Jail [part 98 ]

अमृता से यश की पत्नी मिलती है ,और तब उसे भी पता चलता है कि ये अमृता मेरी सौत है। अमृता को तो उस पर पहले से ही क्रोध था ,बोली -मैं इसकी ज़िंदगी में तुमसे पहले आई थी। 

तुमने आकर कोेन से तीर मार लिए, जबरदस्ती के रिश्ते को तुम ,प्यार का नाम दे रही हो ,वो तुमसे प्यार नहीं करता ,प्यार करता तो, मेरे रिश्ते को ठुकराकर तुम्हारे पास चला जाता। तुम्हारा वो था ही नहीं ,न ही अब है।

 क्यों नहीं है ?अब भी तो मेरे पास है। 


तुम्हारे पास...... क्यों अपने आप को धोखा दे रही हो ?वो तुम्हारा होता ,तो वो यहाँ नहीं , तुम्हारे पास होता ,देखो ! वो यहाँ कितना खुश है ? कहते हुए ,जोर -जोर से हंसने लगी ,अमृता अपने स्थान से उठी और बोली - मैं तुम्हें नहीं छोडूंगी और उसका गला पकड़ लिया।

 तभी छोटू की आवाज से अमृता चौंकी ,मैडम जी ! ये आप क्या कर  रहीं हैं ?

 तभी अमृता जैसे सपने से बाहर आई उसने देखा ,जिसे वो यश की पत्नी का गला समझ रही थी ,वो एक पेड़ था जिसे वो कसकर पकड़े हुए थी। अब उसे एहसास हुआ कि वो एक सपना देख रही थी। सपने से बाहर आ ,उसका जी चाहा ,वो यश के करीब जाये और उसे दो तमाचे लगाये और उससे कहे -ये सब क्या तमाशा है ?आखिर वो क्या कर रहा है ? क्या चाहता है ?यहाँ तो वो ,उसकी पत्नी से उसे तलाक देने के लिए कहने आई थी किन्तु यहाँ के हालात देखते हुए लगा ,कुछ भी सही नहीं है। हो सकता है ,ये मेरी ही बेइज्जती कर दे ,अपनी बच्ची का जन्मदिन बिगाड़ने का मुझ पर इल्जाम लगा दे। अपनी पत्नी को तलाक न देकर मुझसे ही दूर चला जाये। अब सबसे पहले ,मुझे उसके मन में क्या चल रहा है ?क्या चाहता है ?ये जानना होगा।

छोटू अब चलो !मुझे वापस जाना है ,कहकर वो वापस आ गयी ,छोटू की इच्छा थी कि कुछ देर रुके इसीलिए उसे वहीं छोड़कर वापस अपनी मंजिल की ओर चल दी। घर पहुंचकर ,आराम से खाना खाया और आराम करने अंदर चली गयी। देर रात्रि को यश घर आया ,उसे देखकर ,जैसे पहले अमृता के मन में ख़ुशी की लहर दौड़ जाती थी ,ऐसा कुछ भी नहीं हुआ ,उसने यश को देखा और प्रश्न किया -आज बहुत देर कर दी ,कहाँ गए थे ?

अपने काम के सिलसिले में बाहर गया था ,वो जानती थी ,इसकी सैक्रेटरी इसे अवश्य ही बतायेगी कि मैं , इसके दफ्तर में गयी थी। यही सोचकर बोली -  आज तुम दफ्तर में भी नहीं थे जब मैं वहाँ गयी।  

ये बात सुनकर ,यश बोला -तुम मेरे दफ्तर में क्या करने गयीं थीं ?अब तुमने मेरी जासूसी भी आरंम्भ कर दी। 

