ये मेरा प्रेम -पत्र पढ़कर ,के तुम नाराज़ न होना ,
तुम मेरी ज़िंदगी हो ,के तुम मेरी बंदगी हो।
नमस्कार ,बहनों और दोस्तों ! जब भी प्रेम या' प्रेम -पत्र 'की बात आती है ,तब अनायास ही हमारे मुँह से ये गाना निकलने लगता है। चाहे किसी ने किसी को प्रेम -पत्र न भी दिया हो तब भी ,उसके चेहरे पर इसका नाम आते ही मुस्कुराहट आ ही जाती है।वो भी क्या जमाना था ? पत्र जो हमे अपनों की ख़ैर -ख़बर सुनाता था। जब पत्र घर में आता था। तब घर के सभी ,पहले तो ये ही पूछने लग जाते -किसका है ? गली में डाकिया भी दिख जाता ,तब भी पूछते क्या हमारे नाम कोई पत्र आया है ? हाँ,आया है ,इतना सुनते ही मन में ख़ुशी की लहर दौड़ जाती थी। वो एक पत्र ही ,सम्पूर्ण परिवार को कितनी प्रसन्नता दे जाता था ?
बचपन में पत्र लेखन ,सिखाया जाता था ,बड़ों के लिए सम्मानीय शब्द ,आदरणीय ,पूज्यनीय इत्यादि शब्द सिखाये जाते थे। उसके पश्चात आपका बेटा ,आज्ञाकारी ,दर्शनाभिलाषी ,अग्रज ,अनुज इत्यादि शब्दों के पश्चात अपने नाम पर पत्र की इति होती थी। सबसे पहले तो हमने ,प्रधानाचार्य जी को छुट्टी का प्रार्थना पत्र लिखना सीखा। कक्षा बढ़ने के साथ -साथ ,पत्रों का स्तर भी बढ़ा -पारिवारिक पत्र ,जो हम अपने माता -पिता और अन्य आदरणीय जनो को लिखते थे। दूसरे तरीक़े के पत्र -जिनमें किसी से कोई प्रार्थना करनी हो या किसी सरकारी विभाग में अपनी शिकायत दर्ज करनी हो।
पत्र केेसा भी हो ?एक लम्बे इंतजार का परिणाम वो पत्र होता था, जिससे मन में ख़ुशी की लहर दौड़ जाती थी किन्तु एक पत्र ऐसा था ,उसे कोई लिखवाना नहीं सिखाता, कैसे 'सम्बोधन' लिखना है ?उसके अंदर अपने भाव कैसे प्रकट करने हैं ?कोई नहीं बताता था कोई सहायता भी करता तो सभी हमउम्र ही होते और बालक बिना किसी अभ्यास के वो पत्र लिखना सीख जाता।
'' वो पत्र जो दिल की गहराइयों में से होता हुआ ,भावनाओं रूपी शब्दों को पिरोते हुए ,गुलाबी कागज़ पर ,मन की कलम से ,खून की स्याही से लिखा होता।'' कभी -कभी तो खुशबू में डूबा होता उसकी खुशबू से ही पता चल जाता कि 'प्रेम -पत्र 'है।
उसमें खुशबू की भी आवश्यकता नहीं थी ,दीदी ! कॉपी के पन्नों पर ही ,कांपते हाथों से लिखा जाता और उसे पहुंचाने के लिए ,जो मशक्क़त करनी पड़ती ,उससे ही पता चल जाता कि 'प्रेम -पत्र 'है। सभी कार्य चोरी -छिपे होते किन्तु जमाने को ख़बर हो ही जाती , जिसके नाम पत्र लिखा जाता ,उसकी तो सुनते ही हालत खराब हो जाती ,गाल लाल हो जाते ,रोम - रोम पुलकित हो उठता किन्तु शर्म के कारण नजरें न उठतीं। उस 'प्रेम -पत्र 'का ऐसा असर था तान्या बोली।
हाँ ये बात तो तान्या जी आपने सही कही ,ये ऐसा पत्र था जिसे कोई सिखाता नहीं था किन्तु जिसे प्यार हो जाता था वो अपने आप ही सीख़ जाता था।
अब मैं ये पूछती हूँ ,किस -किसको प्रेम -पत्र मिले ,किसको इंतजार रहता था ?सबके अंदाज निराले थे। ''कबूतर जा...... जा जा ''की तर्ज पर पत्र आते थे।
सच में ,आपने तो वे दिन स्मरण करा दिए ,जब मेरा इनसे विवाह तय हुआ।
मनीषा बात पूर्ण होने से पहले ही बोल उठी ,आपका तो रिश्ता तय हो गया था ,तब क्या 'प्रेम -पत्र 'आये होंगे ?
