Asi bhi zindgi [ part 87]

नीलिमा अपनी  संस्था के दफ्तर में बैठी ,''इंस्पेक्टर  विकास खन्ना ''और ''प्रभा शर्मा ''के साथ बातें कर रही  थी। प्रभा शर्मा जो एक लेखिका है और वो नीलिमा के जीवन पर एक उपन्यास लिखना चाह रही थी किन्तु  नीलिमा की कहानी में ,कुछ बिंदुओं पर आकर वो अटक गयी। इसीलिए वो आज नीलिमा से बात करने के लिए आई थी किन्तु जब वो नीलिमा के दफ्तर में कदम रखती है। तब वो इंस्पेक्टर की मोटरसाइकिल देखकर ,वो बाहर ही ठहर जाती है ,किन्तु जब इंस्पेक्टर के शब्द प्रभा के कानों में पड़ते हैं ,तब प्रभा को लगता है ,इनकी बातचीत का सिलसिला भी मेरे प्रश्नों से जुड़ा हुआ है। इसलिए वो नीलिमा से पूछकर अंदर आती है। 


इंस्पेक्टर विकास खन्ना ,अपनी यूनिफॉर्म में बहुत ही जंच रहा था। प्रभा भी नीली जींस और जैकेट में थी वो जाकर उसके बगलवाली कुर्सी में बैठ जाती है। चाय पीते  हुए ,इंस्पेक्टर नीलिमा से प्रश्न पूछता है -क्या आपको कभी नहीं लगा ?कि आपके पति ने आत्महत्या नहीं वरन उनकी किसी ने हत्या की हो। 

नीलिमा दृढ़ता  से ,इंकार कर देती है ,उसने बस इतना बताया -मेरी बड़ी बहन चंद्रिका को भी ऐसा ही कुछ लगा था। 

तभी प्रभा भी ,यही प्रश्न दोेहराते हुए कहती है ,मेरे मन में भी यही सवाल था ,किन्तु नीलिमा दोनों को ही एक जबाब देती है -नहीं। वो जानती थी ,यदि वो अपना शक़ जाहिर करती है ,तब वो ही सवालों के घेरे में आ जाती है। वो लोग ,सबसे पहले उससे ही पूछेंगे -आपको किस पर शक़ है ?या फिर घर में कोई झगड़ा तो नहीं हुआ। आत्महत्या का क्या कारण हो सकता है ? इसी तरह के प्रश्नों से ,उसे परेशान किया जायेगा इसीलिए उसने कुछ भी कहने से इंकार कर दिया। तब वो बोली -इंस्पेक्टर साहब जो हो गया ,सो हो गया ,अब वो वापिस तो नहीं आएंगे। मेरी ज़िंदगी में भी जो होना था हो गया ,अब तो मैं ये चाहती हूँ ,अपने बच्चों के साथ आराम से ज़िंदगी बसर कर सकूं। मुझे माफ कीजिये !अब मुझे जाना होगा ,मुझे कुछ काम याद आ गया ,कहकर वो फुर्ती से जाने के लिए खड़ी हो जाती है। उसके इस तरह के अजीब बर्ताव से प्रभा और इंस्पेक्टर दोनों ही हतप्रभ रह जाते हैं। 

नीलिमा ,फिर मिलेंगे ,कहकर बाहर आ जाती है ,उसके पीछे इंस्पेक्टर विकास और प्रभा भी बाहर आ जाते हैं। आज इनका व्यवहार कुछ अजीब ही था ,अब तक तो बड़े प्रेम से ,मुझसे बातें करती थीं ,आज न जाने इन्हें क्या हो गया ?

प्रभा की बात सुनकर इंस्पेक्टर को थोड़ी हंसी सूझी और बोला -पुलिसवालों के सामने ,अच्छे -अच्छों की बोलती बंद हो जाती है , और अच्छे -अच्छों को काम स्मरण हो जाता है ,कहकर वो मुस्कुराया। विकास अपनी बाइक पकड़कर प्रभा के साथ के लिए पैदल ही चल रहा था। तब प्रभा से बोला -आप कहानी -उपन्यास ही लिखतीं हैं या और कुछ भी करतीं हैं। 

जी मैं ,लेखन के साथ -साथ ,एक स्कूल में पढाती  भी हूँ ,आप तो जानते ही हैं ,लेखन से पेट थोड़े ही भरता है ,कहकर वो हँस दी। 

संस्था के गेट से बाहर आते ही ,विकास बोला -यदि तुम्हें कोई ऐतराज़ न हो तो ,तुम्हें घर छोड़ दूँ।

