सुबोध ,प्रभा को कुंभर्क और शेेफाली की कहानी सुना रहा है ,कुंभर्क के माता -पिता औलाद न होने के कारण ,अत्यंत दुखी थे ,तभी किसी साधु बाबा ने उन्हें बताया -उनके जीवन में संतान सुख है ही नहीं। निराश ,दोनों पति -पत्नी अपनी उम्मीदों का त्याग कर ,अपना जीवनयापन कर रहे थे। तभी हिमाचल की पहाड़ियों से एक तेजस्वी बाबा आये और वो उन पति -पत्नी का चेहरा देखते ही उनकी इच्छा भांप गए और उनसे कहने लगे -इच्छाएं कभी समाप्त नहीं करनी चाहिए ,इच्छा ही नहीं होगी ,तब इच्छा कैसे पूर्ण होंगी ?तुम्हारी इस इच्छा को मैं पूर्ण कर सकता हूँ। तब उन तांत्रिक बाबा पर विश्वास कर एक बार फिर वो एक बच्चे की उम्मीदों में ,गोते खाने लगे।
तब उसने उनके घर में एक तांत्रिक क्रिया की और एक कुम्भ की मांग की। उसमें उसने पूजा की भस्म और उन दोनों के रक्त की कुछ बूंदें ड़ालकर उस कुम्भ को एक श्मशान के समीप एकांत में गढ़वा दिया और उसका मुँह थोड़ा ऊपर रखा ,ताकि दोनों पति -पत्नी अपने रक्त की कुछ बूंदें प्रतिदिन उस कुम्भ में डालें।
इससे क्या होगा ?प्रभा ने प्रश्न किया।
उन दोनों ने भी ,यही प्रश्न उस तांत्रिक से किया तब वो दुष्ट तांत्रिक बोला -तुम्हारे जीवन में संतान सुख नहीं है ,तब तुम्हारा पुत्र तुम्हारी कोख से न होकर ,तुम्हारे रक्त से बनेगा ,तुम दोनों के रक्त से ही ,उसको तन मिलेगा। वो बहुत ही सुंदर और मोहक होगा। उसमें लोगो को सम्मोहित करने की बला की क्षमता होगी और भी अन्य शक्तियों का मालिक होगा किन्तु तुम लोगों को बिना नागा किये ,अपने रक्त से उस कुम्भ को नौ माह तक भरना होगा। जैसे माँ कोख में अपने बच्चे को ,अपने खून से सींचती है उसी प्रकार तुम दोनों उस घड़े को अपने रक्त से सींचना। नौ माह पश्चात ,जब ये भर जाये तब इसे अच्छे से ढककर ,दबा देना।
इससे बच्चा कैसे होगा ?प्रभा ने प्रश्न किया।
उन लोगों ने भी यही प्रश्न उस तांत्रिक से किया तब वो बोला -नौ माह के पश्चात ,जब पूर्णिमा या अमावस्या आएगी तभी ये घड़ा अपने आप ही फूट जायेगा और उसमें से एक जीवन की उत्तपत्ती होगी। वही तुम दोनों की संतान होगी। तब तक मैं भी जाकर ,जप करता हूँ। उसके पति सोच रहे थे -भला बिना माँ के संतान कैसे उत्प्नन हो सकती है ?
