Shrapit kahaniyan [part 50]

 कलुवा और समीर को ,पता चल गया था कि ये जमींदार के बेटे का ही कार्य है ,जिसकी जानकारी पंडित चेतराम को भी है। वो लोग ,सोचते हैं ,पंडित को यहीं पर बुलाकर ,उससे अपने सभी सवालों के जबाब मांगते हैं। अब सही मौका है ,''लोहा गर्म है ,बस हथौड़ा मारना है। ''जिसका लाभ'' ठाकुर तेजप्रताप उठाना ''चाहता है। उसे गांव के दुःख -दर्द से कोई लेना -देना नहीं है ,बस वो तो ,जमींदार की फजीहत देखना चाहता है। जिसमें कि उसे अब मौका मिला गया है। उधर हवेली में जमींदार और पंडित आपस में बातचीत करते हैं -पंडितजी !अब मेरे हाथ में कुछ नहीं रहा जमींदार साहब ने अपनी बेबसी जतलाई। 

क्यों क्या हुआ ? पंडितजी ने उत्सुकता से पूछा। 


होना क्या है ? जब उस कमरे की दीवार टूटी ,तब वो आजाद हो गया और जंगल में चला गया ,उसे लाने ही तो मैं ,जंगल में गया था ,वहाँ  उसे खूब ढूंढा , ढूंढने में ही दिन छिप गया ,जब मैं वापिस आ रहा था ,तभी वो उसे दिखा और हरिया को तो उसके विषय में कुछ नहीं मालूम था। वो ही छोटे सरकार  को लेकर आना चाहता था, मैंने गाड़ी में बैठकर ,बहुत आवाज लगाई किन्तु वो उसे साथ लेकर आना चाहता था। तभी ये सब हो गया ,दुखी मन से जमींदार साहब ने सम्पूर्ण वाक्या बयान कर दिया।

ओह ! ये बात सबसे ख़तरनाक है ,वो सारा  दिन में जंगल में नहीं दिखा और शाम को ही दिखा इसका अर्थ है , वो तब भी दिखा नहीं ,बल्कि वो स्वयं सामने आया ,अपने कार्य को अंजाम देने ,कुछ समझ रहे हैं ,जमींदार साहब ! उसकी शक्तियां बढ़ गयीं है और वो अपने शिकार को ढूंढने के लिए ,कुछ भी छल कर सकता है। 

अब क्या किया जाये ?चिंतित स्वर में वो बोले। 

पहले तो उसे जंगल से बाहर करना होगा ,उसके पश्चात , आप दोनों पति -पत्नी को अपना मोह त्यागना होगा और उसको नर्क में वापिस जाना होगा ,उसके लिए वही ठीक रहेगा ,वरना वो तुम्हें भी नहीं छोड़ेगा। 

अब जीने की इच्छा ही किसे बची है ?अब इतनी हत्याओं का पाप अपने सिर लेकर जीना ही  किसे है ?

तब ठीक है ,अभी मैं चलता हूँ ,देखता हूँ ,क्या करना है ? कहते हुए पंडित जी ,बाहर आ गए तभी कुछ लड़के उन्हें अपनी तरफ ही आते दिखलाई दिए ,उन्हें देखकर पंडित जी बोले -क्यों ,भई ! इस तरह यहाँ क्यों घूम रहे हो ?

हम आपको ही लेने आये हैं  ,वे बोले। 

उनकी बात सुनकर ,पंडित जी चौंके और बोले -मुझे क्यों और कहाँ ले जाने के लिए आये हो ?

चौपाल लगी है ,वहीं चलना है ,मन ही मन पंडितजी ने सोचा -कहीं इन लोगों को कुछ शक़ तो नहीं हो गया है। चलिए !वैसे आज चौपाल क्यों लगी है ?

वहाँ जाने पर ही पता चल जायेगा ,वे लड़के जहरीली मुस्कान बिखेरते हुए बोले। 

चौपाल में ,पहुंचकर ,सभी जैसे पंडितजी की प्रतीक्षा में ही बैठे थे। किसी ने भी पंडितजी को 'राम -राम 'तक नहीं किया वरन उनके आते ही चुप हो गए ,पंडित जी को गांववालों का ये व्यवहार ,अच्छा नहीं लगा किन्तु वहाँ का माहौल उन्हें चुप रहने के लिए कह रहा है ,इसीलिए शांत रहे , कुछ देर की चुप्पी ही खाने को दौड़ रही थी ,लग रहा था-जैसे सभी अपने -अपने मन में कुछ न कुछ दबाये बैठे है ,तब पंडितजी ने ही  पूछ  लिया - आज ये बैठक ,क्यों बुलवाई गयी है ?

तभी' ठाकुर तेज प्रताप 'अपनी मूछों को मरोड़ते हुए बोला -क्या आपको नहीं मालूम ! क्या पंडित जी !गांव में कांड करवाते हो ,और पूछते हो क्या हो गया ?

