कामिनी, डिकोस्टा को अपनी कहानी सुनाती है कि किस तरह उसकी सास ने ,उसके पेट में बच्ची के आ जाने पर ,झूठ बोलकर मुझे इस कुएं में धकेल दिया। एक गर्भवती महिला को कुएं में धकेलकर ,वापस जब घर पहुंची ,तो घरवालों से कह दिया कि पता नहीं, कहाँ गयी है ? मुझसे बताकर नहीं गयी। इस औरत ने कहना न मानने की कसम खा रखी है। जब इससे गर्भपात कराने के लिए कहा तो इसने तब कहना नहीं माना और अब न जाने कहाँ रह गयी ?माँ के भड़काने पर किसी का भी ,साहस नहीं हुआ कि कोई उनके आगे कुछ कहता। इन सास -बहुओं की लड़ाई से ,घरवाले पहले ही अपने हथियार डाल चुके थे। दोनों ही परले दर्जे की जिद्दी औरत हैं ,घरवाले उसकी ज़िद से पहले ही परेशान थे किन्तु कर भी क्या सकते हैं ?कुछ देर प्रतीक्षा कर लेते हैं ,ये सोचकर निश्चिन्त हो गए।
तब तुम्हें मंदिर में आने -जाने वालों ने भी नहीं बचाया ,कोई आता -जाता तो तुम्हारी आवाज सुन ही सकता था।
कैसे बचाते ? इधर मैं ,कुएं से चिल्ला रही थी। मंदिर में भक्तों की भी भीड़ नहीं थी क्योंकि शाम के पश्चात ,मंदिर के कपाट बंद होने का समय हो जाता है। दूसरे देखो ! मंदिर यहाँ से कितनी दूर है ?डिकोस्टा को दिखाती है। आजकल कुएं रहे ही कहाँ है ?कोई इक्का -दुक्का कुआँ है ,उस पर भी लोग आना पसंद नहीं करते ,आते भी हैं तो किसी कार्यक्रम के सिलसिले में ,जैसे मेरी सास ने मुझे बतलाया था कि घुड़चढ़ी पर मेरे पति यहाँ आये थे। अब तो यहाँ कोई भी नहीं आता। कुएं की हालत देखो ! कितनी जर्जर हो गयी है ? जबसे लोगों को पता चला है कि यहाँ मेरी आत्मा रहती है ,तबसे अब ड़र के कारण ,कोई इधर नहीं आता।
हाँ ,ये तो है ,शुरू में जब मैंने भी देख था तो मैं भी डर गया था ,कहकर साथ ही डिकोस्टा मुस्कुरा दिया ताकि कामिनी को बुरा न लगे।
कामिनी समझ गयी ,अब ये मेरी टाँग खींच रहा है।
तभी डिकोस्टा को भी ऐसा लगा जैसे किसी ने कामिनी के सोचे हुए शब्द उसके कान में किसी ने कहा हो ,वो बोला -नहीं ,मैं नहीं खींच सकता।
कामिनी को लगा ,जैसे इसने मेरी बात सुन ली है ,बोली - क्या नहीं खींच सकता ?
तुम्हारी टाँग !
क्या तुमने मेरे मन की बात सुन ली ?
नहीं ,मुझे तो लगा ,जैसे किसी ने मेरे कान में कहा।
तब कामिनी समझ गयी और बोली -बाहर आ जाओ !
आप किसे बुला रही हैं ?
अपनी बेटी को !
क्या ??
हाँ मेरी बेटी !जो उस समय मेरे गर्भ में थी ,उसने भूतों की दुनिया में ही जन्म लिया ,आज वो मेरे साथ है ,चलो बाहर आओ !