जी नहीं ,आप कष्ट क्यों करते हैं ? मैं चली जाऊँगी। 

इसमें कष्ट की क्या बात है ? यदि आपका घर नजदीक ही हो तो ,मैं आपको छोड़ सकता हूँ। हम लोग तो हैं ही जनता की सेवा के लिए ,कहते हुए उसने प्रभा की तरफ देखा।

प्रभा मुस्कुराते हुए बोली - इसंपेक्टर साहब ,आप कानून के रखवाले हैं। 

हाँ..... किन्तु कानून भी तो जनता की सेवा के लिए  ,बनता है। हाँ ये बात अवश्य है ,जनता कानून को अपने घर में एक कप चाय न पिलाना चाहे ,तब भी हम जनता की सेवा के लिए तत्पर रहेंगे। 

चलिए ,कानून जी ,आप सेवा करिये और हमें हमारे घर तक छोड़ दीजिये ,कहते हुए ,प्रभा ,विकास की मोटरसाइकिल पर बैठ जाती है। पीछे बैठकर ,प्रभा कहती है -क्या मैं ,कानून से पूछ सकती हूँ ? कानून की शादी हो गयी। 

अजी ,क्या बात कर रहीं हैं ?यदि शादी हो गयी होती तो ,कानून को समय ही कहाँ होता ?फिर तो वो ''होम मिनिस्टर ''की सेवा में ,व्यस्त होता। 

अच्छा जी , इसी कारण  कानून को हमारी सेवा का ख्याल आया। 

उधर नीलिमा ,अपने घर गयी ,चम्पा से बोली - एक कप कॉफी बना दे। अथर्व कहाँ है ?

वो तो अंदर सो रहा है। 

ठीक है ,ये समझ नहीं आ रहा ,कौन, इंस्पेक्टर को बार -बार फोन कर रहा है ?वो कॉफी पीते हुए ,मन ही मन सोच रही थी।ये इंस्पेक्टर को इतने दिनों पश्चात कैसे लगा ? कि इस केस की तहक़ीकात करनी चाहिए। ये ''प्रभा शर्मा '' क्या सच में ही ,कोई लेखिका है ?या इंस्पेक्टर से मिली हुई तो नहीं। नहीं ,ऐसा कैसे हो सकता है ?ये तो शर्मा है ,वो खन्ना , दोनों आज ही तो मिले हैं ,ये मात्र एक संयोग हो सकता है। मैं भी न जाने क्या -क्या सोचने लगी ? इस तरह नीलिमा ने अपने मन को समझाया।

प्रभा के घर पहुंचकर , इंस्पेक्टर ने पहले तो उसके घर को देखा ,वो एक फ्लैट था ,वो अंदर तो नहीं गया बाहर ही बैठा था। उसका घर काफी साफ -सुथरा था ,बैठने के लिए एक सोफा ,सोफे की मेज के बीचों बीच एक फूलदान भी रखा था ,जिसमें नकली फूल सजे थे। एक तरफ कोने में दिवान भी पड़ा था ,जो खिड़की ठीक सामने था। उसी दिवान पर कुछ पुस्तकें भी नजर आ रही थीं। एक दफ़्ती में ,कॉपी के कागज भी लगे थे पास ही एक पैन भी रखा था विकास ने अंदाजा लगाया शायद ,प्रभा इसी दिवान पर बैठकर अपने कार्य करती होगी। तभी एक ट्रे में ,दो कप चाय और साथ में बिस्कुट ,नमकीन और ढोकला लेकर वो उपस्थित हुई। 


लीजिये ,चाय पीजिये ,विकास ने ट्रे की तरफ देखा और बोला -अरे ढोकला !किसने बनाया ?कहते हुए उसने ढोकले को एक अन्य छोटी प्लेट में लिया और खाने लगा। अरे वाह !ये तो बहुत स्वादिष्ट है ,कहाँ से मंगवाया ?

प्रभा मुस्कुराते हुए बोली - ये मैंने स्वयं अपने हाथों से बनाया है ,सुबह ही बनाया था। मैं इसे ला नहीं रही थी ,किन्तु मन नहीं माना  इसीलिए ले आई। 

मैं कुछ समझा नहीं ,ला नहीं रही थी ,क्यों ? क्या सारा ढोकला आप ही खा जाना चाहती थीं। कहकर विकास बड़े जोर से हंसा। 

अरे नहीं ,इस चाय के कारण ,ढोकले के साथ चाय का कोई मेल नहीं। 

कोई बात नहीं ,कहते हुए विकास ने ,चाय की प्याली उठा ली। आज बेमेल चीजें खा लेते हैं ,कहते हुए चाय पीने लगा।   

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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