मेरी पूरी बात तो सुनिए ,जब हमारा रिश्ता तय हुआ ,तभी ये एक साल के लिए फ़ौज में ट्रेनिंग पर चले गए ,मैंने इन्हे जाते समय बस एक नजर देखा था। मेरी नजरें झुकी हुईं थी किन्तु मुझे महसूस हो रहा था ये भी मुझे कनखियों से देख रहे थे। उस समय तो माता -पिता रिश्ता तय कर देते ,विवाह से पहले तो देखने भी नहीं देते थे किन्तु मेरे भाभी -भइया ने मुझे चुपचाप इन्हे दिखला दिया था।
फिर क्या हुआ ?फिर तो सालभर की छुट्टी !
वही तो बता रही हूँ ,उस समय ये फोन तो थे नहीं ,घर में पत्र का आना या जाना सबको पता लग जाना। इनके जाने के लगभग एक माह पश्चात ,मेरे भइया एक पत्र लेकर आये और बोले -गुड्डी की चिट्ठी है ,मैं समझ नहीं पाई , मुझे कौन पत्र लिखेगा ? तभी मेरी भतीजी ने वो चिट्ठी ले ली। मैं वैसे भी बड़े भइया से कम ही बोलती थी। मेरी भतीजी उस समय पाँचवीं कक्षा में पढ़ रही थी ,उसने पत्र खोला और लगी जोर -जोर से पढ़ने ,प्रिय कहूँ !प्यारी गुड्डी कहूँ या फिर कोई प्यारा सा नाम दे दूँ। जबसे तुम्हें देखा है....... जब उसने ये लाइनें पढ़ीं मेरे दिल की धड़कने अचानक ही तेज़ हो गयीं उस समय भइया और भाभी भी वहीं खड़े थे। मेरी हालत खराब और मैं तेजी से भागी और उससे पत्र छिना और अंदर चल गयी। तुम समझ नहीं सकतीं उस समय मेरी धड़कनें कितनी तेज चल रहीं थीं ?जैसे कई किलोमीटर की दौड़ लगाकर आई हूँ।
फिर क्या हुआ ?भाभीजी !
फिर मैंने अपनी धड़कनों को संयत कर ,एक अलग जगह पर चुपचाप वो पत्र पढ़ा। वो मेरा पहला 'प्रेम -पत्र 'था।
क्या और भी पत्र आये या वो ही था ,आपने भी उन्हें जबाब दिया या नहीं।
दूसरी बार जब आया तो भइया ने सीधे मेरे हाथ में थमा दिया क्योंकि मेरी भतीजी इतनी शरारती थी ,वो सबको सुनाती। तीन -चार चिट्ठियों के पश्चात इन्होंने भी इसरार किया तुम भी तो मेरे लिए पत्र लिखो !मेरे तो हाथ -पांव फूल गए ,क्या लिखू ,कैसे लिखूँ ?तब मैंने अपनी ''हाई स्कूल ''की हिंदी की गाईड खोली। जिसमें ''पत्र लेखन ''था। उसमें मैंने अनेक पत्र देख डाले किन्तु ''प्रेम -पत्र ''लिखने का तरीक़ा एक भी नहीं था। कुछ समझ नहीं आया ,क्या लिखुँ ?
