Shrapit kahaniyan [part 45 ]

हरिया के मरने पर , जमींदार साहब बेहद दुखी और परेशान थे ,उनकी पत्नी ने जब उनसे पूछा तो वो..... कुछ कह न सके। वो उनके बिना कहे ही, सब समझ गयीं और अफ़सोस के कारण जमीन पर बैठ गयीं। वो ये भी भूल गयीं  कि  उन्होंने कुंभर्क के कमरे को साफ करने के लिए ,किसी अनजान को उसकी सफाई का कार्य सौंपकर आईं हैं। जमींदार साहब कहने लगे -वो तो मैं ,न जाने कैसे ''बाल -बाल बच गया ,''वरना  मेरा अंत भी निश्चित था। 

बाल -बाल नहीं बचे हो ,आपको तो पंडितजी द्वारा दिए गए ,ये ताबीज़ और इस रुद्राक्ष की माला ने बचाया है ,आपने ये नहीं सोचा -जब उसने गांव में ही , पांच -छह आदमियों को एक साथ मार दिया ,तब क्या वो हरिया को मार कर ,आपको क्यों छोड़ देता ?


अब  जमींदार साहब को अपनी पत्नी की बात सच्ची लगी और बोले -शायद ,तुम सही कह रही हो। पंडितजी से मिलना होगा। अब इसका और कोई हल है या नहीं ,हमने अपनी ममता के वश होकर ,एक शैतान को पाल लिया ,तुम नहीं जानती ,आज मैंने उसका क्या रूप देखा था ? उसके उस रूप में ,तो रिश्ते नाते,उसके लिए  कुछ भी नहीं हैं। 

तभी बाहर के दरवाजे पर खट -खट की आवाज होती है ,अब इस समय कौन आ गया ?वो दुःखी मन से उठती हैं ,जैसे ही दरवाजे तक पहुंचती हैं ,उन्हें स्मरण हो जाता है कि उन्होंने तो किसी को ,उस कमरे की सफाई का कार्य दिया था। उसे देखते ही बोलीं -ओह !मैं तो भूल ही गई थी ,हो गयी ,सफाई !

जी ,आप चलकर देख लीजिये। 

कौन है ?अंदर से जमींदार साहब ने पूछा। आओ , बेटे !अंदर आओ !जमींदार साहब से भी मिल लो ,उनकी थोड़ा तबियत ठीक नहीं है। अब तो रात्रि भी बहुत हो गयी है ,तुम चाहो तो ,रात्रि को यहीं ठहर कर ,कल चले जाना।

 जी ,कहकर वो अंदर  आया ,नमस्कार , जमींदार  साहब !

जमींदार साहब ने उसे एक नजर देखा और बोले -किस गॉँव से हो ? जी पास में ही है ,''पलड़ा ''गांव का हूँ।

क्या ,काम करते हो ?

जी काम की तलाश में ही तो, इधर  से गुजर रहा था ,किन्तु मांजी ने देख लिया और उन्होंने उस कमरे की सफाई का कार्य दे दिया।

 उसकी ये बात सुनकर , जमींदार साहब उससे नजरें चुरा गए कि कहीं  ये ,ये न पूछ बैठे ,उस कमरे में ऐसा क्या हुआ था ?जो वहाँ इतनी दुर्गंध और हड्डियां पड़ी थीं। तभी जमींदारिनी जी उसके लिए चाय बिस्कुट ले आईं और बोलीं -पहले तुम ये सब खा -पी लो ,खाना बनने में अभी समय लगेगा। 

जी ,कहकर वो चाय और बिस्कुट लेकर बैठ गया और चाय में बिस्कुट डुबो -डुबोकर खाने लगा। 

और बताओ !तुम्हारे घर में और कौन -कौन है ?

जी ,मेरी माँ ,मेरी पत्नी और उसके दो बच्चे !

ये शब्द सुनकर जमींदार साहब को अजीब लगा और बोले -क्यों ?क्या वे बच्चे तुम्हारे नहीं हैं ?

जी हैं ,किन्तु मेरे बच्चे भी तभी हुए ,जब वो हमारे घर आई ,उसी ने तो मुझे पिता का सुख दिया इसीलिए मैं ,उन्हें उसी के बच्चे कहकर पुकारता हूँ।

 भई वाह ! तुम्हारा ज़िंदगी को देखने का नजरिया अलग ही लगता है ,वैसे भी तुम मज़ेदार आदमी लग रहे हो। हमारे यहाँ काम करोगे ,जमींदार साहब ने पूछा। 

क्या काम ?

गाड़ी चलनी आती है। 

जी आती है। तब तुम हमारे ड्राइवर ही बन जाओ !