इसमें जासूसी कैसी ?अपने पति के दफ्तर भी नहीं जा सकती ,तुमसे मिलने का दिल चाहा और पहुंच गयी किन्तु तुमने तो जैसे कसम खा रखी है ,अपनी पत्नी को कुछ नहीं बताना है ,सब कुछ स्वयं ही झेलना है। अमृता के ऐसे शब्द सुनकर ,यश अविश्वास से उसकी तरफ देखता है। हाँ -हाँ ऐसे क्या देख रहे हो ?तुमने तो मुझे कभी समझा ही नहीं ,मैं तुम्हारे प्यार में ,अब तक तुम्हारी प्रतीक्षा में रही। क्या मुझे लड़कों की कमी थी ?मैंने विवाह के लिए नहीं सोचा ,तुम्हें देखते ही फिर से मेरा प्रेम जाग्रत हो उठा और आज लगता है ,जैसे हम दोनों अजनबी हैं। तुम मुझे कुछ बताना नहीं  चाहते ,कुछ न कुछ तो पर्दादारी है। 

क्या पर्दादारी हो सकती है ? तुम्हारे मन का वहम है ,वहम की कोई दवा नहीं ,यश हकलाते हुए से बोला -अब मुझे  सोने दो ! कल मुझे जल्दी उठना है, कहकर वो पलंग के एक कोने पर पसर गया।

 उसके इस व्यवहार से वो अंदर ही अंदर परेशान थी किन्तु अपने मन पर जब्र किया। लोग कहते हैं -''इंसान बदल गया ,कभी -कभी परिस्थितियां भी उसे ,बदलने पर मजबूर कर देती हैं ,व्यवहार ही नहीं ,सोच भी बदल जाती है।'' अब अमृता भी अपने को बदलने का प्रयास कर रही है। 

सुबह जब यश उठा उसने देखा ,अमृता उसके लिए चाय -नाश्ता बना रही थी ,ये देखकर एकबारगी यश को अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हुआ ,बोला -तुम और यहाँ...... 

हाँ ,नींद नहीं आ रही थी ,सोचा ,तुम्हारे लिए नाश्ता ही बना दूँ। 

क्यों ,नींद क्यों नहीं आई ?यश अपने मुँह में टोस्ट ठूंसते हुए बोला - क्या कोई परेशानी है ?नहीं ,परेशानी तो कोई नहीं ,ख़ुशी की बात भी है ,परेशानी की भी...... 

क्या बात ?

उस दिन , जब मैं ,तुम्हारे साथ पार्टी में गयी थी। 

अमृता की बात सुनकर उसकी बात मध्य में रोककर बोला -ओह ! हाँ ,याद आया ,मैंने सुना ,तुमने वहां शराब पी थी और तुम उस पार्टी को मध्य में  ही छोड़कर आ गयीं थीं। 

उसकी बात सुनकर अमृता तिलमिला गयी और मन किया कि इसे सुनाऊँ ,'वहाँ ,मुझे बेइज्जती करने के लिए ले गए थे किन्तु अपने को नियंत्रित कर बोली - हाँ ,वहीं पर ,एक निर्माता निर्देशक मिल गए और कहने लगे -'अब तो तुमने फिल्मों में काम करना ही छोड़ दिया। ' तब मैंने कहा -ऐसी कोई बात नहीं है ,कोई अच्छी कहानी पर अच्छा किरदार करने को मिलेगा तो अवश्य करूंगी। 

तो..... क्या? तुम काम करोगी ?


तो क्या ? मैं काम तो नहीं करूंगी किन्तु मेरी एक सहेली है ,कीर्ति ! मैं सोच रही थी ,यदि मेरे लिए कोई रोल आता है ,तो उसको बोल दूंगी ,वो भी अच्छी अभिनेत्री है ,उसने मेरे साथ एक धारावाहिक में काम किया है ,उसके नाम से ,यश के चेहरे पर मुस्कुराहट आई किन्तु वो शीघ्र ही छुपा गया। ठीक है ,जैसी तुम्हारी इच्छा !कहकर वो नाश्ता कर उठने लगा तभी अमृता  बोली -बस ,एक गड़बड़ है ,उसका कोई फोन नंबर ,या पता मुझे नहीं मालूम....... 

अमृता के मन में क्या चल रहा है ?वो स्वयं अमृता ही नहीं जानती ,किन्तु पक्का कुछ न कुछ तो खिचड़ी पक ही रही है ,या फिर जो खिचड़ी यश ने पकाई है ,उसका तोड़ ढूंढ़ रही है ,अब आगे जो भी होगा ,जानने के लिए पढ़ते रहिये -''जेल '' 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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