Asi bhi zindgi [part 88]

इंस्पेक्टर खन्ना ,प्रभा के घर उसे छोड़ने जाता है ,वहीं चाय पीने के साथ -साथ ,वो नीलिमा के विषय में भी बात करने के उद्देश्य से , प्रभा के साथ ,उसे घर छोड़ने के बहाने गया। नीलिमा भी उन्हें टरकाकर  या उनके प्रश्नों से विचलित होकर ,अपने घर आ जाती है। नीलिमा चम्पा को पसंद नहीं करती, किन्तु उसे फिर भी, अपने घर की नौकरानी बनाकर रखा हुआ है। उसे देखते ही ,उसे वो सभी बातें स्मरण हो जाती हैं ,जिनसे वो भागना चाहती है किन्तु इतना सब होने पर भी ,वो उसे नहीं हटाती। समझ नहीं आता ,नीलिमा में इतना धैर्य कहाँ से आया ? या उसका शातिर मन कुछ और सोचे बैठा है।



 

चम्पा का विवाह भी होने जा रहा था किन्तु नीलिमा ने उसको  भड़काया ,तुम इतनी सुंदर और ये एक शराबी..... ! सारा पैसा तो शराब में ही उड़ा देगा ,तुम्हें क्या खिलायेगा ?ये तुम्हारे खर्चे किस तरह उठा पायेगा। तब तुम्हे कमाने भेजेगा ,जब तुम्हें ही कमाकर खाना है ,तब विवाह के बंधन में क्यों बंधना ? चम्पा को भी उसकी बात जंच गयी और विवाह तोड़कर घर में ही रहने लगी। कुछ दिनों पश्चात ,नीलिमा ने ही उसे अपने घर काम पर बुला लिया। तब से वो नीलिमा के घर में ही ,नौकरानी बनकर रह रही है। माता -पिता को समय पर पैसे पहुंच जाते हैं ,उन्हें और क्या चाहिए ?उधर लड़के से भी कह दिया ,तू जिससे विवाह करने जा रहा है ,उसका चरित्र ठीक नहीं। नीलिमा ये सब क्यों कर रही है ? वो भी एक नौकरानी के साथ ! आखिर क्या चाहती है ?वो !

इंस्पेक्टर चाय का घूंट भरते हुए बोला -तुम्हें क्या लगता है ? यदि धीरेन्द्र ने आत्महत्या नहीं की ,तब किसने उसकी हत्या की होगी ? 

इसमें ,मैं क्या कह सकती हूँ ?

क्यों ,क्या तुम उपन्यास नहीं लिख रहीं ? उससे बातें भी करती हो ,उससे मिली हो। अब तक तुमने क्या जाना ?

ओह !तो जनाब अभी भी कानून की सेवा में जुटे हैं ,और बहाना लिया मेरी सेवा का और मुझसे ही सेवा करा रहे हैं ,कहकर नीलिमा हंसी। 

नहीं ,मैं कोई सेवा नहीं करा रहा ,किन्तु मैं जानना चाहता हूँ ,नीलिमा आख़िर है ,क्या चीज़ ?

खन्ना को गंभीर देखकर , प्रभा बोली -अभी तक मैंने जो जाना है ,उसका विवाह ,उसके पिता ने उसकी उम्र से  दस -पंद्रह साल बड़े लड़के से करवा दिया ताकि दहेज़ न देना पड़े। धीरेन्द्र पैसेवाला ,स्मार्ट , बहुत खर्चा करने वाला यानि उसे महंगी -महंगी चीजों  शौक था ,जो उसकी आमदनी से कहीं ज्यादा हो जाते थे ,इसी कारण वो कर्ज में भी दबा रहता था। दोस्तों से भी उधार मांगता ,उनसे उधार ,लेकर उन पर  ही लुटाता भी था।  नीलिमा ने उसी के कारण अपना , रहन -सहन बदला। पिता ने जैसे भी विवाह किया उसने उसे सहर्ष स्वीकार किया अपनी पढ़ाई भी जारी रखी किन्तु धीरेन्द्र की माँ को नीलिमा कभी पसंद नही आई। धीरेन्द्र के खर्चों को लेकर ,उसके माता -पिता उसे अक्सर टोकते रहते किन्तु धीरेन्द्र के व्यवहार में परिवर्तन न देख ,उसे अलग कर दिया। 

धीरेन्द्र खर्चीला तो था ही ,क्या धीरेन्द्र में कोई और भी अवगुण था ? जैसे शराब !हो सकता है ,पीता भी हो। या लड़कियों का शौक़ .....  

नहीं ,मुझे तो नहीं लगता कि वो लड़कियों का शौक़ रखता हो किन्तु नीलिमा जी ,ने भी इस विषय में कुछ नहीं बताया। हाँ ,उसकी कॉलिज में कोई' गर्ल फ्रेंड ' थी। बस इतना ही बताया। 

आप उनके विषय में ,बारीक़ी से विश्लेषण नहीं कर रहीं है ,विकास मुस्कुराकर प्रभा की तरफ देखते हुए कहता है। 

मैं कोई पुलिसवाली नहीं ,कि उनके जीवन में गहराई से घुस जाऊं ,जितना वो मुझे बताएंगी उतना ही तो पता होगा। यदि कोई अपने जीवन के विषय में पूर्ण सच्चाई बताना न चाहे तो ,मैं  जबरदस्ती उससे मारपीट करके तो नहीं पूछ सकती न... कहकर नीलिमा ने इंस्पेक्टर की तरफ मुस्कुराकर देखा। 

उसके व्यंग्य को समझते हुए , विकास बोला -लो ,भलाई का तो जमाना ही नहीं रहा ,एक तो इन मोहतरमा को हम केस की बारीकियों के विषय में समझा रहे हैं , तुम्हें तो हमारा एहसान मानना चाहिए ,मुफ़्त में ही शिक्षा दे रहे हैं।

 देखिए.... अभी प्रभा इतना ही कह पाई ,तभी उसकी मम्मी की आवाज आई -प्रभा कौन है ?किससे  बातें कर रही है ?

