Jail [part 89]

सलमा पुलिस को देखकर घर में रहते हुए भी ,अपने बेटे से कहलवा देती है -अम्मी घर में नहीं हैं। सलमा की सास, घर में आकर पड़ौसी और उस पुलिसवाली दीप्ती को आड़े हाथों लेती है। उसके घर में ,उसकी बिना इजाजत के ,उसके घर में आने की ,उन लोगों की हिम्मत कैसे हुई ?उसे अपने परिवार और बहु पर पूर्ण विश्वास था कि उन्होंने कुछ भी गलत  नहीं किया होगा। वो बहु सलमा से थोड़ी नाराज तो थी ,वो बिना बताये ,घर से बाहर चली जाती है और आज भी देखो ! बच्चों को घर में अकेला छोड़कर ,बाहर घूमने निकल गयी। दीप्ती और पड़ोसी से निपटकर ,वो बच्चों से कहती है तुम्हारी अम्मी किधर गयी है ?कुछ कहकर गयी  है ,तब अबरार ख़ुलासा करता है - अम्मी तो घर में ही है ,अम्मी ने ही उनसे मना करने के लिए कहा था। 


इस बात से वो बहुत आहत होती हैं ,सोचती हैं -जब इसने कुछ किया ही नही ,तब इसके  छुपने का क्या कारण हो सकता है? याकूब !थकाहारा घर पर आता है ,वो पहले रिक्शा चलाता था किन्तु कुछ पैसे जुड़ने पर उसने एक ठेला ले लिया। अब वो' ठेलेवाला 'कहलाता है ,उसमें वो इधर -उधर सामान ढ़ोता है। इन दिनों में तो गर्मी भी बहुत  पड़ रही है। गर्मी और मेहनत ,थकाकर रख देती है। बहुत देर तक तो सलमा बाहर नहीं आई थी ,किन्तु जब अपनी सास की आवाज सुनी तो ,कबाड़खाने से बाहर आ गयी। उन्हें अपनी बहु पर क्रोध तो बहुत आ रहा था किन्तु उन्होने कुछ भी कहना बेहतर न समझा ,रात की रोटियों का समय हो गया अभी से घर में क्लेश कर दिया या हो गया तो रोटी भी न मिलेंगी। यही सब सोचकर  चुप रहीं वो चुपचाप याकूब के घर आने के इंतजार में थीं।  किन्तु जैसे ही , याकूब घर में घुसा ,तब वो कुछ कहतीं उससे पहले ही वो सलमा को लेकर ,अंदर वाले कमरे में जा घुसा। 

बच्चे और माँ बाहर बैठे देख रहे थे ,कि क्या हो रहा है ?या होने वाला है। अम्मी सोच रही थी -ऐसी क्या आग लगी है ,न ही मेरा ख़्याल न ही बच्चों का , सभी बाहर बैठे प्रतीक्षा में थे। तभी अंदर से पीटने की और कुछ  आवाज तेज होती सुनाई देती हैं। कुछ देर पश्चात ही, सिसकने की आवाज भी सुनाई देने लगती है। ये सिसकियाँ बच्चों सहित उनकी दादी ने भी सुनी ,उन्हें उन सिसकियों से कोई हमदर्दी नहीं थी। घर की बड़ी और अनुभवी होने के नाते ,वो जानती थीं , बहुरिया के लक्षण ठीक नहीं हैं ,कुछ न कुछ तो ये करती रहती है और बताती भी नहीं ,न जाने कहाँ जाती है ?क्या करती है ?कुछ समझ नहीं आता था। शायद ,आज याकूब को सब पता चल गया होगा। तभी स्मरण हुआ ,सुबह का भूखा -प्यासा न जाने ,किस काम में लग गया ? कम से कम आकर पहले रोटी  तो खा लेता ,उन्हें अपनी  बहु का दुःख तो नहीं वरन बेटे की भूख -प्यास ने अवश्य ही विचलित कर दिया। 

याकूब.... ओये याकूब..... अरे अंदर क्या कर रहा है ? रोटी तो खा लेता ,कहते हुए दरवाजा पीटने लगीं। बच्चे अभी भी डरे हुए बैठे थे ,वे इतना तो जान गए थे ,कि आज अम्मी को मार पड़ी है। उनके दरवाजा पीटने पर भी ,याकूब ने दरवाजा नहीं खोला। बात कुछ और ही है सोचते हुए ,वो दरवाजे से हट गयीं और बच्चों को भोजन परोसने लगीं। बच्चे चुपचाप रोटी खाने लगे घर में सात लोगों के होते हुए भी ,इतनी शांति थी ,जैसे कोई यहाँ रहता ही न हो ,सुईं भी गिर जाये तो उसकी आवाज सुनाई दे जाये। बच्चों की नजर अभी भी उसी दरवाजे की तरफ थी। 

