प्रेम राधा है ,पूजा है ,आराधना है।
तपस्या है , सीमा है , भावना है।
इक उमंग है ,सकारात्मक सोच है।
उन्नति की राह है ,कल्पनाओं का अम्बार है।
छोटी सी हँसी , मुस्कुराहटों का आसार है।
माना कि, प्रेम के साथ ,विरह है ,वेदना है।
प्रेम न हो तो ,उदास मन, निराशा को ढोता है।
गहन अंधकार में ,अपने को खोता है।
प्रेम निश्छल ,निःस्वार्थ ,त्याग का साकार रूप है।
प्रेम प्रकाश है ,प्रेम बसंत है ,कोयल की कूक है।
सपनों की रुपहली ,धूप है ,भँवरे की गुंजन में है।
कृष्णा की बांसुरी की ,मधुर तान में है।
प्रेम राह दिखाता है ,मंजिल तक पहुंचाता है।
प्रेम कालिख नहीं , कृष्णा का पीतांबर है।
राधा की वेणी की महक है ,प्रेम !
सम्पूर्ण समर्पण में है ,''प्रेम !
नायिका के शृंगार में है ,प्रेम !उसके इंतजार में है।
आज प्रेम कहाँ है ?प्यार ,इश्क़ ,रोमांस बन गया है ।
स्वार्थ से परिपूरित अपनी इच्छाओं का दास बना है।
आंधी की तरह आता है ,तूफान की तरह जाता है।
