adivasi bnam adhunik

आदिवासी भी हम लोगों की तरह ही इंसान होते हैं ,उनका हम लोगों से रहन -सहन का तरीका अलग है क्योंकि वो अपने नियमों के आधार पर  ही रहना और जीना पसंद करते हैं। वो अपनी प्रकृति से अधिक प्रेम करते हैं ,उससे जुड़े रहना चाहते हैं ,इसी कारण आधुनिकता को अपनाना नहीं चाहते। आदि + वासी जोड़ने पर ''आदिवासी'' बनता है ,जो आदि काल से इसी तरह रह रहे हैं। जानकारी  में पता चलता है ,



हमारे पूर्वज भी, शायद कुछ इसी तरह रहे होंगे, किन्तु उन लोगों ने उस जीवन से आगे बढ़ना चाहा ,अपने जीवन में उन्नति चाही और वो आगे निकल गए किन्तु जो लोग अपनी प्रकृति से जुड़े रहे आगे बढ़ना नहीं चाहा वो ''मूलनिवासी ''बनकर रह गए। हर समाज के अपने नियम कायदे कानून होते हैं ,उनके भी हैं। वे लोग अपनी संस्कृति और सोच के आधार पर जीते हैं ,इनकी भी अनेक जनजातियाँ हैं। 

आधुनिकता की दौड़ में हम लोग, उनसे काफी आगे निकल आये किन्तु वो अपनी प्रकृति से जुड़े रहे ,उनके यहाँ भी स्त्री -पुरुष की संख्या में भी समानता होती है ,और कहीं -कहीं तो उन्हें समान अधिकार प्राप्त होते हैं। वहाँ कि महिलाओं को अपना पति चुनने का अधिकार होता है ,उसके पश्चात परिवार की  रजामंदी भी होती है। इस पर भी कई रस्में होती हैं , लड़की को अपना वर चुनने के लिए ,वो एक मेले का आयोजन करते हैं जिसमें वे अपना वर चुनती हैं। कहीं पर लड़का लड़की के  घर पर रहकर ,उसके परिवार को प्रसन्न करने का प्रयास करता है। इससे पता चलता है ,आज  के  आधुनिक मानसिकता लिए हम लोग आज भी ,बेटे को लड़की  के घर जाना,उसके परिवार की सेवा करना ,अच्छा नहीं समझते। 

कुछ जनजातियों में तो लड़का और लड़की विवाह से पूर्व ही साथ रहने लगते है और शारीरिक संबंध भी बना सकते हैं ,जैसे आजकल ''हमारे समाज में कुछ लोग ''लिव इन ''में रहने लगे हैं। किन्तु ये हमारे समाज की कोई परम्परा या संस्कृति नहीं है ,आज भी इस संबंध को चोरी -छुपे  अपनाते हैं।तब भी हम लोग उन्हें आदिवासी और पिछड़ा कहकर पुकारते हैं और अपने को आधुनिक विकासवादी मानते हैं जो अपने संस्कारों का भी मान नहीं रख सकते। वे लोग अपनी परम्परा को अपनाते हुए ,वही परम्परावादी वस्त्र और आभूषण पहनते हैं। अपने अंगों पर चित्रकारी भी करते हैं ,जैसा आजकल की हमारी युवा पीढ़ी भी फैशन के रूप में हाथ -पैरों पर गोदने गुदवाती है ,नाभि ,कूल्हे ,सीने पर भी, फिर भी वो हमसे पिछड़े मान जाते हैं। अपने अधिकार की लड़ाई भी  लड़ते हैं। जैसे -बिरसा मुंडा ,इसका एक उदाहरण है।

 


महिलाओं की स्थिति ,लगभग एक समान ही होती है ,फिर चाहे वो आधुनिक कहलाने वाले लोग हों या फिर आदिवासी महिलाएं। पुरुषों की अपेक्षा शिक्षित महिलाओं की दर कम है ,घर में ही रहकर, वो चटाई बुनना जैसे कार्य करके अपने पति की आर्थिक सहायता करती हैं ,तब भी उन्हें वो सम्मान नहीं मिल पाता है। अपने अधिकार के लिए, हर स्थान पर महिलाओं को संघर्ष करना  ही पड़ता है ,आधुनिक कहे जाने वाले समाज में , महिलाओं की स्थिति में थोड़ा सुधार हुआ है ,किन्तु अभी भी स्थिति ज्यादा सुधरी नहीं है ,इसी प्रकार आदिवासी महिलाएं ज्यादा शिक्षित नहीं है। जिनके सुधार के लिए कई कानून भी बनाये गए हैं।इसकी स्थिति में सुधार के प्रयास भी किये जा रहे हैं। कहते हैं ,न.... 'हीरा तो कोयले  की खान में से ही निकलता है ',इसी प्रकार जिसमें भी काबिलियत होगी ,कुछ करने का जज्बा होगा ,वो तो उभर कर आएगा ही, इसका एक उदाहरण  हमारे देश की दूसरी महिला राष्ट्रपति ''द्रोपदी मुर्मू '' जी हैं ,जो एक आदिवासी परिवार से ही हैं। इससे पता चलता है ,महिला कहीं भी और कैसी भी स्थिति में हो ?,वो परेशानियों के चलते और मजबूत बनती है ,जिसमें कुछ कर  गुजरने का जज़्बा हो तो नारी आदिवासी हो या फिर आधुनिक समाज से ,अपने को साबित करने के लिए संघर्ष तो करना ही पड़ता है। बस आवश्यकता है ,एक पहल करने की। 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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