'मातृभाषा है ,ये..... मैंने ,
माँ के मुख से ,सुनी ज़बान
सम्मानित ,आदरणीय है ,
आज ही के दिन क्यूँ ?
दी जाती है ,इसे पहचान !
हम तो ,गर्व से कहते हैं -
हिंदी मेरी भाषा ,मेरी बोली है।
संस्कृत की ये.... हमजोली है।
जिसके माथे ,लगी है बिंदी ,
वही है ,मेरे देश की हिंदी !
फिर भी बना नहीं पाई ,
क्यों ?अपनी पहचान !
हिंदी बहुत ,रसीली है।
सम्पूर्णता से भरी ,
इसकी झोली है।
माँ 'की झलक दिखलाती है ,
इसे बोलते ,क्यों ?शर्म आती है।
