चोर -पुलिस का खेल निराला ,
अद्भुत और है ,सबसे न्यारा।
पकड़ा गया ,कभी न चोर.......
पुलिस पहुंची न ,कभी समय पर ,
इनकी मेहनत भी है, निराली ,
बाद में बजाते ,दोनों ताली।
दोनों ही हैं ,जैसे खेल खेलते ,
कभी हैं करते ,सांठ -गांठ !
कभी बनाते ,अपनी गांठ !
कुछ ऐसे जो टकरा जाते ,
फिर अपनी वो जान गंवाते ,
कुछ लालची.....
उनकी मेहनत यूँ ही गंवाते।
मेहनत पर है ,पानी फिराते।
लोभी फ़ितरत दोनों की ,
कभी चोर -पुलिस बन जाता ,
कभी पुलिस चोर नजर आती।
इस रेस में चोर ही जीतता..... ,
पुलिस बाद में ही आती।