तभी उस तांत्रिक की आवाज गुंजी -जैसे धरती का सीना चीरकर सीता का जन्म हुआ। इसके बाद उनके सभी प्रश्न समाप्त हो गए ,वो बोले -तब तक मैं भी यहाँ उपस्थित हो जाऊंगा।
दोनों पति -पत्नी बिना नागा किये एक उम्मीद से आंधी हो या तूफान या फिर बरसात अपने खून की कुछ बूँदे उस घड़े में डालकर आते ,अभी तीन -चार माह ही बीते थे उन्हें कमजोरी आने लगी। तब भी औलाद का मोह वो त्याग नहीं सके ,प्रतिदिन ऐसे ही जाते रहे ,उनकी मेहनत सफल रही। जब वो कुम्भ भर गया उन्होंने उसका मुँह बंद करके ढक दिया। उसके पंद्रह दिनों पश्चात ही पूर्णिमा की रात्रि थी। पूर्णिमा के आने से पहले ही वो तांत्रिक वहां पहुंच गया और बोला -ये तुम लोगों के लिए बहुत ही अच्छा है कि पूर्णिमा की रात्रि को उसका जन्म होगा। उसका तन पूर्णिमा के चाँद की तरह ही चमकेगा ,उसमें कुछ विशिष्ट शक्तियां होंगी ,जो समय के साथ ही बाहर आएँगी। तब तक मैं यहीं रहकर ,पूजा करूंगा।
उन दम्पत्ति ने ,उसके लिए एक कमरे में पूजा -पाठ के लिए इंतजाम करा दिया किन्तु उन्होंने देखा वो किसी भगवान की पूजा नहीं कर रहा था। वो अपनी कुछ तंत्र क्रियाएं कर रहा था। घर में पूजा के लिए भी उसने मना कर दिया। भगवान के बिना तो ,उन लोगों का दिन ही नहीं निकलता था ,वो तो दिन निकलते ही ,अपने प्रभु का स्मरण करते थे किन्तु अब उस तांत्रिक के कहने पर ,उन्होंने अपने भगवान की मूर्ति कुछ दिनों के लिए एक बंद कमरे में रख दी। तांत्रिक अपनी तंत्र क्रिया बड़े जोरों शोरों से कर रहा था। पूर्णिमा की रात्रि को जब चाँद बीच आकाश में चमक रहा था ,वे तीनों श्मशान के समीप उस कुम्भ के समीप गए और वो खोदकर निकाला। तांत्रिक ने उस कुम्भ को देखा और कुछ मंत्र पढ़े ,कुछ देर के लिए ही सही, चाँद बादलों में छिप गया ,तेज हवा चलने लगी ,लगा जैसे अभी तूफान आ जायेगा ,एकदम से मौसम बिगड़ गया। किन्तु उस तांत्रिक ने अपने मंत्र जारी रखे ,उसके कुछ देर पश्चात ही ,वो कुम्भ चटक गया जिसमें से एक बहुत ही सुंदर बालक मुस्कुरा रहा था। तभी एकाएक न जाने कैसे ? ईश्वर के आशीर्वाद की तरह ,चाँद चमकने लगा और उसका प्रकाश बच्चे पर पड़ गया। ये देखकर ,तांत्रिक बौखला गया।
कुछ देर तक वो ऊपर देखता रहा ,जैसे कुछ सही नहीं हुआ ,तब वो बोला -चलिए शीघ्र ही घर चलिए।
वास्तव में बच्चा बहुत ही सुंदर था ,उसके चेहरे से दृष्टि हट ही नहीं रही थी। दोनों पति -पत्नी अपनी संतान को देखकर अत्यंत प्रसन्न थे अपना रक्त बहाकर जो कमजोरी आ रही थी ,सब कमजोरी और थकान दूर हो गयी। घर आकर वो तांत्रिक अत्यंत खफा हुआ ,मेरे मना करने पर भी ,तुम लोगों ने अपनी पूजा नहीं छोड़ी।
नहीं ,ये आप कैसी बातें कर रहे हैं ?आप हमारे घर में देख लीजिये ,कहीं भी हमारे देव नहीं रखे हैं।
तब तांत्रिक अचम्भित और बिना विश्वास के उनकी तरफ देखता है और चला जाता है ,दोनों पति -पत्नी उसके व्यवहार से ,समझ नहीं पा रहे थे कि उसने ऐसा क्यों किया ,वो क्रोधित क्यों था ?अगले दिन सम्पूर्ण गांव में ये बात फैल गयी कि उनके यहाँ किसी बच्चे का आगमन हुआ है। जिस किसी ने भी पूछा ये चमत्कार कैसे हुआ ? उन्होंने उसी बाबा की कहानी सुनाई किन्तु ये क्रिया कैसे सम्पन्न हुई ? ये किसी को नहीं बताया क्योंकि बाबा ने किसी से भी ,कुछ भी बताने से ,इंकार किया था।
दोनों पति -पत्नी बाबा के इस तरह नाराज होकर चले जाने से दुःखी तो अवश्य थे किन्तु सोचा -बाबा लोग तो मनमौजी होते हैं ,क्रोध शांत होगा तो अपनी कृपा बरसाने फिर आ जायेंगे।
लोगों के कहने पर ,उस बालक के नामकरण संस्कार के लिए ,एक दिन निश्चित किया गया ,इसके लिए उन्हीं पंडित जी को बुलाया गया।