ये  आप क्या कह रहे हैं ?ठाकुर साहब ! मैंने क्या किया ?पंडित ने अनभिग्यता जतलाई।

कलुवा से पंडितजी का ये भोलापन बर्दाश्त नहीं हुआ और बोला -क्या पंडितजी आप नहीं जानते ?जमींदार साहब का बेटा ही, इस सारे फ़साद की जड़ है ,वो ही ये सब हत्याएं कर रहा है।

 पंडित !अब तुम्हारी पोल खुल चुकी है ,अब सीधे -सीधे अपना गुनाह कबूल कर लो ! ठाकुर तेज प्रताप ने कलुवा का समर्थन करते हुए कहा। 

कैसे कबूल कर लूँ ?जब मैंने कुछ किया ही नहीं, पंडितजी अपनी सच्चाई पर आ गए। 

क्यों ?आप नहीं जानते थे  ,वो जमींदार का ही लौंडा है ,जो ये सब कांड कर रहा है ,पता नहीं ,कौन है ? कहाँ है ?हमने तो कभी देखा भी नहीं समीर ने प्रश्न किया। अभी भी ,पंडितजी का लोगों के मन में मान था ,वो उनकी बात भी ध्यान से सुनना चाहते थे ,इसीलिए उनकी दृष्टि पंडितजी की तरफ गयी। 

पंडितजी ने सोचा ,अब सच्चाई इन लोगों को बता ही देनी चाहिए , इनको भी सच्चाई जानने  का हक है ,तब पंडितजी  बोले - मैंने पहले ही बता दिया था कि जमींदार साहब ,की किस्मत में औलाद का सुख नहीं है किन्तु उनकी पत्नी को एक औलाद  की आस थी ,तब एक तांत्रिक ने अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए ,उनको पुत्र का लालच दिया और अपने तंत्र से उसने ''कुंभर्क '' नाम के जीव को उनकी औलाद के रूप  में ,उत्प्नन किया। 

क्या वो ''कुंभर्क ''जिन्होंने भी उसे देखा ,उसका नाम सुनकर उन्हें आश्चर्य हुआ। 

हाँ वही ,जिसके नामकरण में तुममें से कुछ लोग गए होंगे ,मैं भी गया था किन्तु तभी मैंने उन्हें इशारा भी कर दिया था ये आपका बालक कोई साधारण बालक नहीं है ,इसमें कुछ आसुरी शक्तियां विद्यमान हैं ,और जैसे -जैसे ये बड़ा होगा इसकी शक्तियां बढ़ेंगी ,इसीलिए इसे लेकर यहाँ से चले जाइये किन्तु उन पति -पत्नी ने न ही मेरी पहली बात मानी ,न ही दूसरी। हाँ मैं ये बातें जानता था- कि आने वाले समय, हम गांववालों के लिए भारी पड़ जायेगा ,इसीलिए समय -समय पर जाकर उन्हें चेताता रहा ,उससे वो स्वयं भी सुरक्षित नहीं थे। तब मैंने उनके लिए भी उपाय किया और रात्रि के समय वो बाहर न निकले इसीलिए ,उसे अपनी दैवीय शक्तियों से बांध दिया किन्तु उस दिन बारिश के कारण ,जब दीवार टूटी तब वो आजाद  हो गया। जमींदार साहब ,ने हरिया को बचाने का बहुत प्रयास किया किन्तु वो राक्षस ,उसके सामने उनकी नहीं चली और हरिया उसका शिकार हो गया। आज भी मैं यही सब समझाने गया था। पंडितजी की बातें कुछ लोग मंत्रमुग्ध होकर ऐसे सुन रहे थे ,जैसे कोई कहानी सुन रहे हो। 

तभी एकदम से कलुवा चिल्लाया ,उसने मेरे भाई को ही क्यों मारा ?अपने बाप को क्यों नहीं मार दिया ?


तभी ठाकुर तेज प्रताप बोले -पंडित तू ये डरावनी कहानी सुनाकर ,गांववालों को तो बहका सकता है किन्तु मुझे नहीं ,ये क्या हमें आसुरी शक्तियों के  विषय में बताकर डरा रहा है ,हमने तो आज तक ऐसा न कहीं  देखा ,न ही सुना। 

आपने तो कुम्भ के अंदर भी ,बच्चा बनते न देखा होगा  किन्तु ये घटना ,हमारे गांव में ही घटित हुई है ,वो जमींदार साहब का बेटा ,ऐसा ही है। दिन में वो भोला , साधारण सा लड़का दीखता है किन्तु रात्रि में वही शैतान बन जाता है। 

अब ठाकुर साहब ,परेशान हो गए ,उन्हें उन बातों पर कोई विश्वास नहीं हुआ ,बोले -ये पंडित ,जमींदार से मिला हुआ है ,हमें बेवकूफ बना रहा है। इसने हमारे कितने आदमियों को मरवा दिया और अब यहाँ झूठी कहानियां सुना रहा है।मारो !इसे मारो ! 



laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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