।
सभी ने मिलकर उसे उतारा ,एक ने उसकी नब्ज देखी और बताया ,नब्ज़ चल तो रही है किन्तु धीमी इसे वैद्य के पास ले जाना होगा। दो लोग ,उसे उठाकर ले गए किन्तु अभी तक ठाकुर साहब कहीं नहीं दिख रहे थे। अब कहाँ देखें ?ये सोचकर ,वापस हो लिए ,मन ही मन सभी गांववालों को ,पंडितजी की बातों पर विश्वास हो चला था। लौटते समय एक गांववाले ने कहा -इस खंडहर में भी देख लेते हैं किन्तु ठाकुर साहब वहां भी नहीं मिले ,मिलते भी कैसे ?रात्रि में घबराहट के कारण उनकी हालत खराब थी ,किसी तरह यहाँ आकर अपनी जान बचाई ,दौड़कर थक भी गए थे ,वहीँ पड़े -पड़े नींद आ गयी ,सूरज की पहली किरण जब उनके चेहरे पर पड़ी ,उनकी आँख खुल गयीं ,घबराते से बाहर आये, जिस शान से अपने लठैतों को लेकर गए थे ,अब किस मुँह से गांववालों के सामने जायें ? सभी यही प्रश्न करेंगे ,तब तो बड़ी हेकड़ी दिखा रहे थे ,अब कहाँ गयी ?वो हेकड़ी !यही सोचकर छुपते -छुपाते अपने घर में जा छिपे।
अब जिसे पेड़ से उतारा था ,वो ही यदि बच गया, तो बता सकता है ,ऐसा उसने क्या देखा ,जो उसकी ऐसी हालत हो गयी। पंडित जी को अब कहने का मौका मिल गया ,वो बोले -आप सभी ,मेरे जजमान हैं ,अपने गांव का कभी बुरा नहीं चाहूंगा ,मैंने जमींदार साहब को पहले ही आगाह कर दिया था किन्तु इन्होने भी ,मेरी बात नहीं मानी। अब जब तक वो ठीक होता है ,और ठाकुर साहब नहीं मिल जाते ,तब तक रुकना नहीं है ,अब उस शैतान को अंदाजा हो गया है ,उधर जो भी जायेगा ,उसे वो मारकर खा लेगा ,उसके लिए वो जंगल सुरक्षित जगह हो गयी है किन्तु जब भी उसे भोजन नहीं मिलेगा ,तभी वो इस गांव की ओर रुख करेगा ,उसे अपने पेट भरने से मतलब है। इसीलिए ,मैं कहता हूँ ,उसे तभी पकड़ा जाये ,जब वो कमजोर हो ,वो तभी कमजोर होगा ,जब दिन होगा ,इसीलिए उसे जंगल से बाहर निकालना होगा वरना हरिया की तरह ,उन लठैतों की तरह हमें अपने लोगों के शव भी नहीं मिलेंगे।
पंडित जी !अब ये तो बताओ ! हमें करना क्या होगा ?समीर ने पूछा।
अब तक जमींदार साहब ,चुपचाप सर झुकाये बैठे थे ,तब गांववालों से हाथ जोड़कर बोले -मैं आप लोगों का अपराधी हूँ ,मैं पुत्र पाने की लालसा में ,बहुत ही घ्रणित कार्य कर बैठा ,पंडित जी ने तो मुझसे मना कर दिया था कि मेरे जीवन में संतान सुख है ही नहीं ,अब भी दिख रहा है ,संतान हुई भी तो ऐसी ,इससे तो मैं निसंतान ही भला था ,उसके होते हुए भी मुझे ,अपमान के सिवा कुछ नहीं मिला। अब आप लोग जैसा चाहें ,कर सकते हैं ,ये आप लोगों के जीवन का भी सवाल है। अब पता नहीं ,मैं कब तक रहूं या न रहूं ?किन्तु गांववालों के सामने ,ये घोषणा करता हूँ -मेरी जमीन ,जिसमें मेरी गाड़ी खड़ी रहती है ,उस हिस्से को हरिया के परिवार को सोंपता हूँ ,जैसा कि मैंने उससे वायदा किया था ,वो जमीन उसकी होगी। दीनदयाल भी बाहर कहीं नहीं गया है ,वो भी उसी का शिकार हुआ है ,मैंने सोचा था ,जब तक मैं जिन्दा हूँ ,उसके परिवार का भरण -पोषण करूंगा किन्तु अब आप लोगों के सामने ,उसके परिवार को पांच एकड़ जमीन देता हूँ ,उसमे चाहे वे खुद खेती करें या किसी से करवाएं ,उसकी जितनी भी आमदनी होगी ,उसके हकदार वही होंगे।
तब भीड़ में से एक ने कहा ,इस तरह जमीन देकर ,अपने पापों का प्रायश्चित कर रहे हो। किन्तु वो लोग तो वापिस नहीं आएंगे।
दूसरे ने कहा -तभी तो प्रायश्चित कर रहे हैं।
पंडित जी को लगा था ,जब जमींदार साहब ये गांव छोड़कर जायेंगे ,तब उनकी सम्पत्ति का मालिक मैं ही होऊंगा किन्तु उन्हें इस तरह जमीनें बांटते देखकर बोले -देखा !हमारे जमींदार साहब से एक गलती हो गयी ,उसका इन्हें पछतावा भी है।
तभी एक आदमी दौड़ता हुआ आया और बोला -ठाकुर साहब, मिल गए।
कहाँ ???समवेत स्वर ! सभी ने पीछे मुड़कर देखा।
अपने ही घर में हैं ,किन्तु उनकी हालत भी ख़राब है।
.jpg)