किसी सहेली से पूछ लेतीं।
मेरी वहां कोई सहेली भी नहीं थी ,सब गांव में थीं ,यहाँ तो भइया -भाभी के पास आई थी। बहुत परेशान होने के पश्चात ,तब मैंने पत्र लिखा जिसको आज भी इन्होंने संभालकर रखा है ,जब भी पढ़ते हैं तो हँसते हैं।
ऐसा क्या लिखा ?हमें भी तो बताइये।
गुड्डी जी ,का तो मुँह ही लाल हो गया और हमारी जिज्ञासा बढ़ गयी ऐसा क्या लिखा होगा ?बता भी दीजिये ,अब तो बरसों पुरानी बात हो गयी।
आदरणीय ,प्राणनाथ ! सुनकर सभी हँस दीं ,आदरणीय तो किताब से देखा वे मुझसे बड़े थे इसीलिए और प्राणनाथ मैंने हर रविवार को पिक्चर आती थी न उसमें सुना और लिख दिया कहकर झेंप गयीं।
ये बात तो सही है ,एक वो 'प्रेम -पत्र ''जिसमें प्रेमी समय निकालकर ,अपनी प्रेमिका के लिए अपने मन के उद्गार व्यक्त करता था ,उसके दिल से निकले शब्द होते थे जो उसके दिल की हालत बयाँ करते। वो जज़्बात किसी एक के लिए होते थे। कभी दोस्तों से पूछता ,कभी अपने आप सोचता ,उस एक विशेष के लिए जैसे उस पत्र में ज़माने की सभी ख़ुशियाँ समेट देना चाहता था। उसे हर जगह वो ही वो नजर आती और अपने उस अमूल्य प्रेम को घरवालों और दुनिया की नजरों से बचाकर रखता। कितने खूबसूरत लम्हें होते थे ?
जी आपने सही कहा -आजकल तो प्रेम के लिए किसी के पास समय ही नहीं ,दसवीं -बाहरवीं में किसी -किसी को ये बुखार चढ़ता भी है किन्तु शीघ्र ही उतर भी जाता है क्योंकि अब तो कॅरियर बनाने की चिंता जो सवार हो जाती है। किसी से इज़हार भी किया फ़ोन पर ही या तो बातें कर लीं या संदेश भेज दिया। कई लोगों की वे संवेदना किसी एक के लिए नहीं ,कई दोस्त होती हैं। सभी को पोस्ट कर देते हैं ,न ही उन शब्दों में , वो गहराई नजर आती है , न ही वो प्रेम झलकता है ,जो उस समय की टूटी -फूटी हिंदी में भी नजर आता था। उसी पत्र में अपना दिलदार नजर आता था। पत्र पढ़ने पर भी ,मन नहीं भरता था ,बार -बार ,छुप -छुपकर पढ़ने में मज़ा आता था।
मेरे लिए तो मिस्टर खान ने पूरी शायरी लिख डाली थी ,गुलाबी लैटर था।
उसके पश्चात क्या हुआ ?
क्या होना था ?एक वर्ष पश्चात ही हमारा निक़ाह हो गया ,मुँह बनाते हुए तमन्ना जी बोलीं -जबसे ये हमें और हम इन्हें झेल रहे हैं ,कहकर हँस दीं।
चलिए ,आज की चर्चा यहीं समाप्त करते हुए , वो भी क्या दिन थे ? जब घर में एक पत्र आता था ,सभी को खुश कर जाता था ,जिसमें लिखा होता था ,बबलु ,टीना ,गायत्री और डब्बू को मेरा प्यार देना ,वो प्यार दूसरों के जरिये ही सही ,दिल तक पहुंचता था। आदरणीय ताऊजी ,चाचा जी ,सभी को प्रणाम ,सभी को ये शब्द ख़ुशी दे जाते थे। वो भी क्या ज़माने थे ?चलिए। अगली चर्चा पर मिलते हैं ,आप इस चर्चा को पढ़कर बताइये ,क्या कोई पुरानी यादें स्मरण हों आई ?कैसा लगा ?बताइयेगा ,धन्यवाद !