नहीं , मैं भी भीमा और हरिया की तरह मरना नहीं चाहता। 

उसके इतना कहते ही ,रसोई में जो जमींदारिनी जी खाना बनाने की तैयारी कर रहीं थीं ,उनकी बात सुन रहीं थीं ,वे बाहर आ गयीं ,दोनों आदमी आश्चर्यचकित हो गए ,अभी तो इस बात की जानकारी ,गांव में भी किसी को नहीं है और इसने कैसे जान लिया ? कहीं ये ,कोई पुलिस का आदमी तो नहीं। दोनों पति -पत्नी ने एक -दूसरे को देखा ,जमींदार साहब ने पूछा -तुम ये क्या कह रहे हो ?

जी ,अभी तो आप बता रहे थे कि हरिया नहीं रहा ,तब मैं बाहर ही खड़ा था ,और भीमा की जानकारी कैसे मिली ?

 वो तो ,सम्पूर्ण गांव में ये बात फैली है ,भीमा आपकी गाड़ी लेकर ही गया था और फिर जिन्दा नहीं बचा। 

उसकी बात सुनकर जमींदार साहब आश्वस्त हुए और बोले -ओह !  तो ये बात है। इसमें हम क्या कर सकते हैं ?

आप इस गाड़ी को बेच दीजिये ,ये बड़ी मनहूस है और मैं मरना नहीं चाहता उसने बिना किसी संकोच के अपनी बात कह दी ,उसकी बात सुनकर जमींदार साहब सोच में पड़ गए ,अब इसे क्या जबाब दें ? तभी उनकी पत्नी ने उनसे अंदर चलने के लिए कहा। जमींदार साहब पत्नी के पीछे -पीछे अंदर गए और बोले -अब तुम क्या कहना चाहती हो ?

मेरा विचार है ,अब तुम इसे नौकरी पर न रखो !

क्यों ,क्या हुआ ?


देखा नहीं, कितना तेज है ?पुलिसवालों की तरह पैनी नजर है इसकी और स्रवण शक्ति आपने देख ही ली किसी अनजान को अपने घर  रखना  खतरे से ख़ाली नहीं है। 

शायद ,तुम ठीक कह रही हो , उनकी बात का समर्थन करते हुए बोले -अब क्या करना है ?

अब क्या ? रात्रि को रुकने के लिए तो कह ही दिया है ,बाहर बरामदे में सो जायेगा ,कल इसके पैसे देकर ,इसे चलता कर देंगे। 

ठीक  है ,कहकर जमींदार साहब बाहर आ जाते हैं। 

प्रातः काल जब जमींदार साहब  उठे तो क्या देखते हैं ,उस अनजान  सम्पूर्ण घर की सफाई कर दी है ,ये देखकर जमींदार साहब चौंके और बोले -ये सब तुमने कब किया ?रात्रि को ठीक से नीद आई भी या नहीं। 

राम -राम ,साहब ! जी नई जगह है ,नई जगह इतनी जल्दी नीद तो नहीं आती इसीलिए सुबह उठकर घर की सफाई  ही कर दी। वैसे मालिक ,आप दोनों के सिवा घर में और कौन -कौन है ?

क्यों ? तुम ये क्यों जानना चाहते हो ?

वो तो वैसे ही ,आप दोनों  के सिवा और कोई नजर नहीं आ रहा  ,कहते हुए ,इधर -उधर देखने लगा। 

हाँ इस घर में हम दोनों ही हैं ,इससे पहले कि वो और कुछ पूछता ,जमींदार साहब उससे कहते हैं -आओ ,चलो !देखते हैं ,तुमने उस कमरे की सफाई ठीक से की है या नहीं। 

जी चलिए कहकर वो आगे -आगे बढ़ गया ,आगे -आगे चलते हुए बोला -मैंने सुना है ,आपके एक बेटा भी है ,अबकि बार जमींदार साहब चौंके नहीं ,न ही उससे कुछ पूछा ,वरना कह देगा ,गांव में ही किसी से पता चला। उन्होंने कमरे में पहुंचकर देखा ,कमरे की दुर्गंध भी कम हो गयी है किन्तु सफाई अच्छी की है ,ये देखकर ,ठाकुर साहब हर्षित हुए और बोले -काम तो तुमने सही किया है। 

जी मैं ,जो भी कार्य करता हूँ ,मन लगाकर करता हूँ ,वैसे भी ये  सब, जिसने भी किया ,वो कोई वहशी ,दरिंदा ही होगा ,न ही उसने जानवरों को छोड़ा ,न ही इंसानों को ,वो बहुत ही ख़तरनाक है ,उसको इस तरह खुला नहीं छोड़ा जा सकता। जमींदार साहब की तरफ देखते हुए -वैसे कौन था ?वो !

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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