Andhvishvas

''विश्वास की अधिकता ही ''अन्धविश्वास ''की श्रेणी में आ जाता है।'' जिसमें एक व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति या किसी पुरानी परम्परा पर आँख मूंदकर विश्वास करने लग जाता है। तभी वो ''अन्धविश्वास की श्रेणी में आ जाता है। आजकल हम लोग अन्धविश्वास  को हमारी पुरानी परिपाटी और परम्परा से जोड़ देते हैं। पुराने समय में लोग कम पढ़े -लिखे होते थे। कोई भी थोड़ा भी ज्ञानवान व्यक्ति ,या फिर चालाक होता तो लोगों को किसी भी तरह से मूर्ख बना देता था। उस समय में कुछ तांत्रिक लोग भी होते थे ,जो इस अन्धविश्वास को बढ़ाने में सहायक हुए हैं। मानव इतना भी मूर्ख नहीं ,कि बिना किसी सबूत के ,बिना किसी तर्क के ,किसी भी बात पर विश्वास कर ले किन्तु उस समय में परिस्थितियां ऐसी हो जाती थीं कि व्यक्ति विश्वास करने पर मजबूर भी हो जाता था। 


कुछ परम्पराएं हमारे देश के बड़े -बुजुर्गों ने ,अपनी आने वाली पीढ़ी को उसका कारण न बताकर उन्हें परम्पराओं में शामिल कर दिया। जैसे कुछ पेड़ रात्रि में ''कार्बनडाइऑक्साइड ''छोड़ते हैं ,उसका ये कारण न बताकर ,उससे रात्रि में दूर रहने के लिए कहा ,रात्रि में पेड़ों पर भूत रहते हैं ताकि कोई रात्रि में पेड़ों के करीब न  जाये। इसी तरह से बड़ के पेड़ की पूजा की जाती है क्योंकि उससे प्रचुर मात्रा ''ऑक्सीजन ''मिलता है इसीलिए इसको कोई न काटे ,इसी कारण इस पेड़ की पूजा पर जोर दिया गया । ये कोई अन्धविश्वास नहीं ,इसके पीछे साइंस है। ऐसी बहुत सी चीजें है ,जो हमारी परम्पराओं में शामिल हैं ,उनके पीछे कोई न कोई कारण अवश्य होता है। आज की पीढ़ी पढ़ गयी है ,हर चीज के पीछे का तर्क ढूंढती है। 

ये बात सही है ,हम कोई भी कार्य कर रहे हैं ,तो क्यों कर रहे हैं हमें पता होना चाहिए ,किन्तु उस समय भी ,मानव ने कोई भी रीति -रिवाज़ या परम्परा निभाई है ,उस समय भी उसे वही सही लगा होगा। पहले से मानव की तार्किक प्रवृति रही है। उस समय की परिस्थितियों में उसे वही सही लगा होगा।समय के साथ कुछ चीजों को लोगों ने मानने से इंकार किया ,क्योंकि आज के समय को देखते हुए वो सही नहीं लगता। एक तरह से कहा जाये तो मानव परिस्थितियों के आधार पर अपनी सोच को बदल देता है। जब जैसी भी परिस्थिति उस पर हावी होती है ,वो उसी के अनुरूप कार्य करने लगता है। कुछ लोग आज भी अपनी पुरानी बातों को मानकर चलते हैं और उनके पास तर्क भी मिल ही पाते हैं। 

हमारे देश की परम्परा है ,पहली रोटी गाय के लिए निकालने की ,ये कोई अन्धविश्वास नहीं ,न ही परम्परा  किन्तु  गाय माता से हमारी श्रद्धा जुडी है ,कहते हें -कि गाय माता पवित्र है। उसके अंदर देवता निवास करते हैं। इस परम्परा को आगे बढ़ाते हुए ,कुछ लोगों के घरों में आज भी रोटी निकाली जाती है ,किन्तु कुछ बड़े शहर ऐसे होते हैं जहाँ गाय के दर्शन सुलभ नहीं ,तब वो उसके लिए रोटी निकालकर क्या करेगा ?जब गाय ही नहीं मिलेगी तो रोटी निकलने से क्या लाभ ? तब कह सकते हैं''' कि मानव परिस्थितियों का दास है। '' जैसी परिस्थिति आती है ,उसी के अनुरूप कार्य करने लगता है और तर्क भी अपने अनुसार बना ही लेता है। 

चलते समय कोई छींक दे तो रुक जाता है ,पानी पीकर निकलना चाहिए ,बिल्ली रास्ता काटे ,तब भी रुक जाता है ,टूटे शीशे में मुँह न देखना ,,आँख फड़कना ,अपना कोई लकी नंबर ,मंगलवार को सिर नहीं धोना ,घोड़े की नाल घर में होना। क्या उस समय के लोगों ने इसके पीछे के तर्क नहीं ढूंढे होंगे। अवश्य ही ढूंढे होंगे


,आज भी कुछ लोगों को जो उचित लगता है मानते हैं ,जो उचित  नहीं लगता नहीं मानते।किसी कार्य को करने से किसी व्यक्ति का काम बन गया उसके लिए सही ,जिसका काम नहीं बना उसके लिए गलत और बोलेगा कुछ नहीं होता इन चीजों से। मान लीजिये , किसी का काम नहीं चल रहा ,तब अपने कार्य को बढ़ाने के लिए ,वो अनेक उपाय करेगा क्या वो अन्धविश्वास नहीं ? किन्तु उस समय उससे उसका स्वार्थ सिद्ध हो रहा है ,उसकी मानसिक परेशानी को सुकून मिल रहा है ,तब वो करेगा और उसी को अपनी पीढ़ी को भी देना चाहेगा ,ताकि इसी तरह उन्नति होती रहे। कहते सब हैं कि अंधविश्वास में नहीं पड़ना चाहिए ,मेरा भी यही कहना है ,विश्वास करें ''अन्धविश्वास ''नहीं ,जिसमे व्यक्ति के पास न ही कोई तर्क हो या फिर सोचने -समझने की क्षमता ही समाप्त हो जाये। किन्तु  विश्वास भी कोई तर्क की चीज नहीं होती ,या तो विश्वास होता है या फिर नहीं होता। जैसे ईश्वर !इसमें कोई तर्क नहीं चलता ,सिर्फ विश्वास और श्रद्धा होती है। 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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