अंधकार को चीरकर ,प्रकाश की किरण आई है।
उड़ते पंछी आकाश में ,भोर की ,लालिमा छाई है।
अंधेरों को चीरती , मदमस्त सुबह आई है।
पंछी उड़ चले , छोड़ अपने -अपने नीड़ ,
खाने की तलाश में ,देखो ! सुबह आई है।
अलसाई सी सुबह में ,अजीब सी खुमारी छाई है।
पशु -पक्षी सभी ने जैसे , फुर्ती की होड़ लगाई है।
आलसी लोगों ,बच्चों के लिए, बहुत ही दुखदाई है।
माँ कहती , उठ जा बेटा ! अब भोर निकल आई है।
चिड़ियों ने , अंगना में चहचाहट की गुंजार लगाई है।
इस वृक्ष से उस वृक्ष ,गिल्लू पर, अजब मस्ती छाई है।
