नीलिमा के दफ्तर में , प्रभा और इंस्पेक्टर विकास भी बैठे हैं ,बाहर बच्चे, रंगों से होली खेल रहे हैं। अंदर तीनों कांजी का पानी पी रहे हैं। तभी चम्पा भी आ जाती है और कहती है -दीदी !अथर्व को भी ले आई और कल्पना भी आ गयी।
ठीक है , अथर्व को रंगों से दूर रखना , दूर से ही देखकर खुश हो जायेगा। बाहर बच्चों के साथ मजे करो !
चम्पा के जाने के पश्चात नीलिमा भी कांजी का पानी पीते हुए ,कहती है -ये तो बड़ा ही अच्छा बना है।
जी ,मेरी मम्मी कई दिनों पहले से इसकी तैयारी प्रारम्भ कर देती हैं ,ये हाजमेदार भी होता है।
इंस्पेक्टर साहब ,एक गिलास और देना , विकास ने उसका चेहरा देखा और मुस्कुराकर उसका गिलास भर दिया और बोले - कल मैं टीना से मिला था ,आप तो शायद ,उसे जानती ही हैं ,वो तो कह रही थी -कि आपको एक -दो बार ही देखा है। वो और धीरेन्द्र.....
नाम मत लो !उस कमीनी का ,इन दो औरतों ने ही ,मेरी ज़िंदगी नर्क बना दी।
प्रभा ,नीलिमा के एकाएक इस बदले व्यवहार से ड़र गयी। विकास ने हाथ के इशारे से उसे शांत रहने के लिए कहा।
एक तो टीना दूसरी ,कौन ?
तब तक नीलिमा की आँखें क्रोध से लाल हो चुकी थीं ,बोली -इंस्पेक्टर साहब !आप नहीं जानते ,आ..प.. उसे अच्छे से जा.न्ते हैं ,दूसरी वो ही चम्पा.... वो एकदम झटके से बोली।
नहीं ,नहीं वो आपकी ज़िंदगी कैसे नर्क बना सकती है ?वो तो एक ग़रीब नौकरानी है।
नौकरानी..... दाँत पीसते हुए बोली -वो तो मेरी सौत बनने जा रही थी ,उसने जैसे रहस्य खोला।
क्या...? प्रभा की आश्चर्य से आँखें खुली रह गयीं ,बोली -आप विस्तार से बतायेंगी !
तुम मेरी असल कहानी जानना चाहती हो !ये जो संस्था है ,मेरी हंसी है ,सब झूठ और बनावटी है। तुम नहीं जानती- मैं ,अकेली न जाने कितनी रातें रोइ हूँ ,कहते हुए ,उसकी आँखे नम हो गयीं। ये मेरी ज़िंदगी नहीं ,एक दर्द का सैलाब है ,जिसे मैं अपनी हंसी 'ही, ही ,ही ,ही ,के नीचे दबाकर रखती हूँ। हंसने का अभिनय करके दिखलाया। वो गिलास लेकर अपनी कुर्सी से उठी ,तुम जानती हो ,मैंने सिर्फ़ बाहरवीं पास की थी। मैं आगे बढ़ना और पढ़ना चाहती थी किन्तु जिसने पैदा किया- मेरा बाप !उसने बिना दहेज़ के मेरा विवाह ,मेरे से पंद्रह बरस बड़े धीरेन्द्र से कर दिया। पता नहीं ,उसने मेरे पैसे भी लिए हों ,वो सभ्य आदमी है कुछ भी कर सकता है। प्रभा की तरफ झुकते हुए बोली -तुम जानती हो ,कोठो पर सभ्य आदमी ही उसकी शान बढ़ाते हैं। रात के अंधेरे में किसी पिशाच की तरह निकलते हैं किसी की मजबूरी का जिस्म नोचने के लिए ,उजाले में शराफ़त का लबादा ओढ़ लेते हैं।
इंस्पेक्टर ने देखा ,वो अपने लक्ष्य से भटक रही है ,तब बोला -टीना और चम्पा तुम्हारी दुश्मन कैसे बनी ?