कुछ देर में दरवाजा खुलता है ,क्रोधित याकूब बाहर आता है ,पहले तो अम्मी थोड़ा शांत रहीं उसे खाने की थाली देते हुए बोलीं -क्या हुआ ?जो आते ही इस पर टूट पड़ा ,इसने ऐसा क्या कर दिया ?

याकूब का दिल चाहा ,थाली को कहीं दूर फेंककर मारे ,उसकी तो जैसे भूख -प्यास ही मिट गयी थी किन्तु अम्मी के लिहाज़ के कारण कुछ न किया ,तब बोला -ये पुलिस की नजर में आ चुकी है ,इसकी  जगह -जगह तस्वीरें  चिपकी  हुई  हैं ,आपको पता है ,अम्मी ! यही  ''बच्चा चोर ''है। 

या अल्लाह !तू ये क्या कह रहा है ?

हाँ , मैं सही कह रहा हूँ ,जब मैं ,अपना ठेला लेकर बाजार गया ,इसकी तस्वीरें देखीं ,अनजान बन एक से पूछा भी -ये कौन है ?तब उसने बताया ,पुलिस को इस महिला की तलाश है और यही बच्चा चोर है। एक पुलिसवाली से बचकर भागी है उसी ने इस तस्वीर को बनवाया है। 

ओह !तभी कहूँ ,अपना पड़ोसी और वो पुलिसवाली हमारे घर में कैसे आ घुसे ?

कौन ? पड़ोसी !

अरे वही....... रेहाना का पति ! उसका बच्चा भी तो चोरी हुआ था। तभी जैसे कुछ याद आया और बोलीं - क्या इसने ही उसका बच्चा चुराया होगा ? महल्ले में किसी को भनक भी लग गयी तो दौड़ा -दौड़ा कर पीटेंगे ,हाय ,इसने पड़ोसी के बच्चे को भी  नहीं छोड़ा। यही सब सोचते हुए वो घबरा उठीं और तेज स्वर में बोलीं - -बताती क्यों नहीं ?तूने उन बच्चों का क्या किया ? कितने बच्चे चुराए ?

यही सब तो मैं ,इससे अंदर पूछ रहा था। 

तब इसने क्या बताया ?

 कह रही है ,सबके सब मार डाले। 

या खुदा..... ! इसने क्यों ? इतना क़हर बरसाया।

हमारे लिए ,इस परिवार के लिए !

किसके कहने पर ये सब किया ?

कोई तांत्रिक है ,उसी ने इसे फुसलाया कि ये छोटे बच्चों की बलि देगी तो हम अमीर हो जायेंगे। 

इसकी अक़्ल क्या घास चरने गयी है ?हमें बताया तक नहीं ,बलि देने से क्या कोई आज तक रईस हुआ है ?

तभी रोते  हुए सलमा दरवाजे तक आई और बोली -मेहनत से ही क्या हम अमीर हो गए ?ये सारा दिन ठेला चलाता है ,कौन सा रईस हो गया ?ईद पर भी ठीक से पहनने को कपड़े नहीं होते। 


तभी अम्मी ने पास पड़ी जूती सलमा की तरफ फ़ेंककर मारी ,हरामज़ादी !तहज़ीब भी भूल गयी ,अपने शौहर को ,कैसे बोल रही है ? गलतियां करे तू.... भुगतें हम !बच्चों से कहलवा दिया ,मैं नहीं हूँ ,कल को जब पुलिस तुझे दरवाजे से घसीटते हुए ले जाएगी। हमारी क्या इज्जत रह जाएगी ?तुझे  इज्जत -बेइज्जती में कोई फ़र्क महसूस होता है कि नहीं। गरीबी में ही सही ,कम से कम तन तो ढक ही रहा था ,फाके तो नहीं करने पड़े। जब जेल जाएगी ,दुनिया में बदनामी होगी ,तब तो हमारी इज्जत में बड़े ''चार चाँद लग ''जायेंगे। 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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