मुदत्तों बाद ,वो 'गुलाब 'की कली बनी ,
अपनी बगिया को देख ,माली मुस्कुराया है।
कब ये ?मोहक पुष्प बन ,महकेगी ,
यही सोच, मन ही मन इठलाया है।
'' कली ''पुष्प बन खिल उठी,बगिया को महकाया है
ये गुलाब ! अपने संग कांटे भी लाया है।
कोई इन्हें कहता रक्षक ,कोई भक्षक....... !
काँटों से लहूलुहान हो ,बारिश -आँधी में भी मुस्कुराया है।
यौवन गुलाब का , भंवरों को भी भाया है।
इतने पहरों पर भी ,इस' गुलाब 'ने गुलशन को महकाया है।
बिखर जाता है जब , इसका ,अंग -अंग ,
बिखरकर भी ,उत्सवों और 'शेरों की मौत ' को सजाया है।
गुलाब एक ही रंग में नहीं, हर रंग में भाया है।
हर रंग में ,हर पल में ,अपना रंग जमाया है।
पीले गुलाब ,ने दोस्ती का हाथ..... बढ़ाया है।
लाल गुलाब, ने तो ''दिल से दिल ''मिलाया है।
मोहब्बत का ''पैग़ाम'' दिलबर को सुनाया है।
गुलाब जैसा ,उसका रूप ही, मुझको भाया है।
कवियों ने उसकी मुस्कान को 'गुलाब ' बताया है।