नीलिमा इंस्पेक्टर को देखकर मुस्कुराई ,फ़ीकी सी हंसी हंसकर बोली -चालाक हो !और मुस्कुराते हुए बोली -मैंने धीरेन्द्र को तन -मन से स्वीकार किया ,किन्तु उसकी माँ ने कभी मुझे बहु का सम्मान नहीं दिया ,मुझे नौकर बना दिया ,धीरेन्द्र भी पीता था उल्टियां करता था और मैं उन्हें साफ करती थी।मेरी मम्मी ने कहा था- बच्चे का मुँह देखेगा ,सुधर जायेगा किन्तु किस्मत का खेल देखो ! मेरे पहली बेटी हुई ,किन्तु उसने कुछ नहीं कहा क्योंकि मन में जो लिए बैठा था ,बुरा सा मुँह बनाते हुए बोली। नशा अब नीलिमा पर , पूरा असर दिखा रहा था ,तुम जानती हो ! ''ये ज़िंदगी ! एक भूल -भुलैया है ,तुम सारा जीवन भटकते रहोगे किन्तु इससे निकल नहीं पाओगे।'' जब अथर्व हुआ ,मैं खुश थी ,अब मैं धीरेन्द्र की मनोकामना पूर्ण कर सकूंगी।
ये मेरा शरीर ,अपने हाथ के इशारे से इशारा करके समझाती है ,शरीर नहीं ,उसके वासना पूर्ति की मशीन था और बच्चे बनते थे, जिन्हें मैं दवाई खा खाकर गिराती थी ,ये उन्हीं अपरिपक्व भ्रूण हत्याओं का परिणाम मेरे सामने आया अथर्व ,जो आज भी अबोध है ,मासूम है ,रोने लगती है। प्रभा ने उठकर उसे संभाला और कुर्सी पर बैठाया। तुम क्या समझती हो ?मैं कमजोर हूँ ,नहीं.... हाथ की अंगुली से मना करते हुए , मैं आज भी अपने बच्चों के लिए मजबूत पिलर हूँ। मैं अपने साथ -साथ ,अपने बच्चों को भी संभाल सकती हूँ। क्या तुम जानती हो !मैं कब टूटी ?जब मैंने अपने ही पति को ,पहली बार उस नौकरानी चम्पा के साथ ,उसकी बांहों में देखा। मैंने उसे हर रूप में स्वीकारा ,उसकी बुराइयां ,उसकी अच्छाइयां ,हँसते हुए ,अच्छाई ,उसमें थी ही कहाँ ?
तब आपने क्या किया ?
मैं चुपचाप अपने कमरे में आ गयी ,मैं क्या करती ,किसे दोष देती ? वो तो नौकरानी थी ,वो भी कम उम्र ,क्या उसे दोष देती ?जिसे किसी की नियत ने मैला कर दिया। जो ये भी नहीं जानती -कि क्या सही है ,क्या गलत ? मैं उसके बच्चे पैदा कर रही थी और वो...... छी...... घृणा से नीलिमा ने मुँह फेर लिया।
आप तो बता रहीं थीं, कि वो आपकी सौत बनना चाह रही थी।
कुछ देर वो इसी तरह बैठी रही ,प्रभा और विकास बोलने की प्रतीक्षा कर रहे थे।
एकाएक बोल उठी -गलती एक बार होती है ,अनजाने में या भूल से की गयी गलती की माफी है किन्तु उसी गलती को बार - बार दोहराया जाये ,वो भी जानबूझकर ,वो गलती नहीं रह जाती। मैंने चम्पा को रात में घर में , ठहरने के लिए मना कर दिया। तब वो दिन में ही..... सोच रहे थे शायद ,मैं अंधी हूँ ,कुछ समझती नहीं। मैंने अपने बच्चों की ख़ातिर अपने ''कलेजे पर पत्थर रख ''लिया। मैं ''ख़ून के घूंट ''पीती रही।
जानते हैं ,एक दिन मुझसे बोला -तुम पहले की तरह शृंगार करो ,दुल्हन की तरह सजो !मैंने सोचा -शायद उसे अक़्ल आ गयी। मैंने अपने आपको बहुत समझाया -और मैं उस रात उसकी दुल्हन बनी किन्तु मैं चम्पा को उसकी बाँहों में देखती रही, रोती रही। क्या तुम लोग जानना नहीं चाहोगे ?उसने मुझे उस रात दुल्हन क्यों बनाया था ?
क्यों ??
क्योंकि वो मेरे लिए ,मेरे पास नहीं आया था ,उसे तो मुझसे एक और बेटा चाहिए था। वो मतलबी था ,अपने मतलब से आया था। वो अथर्व की बिमारी के कारण परेशान था ,उसे अपना बेटा ही नहीं मान रहा था ,उसका बस चलता तो उसे और मेरी दोनों बेटियों को मार देता। एक दिन..... कहकर वो चुप हो गयी।
क्या हुआ ?
मैंने उसे चम्पा से ,औलाद मांगते देखा और वो भी ख़ुशी -ख़ुशी तैयार हो गयी ,उससे पहले वो मेरी जगह पाना चाहती थी।'' मेरे सीने में अंगारे धधक'' रहे थे। जिसको बच्ची समझा ,बेटी की तरह पाला ,वो मेरी सौत बनने के लिए ,तैयार थी। नए -नए मेकअप ,कपड़े ,सब मेरी आँखों के सामने हो रहा था। एक दिन मैंने धीरेन्द्र कहा -तुम अपने घरवालों से अपना हिस्सा मांग लो ,कम्पनी का मकान तो छोड़ना ही होगा। अब बच्चे भी बड़े हो रहे हैं। तब क्यों न एक अलग मकान बनवा लेते हैं ?,मैं चाहती थी ,-मेरे नाम मकान बन जाये ,तब अपने बच्चों को साथ लेकर रहूंगी ,मैं अपना भविष्य सुरक्षित करना चाहती थी। मैं जानती थी -मेरे बाप के घर में भी ,मेरे लिए जगह नहीं है। इन बच्चों को लेकर कहाँ जाऊँगी ?