डिकोस्टा ने देखा ,सात -आठ बरस की बड़ी प्यारी सी बच्ची ,उसके पीछे से निकलकर आई।
अच्छा तो ये शैतान है , जो मेरे कानों में आपके मन की बात कह रही थी।
हाँ ,क्योंकि जबसे ये पैदा हुई ,तभी से मेरे मन के विचार पढ़ लेती है।
ये तो ,बड़ी अच्छी बात है। तुम दोनों माँ -बेटी इस कुएं में रहती हो।
हाँ ,तब से मैं अपनी बेटी के साथ यहीं हूँ ,हमें कोई परेशानी नहीं ,आप कहाँ रहेंगे ?
पता नहीं ,जबसे इधर आया हूँ ,अभी तो इधर -उधर ही घूम रहा हूँ ,सोचता हूँ ,यहीं आस -पास रह जाऊँ ,तुम लोगों से भी जान -पहचान हो गयी है। इधर डिकोस्टा अपने रहने के स्थान को चुन रहा था ,उधर बच्चे सम्पूर्ण स्कूल का भृमण कर रहे थे किन्तु बड़ा अजीब स्कूल था ,उन्हें लग रहा था कि वे घूम रहे हैं ,दरअसल वो एक ही स्थान पर खड़े थे।सबसे पहले वे भूतों के उस पुस्तकालय में जाते हैं। वे उस पुस्तकालय में रखी रखीं पुस्तकें देखने लगे। अन्य बच्चे भी थे ,जो उड़कर उस पुस्तकालय की पुस्तकें ऊँची जगह से भी उतार लेते थे। रोहित बोला -दोस्तों !भूत बनने से एक लाभ तो ये ही हुआ कि अब हम उड़कर ,कितनी भी ऊंचाई से अपनी पसंद की कोई भी पुस्तक निकालकर पढ़ सकते हैं। तन्मय ये देख ,''भूतों का इतिहास ''ये किताब मुझे बड़ी दिलचस्प लग रही है। इसे मैं ले लेता हूँ , मैं भी तो जानू भूतों का केेसा इतिहास है ?
ये देखो !सबसे ताकतवर दामिनी चुड़ैल ,इसकी तस्वीर भी इस पुस्तक में है ,कहते हैं -इसका असली रूप आज तक किसी ने नहीं देखा क्योंकि वो जब चाहे ,जैसा चाहे अपना रूप बदल लेती थी और देखो इसकी तस्वीर ! कितनी सुंदर लग रही है ?निम्मी अफरोज को उस तस्वीर को दिखाते हुए बोली।
मुझे तो लगता है ,ये भी इसका असली रूप नहीं होगा ,टॉम बोला।
तुम्हें कैसे पता ?निम्मी ने पूछा।
अभी तो तुमने बताया ,इसका असली चेहरा आज तक किसी ने नहीं देखा ,तब ये भी तो इसका बदला हुआ रूप ही तो हो सकता है।
हाँ ,तुम्हारी बात में दम तो है। इसकी चुड़ैल की एक खास बात और है या थी ,ये अपनी शक्ति से इंसान को जानवर ,जानवर को कुछ भी बना सकती थी।
ये ताकत तो मैं भी प्राप्त करना चाहूंगा ,तन्मय बोला -यार...... ऐसी शक्तियां हों ,तो आदमी क्या कुछ नहीं कर सकता तन्मय जोश में बोला।
तुम शायद भूल रह हो ,तुम आदमी नहीं भूत हो भूत ! सूरज हँसते हुए बोला।
तुम तो मेरी ,इस तरह हंसी उडा रहे हो जैसे ,तुम इंसान हो ,तुम भी भूत ही हो ,तब उन्हें लगा जैसे दो नजरें उन्हें घूर रहीं हैं। उनकी आवाज सुनकर इस ''भूतिया पुस्तकालय ''के संरक्षक ने अपनी आंखें उन बच्चों पर नजर रखने के लिए भेज दीं ,उन नजरों को देखकर बच्चे डर गए ,तभी उन बच्चों को एक चेहरा दिखा और बोला -मेरी नजरें ,इसी तरह सभी पर नजर रखती हैं ,कहकर वो जोर -जोर से हीहीहीहीहीही करके हंसने लगा।

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