कोई नहीं ,मम्मी ! इंस्पेक्टर साहब है। तब तक वो अंदर आ चुकी थीं।विकास से धीरे से बोली -मम्मी हैं ,सो रहीं थीं ,मैंने उठाना ठीक नहीं समझा , अब उठ गयीं।  

इंस्पेक्टर साहब !वो घबराई से आवाज में बोलीं - क्या हुआ ?ये क्यों आये हैं ?

मम्मी घबराने की आवश्यकता नहीं ,तभी प्रभा को मजाक सूझा और बोली - ये जनता की सेवा के लिए है ,और यहाँ हमारी सेवा में ,उपस्थित हैं कहकर खिलखिलाकर हंस दी। इतनी देर में विकास उठकर उसकी मम्मी के पैर छू चुका था। प्रभा की मम्मी ने उसे घूरा ,जैसे कह रहीं हो ,इस तरह का मज़ाक ठीक नहीं। तब प्रभा बोली -मम्मी ,इनसे मिलिए ,ये मेरे दोस्त'' इंस्पेक्टर विकास खन्ना ''हैं। 

अच्छा -अच्छा ,इन्हें चाय पिलाई ,

हाँ ,मैंने इन्हें चाय नाश्ता भी करा  दिया। 

जहाँ तक मैं जानती हूँ ,तेरे सभी दोस्तों से मिल चुकी हूँ। ये तेरे दोस्त कब बने ?

तब प्रभा को लगा ,उसने जोश में न जाने, मम्मी से क्या कह गयी ?तब विकास की तरफ देखा ,वो भी मंद -मंद मुस्कुरा रहा था। मम्मी आज सुबह ही ,हम दोनों एक ही केस पर काम कर रहे हैं न.... 

तू कबसे ?पुलिसवालों से दोस्ती कर ,उनके साथ काम करने लगी ,कुछ भी न समझते हुए उन्होंने पूछा। 

अरे मम्मी ! जिस विषय पर मैं कहानी लिखना चाह रही हूँ ,उसी पर इनका एक केस चल  रहा है ,तब हम दोनों एक -दूसरे की सहायता कर सकेंगे। 

अच्छा ,खाना तो खाओगे ,घड़ी में समय देखते हुए बोलीं -  आंटीजी अब चलता हूँ ,अभी तक मैंने अपने थाने  में भी ,हाज़िरी नहीं लगाई ,कहकर वो उठ गया ,अच्छा दोस्त ! जो बातें मैंने बताईं हैं ,उन पर ध्यान देना ,कहकर वो मुस्कुराता हुआ चला गया। 

प्रभा को उसका इस तरह ,दोस्त कहकर जाना बहुत अच्छा लगा ,उसकी बातें सोचकर ,मुस्कुराने लगी ,उधर विकास का चेहरा भी मुस्कुराहट से भरा था।



आज नीलिमा की आँखों के आगे ,वो छवि तैरने लगी ,जब नीलिमा हॉस्पिटल से  घर आई थी। उसने देखा ,धीरेन्द्र का चेहरा कैसे दमक रहा है ? उसे लगा ,मेरे आने और अपना बेटा होने की प्रसन्नता उसके चेहरे से झलक रही है। कुछ दिनों तक तो वो इसी भ्र्म में रही किन्तु एक दिन जब वो अथर्व के लिए ,चम्पा को पुकार रही थी ,तब उसने देखा, चम्पा तो वहां थी ही नहीं ,उसने सोचा -बाथरूम में होगी ,यही सोचकर वो स्वयं दूध लाने के लिए ,रसोईघर की तरफ चल दी। तब उसे ,हॉल में से कुछ आवाज सी महसूस हुई ,वो उधर की तरफ बढ़ी ,वहां का दृश्य देखकर ,उसे चक्कर आ गया और वहीं बैठ गयी। 

उसने धीरेन्द्र और चम्पा को नग्न अवस्था में ,एक -दूसरे के आगोश में देखा ,जिसकी उसने स्वप्न में भी कल्पना  नहीं की थी।  धीरेन्द्र पर बहुत क्रोध आया ,छी.... एक नौकरानी के साथ ,इस तरह उसे बर्दाश्त नहीं हुआ। अगले ही दिन, वो अपने बच्चों को लेकर ,अपने पिता के घर पहुंच गयी। उसे तब भी अपने घरवालों से एक उम्मीद थी ,वो उसका साथ देंगे किन्तु चंद्रिका ने भी उसे समझाया। उसके बच्चों का  भविष्य इस घर में नहीं ,उसी घर में है ,यहाँ तो उसका अपना भविष्य भी न बन सका। तब नीलिमा ने बहुत मनन किया ,सही तो कह रहीं हैं ,उधर पापा का व्यवहार ,ऐसे में ,अपने बच्चों को लेकर वो कहाँ जाये ? उसे तो धीरेन्द्र के कर्मों के कारण उससे नफ़रत हो चली थी। उसके लिए ,मैंने क्या -क्या नहीं सहा ?इस उम्मीद से कम से कम वो मेरे साथ  तो है।  


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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