Patra

वो पत्र !जो कभी ,

डाक से नहीं आया। 

जब भी आया ,

दिल धड़काया ,

आते ही मन को ,

बहुत लुभाया।

 


पत्र आता ,चोरी से ,चुपके से ,

आया नहीं, किसी डाक से ,

न जाने कब ,किसके हाथ से ?

कहीं कोई देख न ले ,

घबराये से जज़्बात थे। 

डर लगता था ,उसे देखने से ,

पत्र पढ़ा ,तो जाना..... 

वो मेरा ही 'प्रेम पत्र ' था। 

पढ़ते ही ,गाल सुर्ख़ गुलाबी हुए ,

 हया से हम ,पानी -पानी हुए। 

न जाने किसने ?अपने..... 

 जज्बातों को उड़ेला था।  

पत्र !पढ़ने से पहले ही ,

दिल बल्लियों उछला था। 

 किसी ने देखा तो नहीं ,

ड़र बहुत लगता था। 

न जाने कौन ?

आशिक़ निहारता था। 

चुपके -चुपके से बिना ,

नाम वाला पत्र भिजवाता था।

अच्छा भी लगता था ,

कोई तो है ,जो हमसे छुप -छुपकर,

प्रीत की रीत निभाता था।  

इतनी ही हिम्मत है ,

सामने नहीं आता था। 

सोचकर ही, उसकी हरकतों पर ,

कभी -कभी बहुत क्रोध आता था।

बात पत्रों तक ही रह गयी ,

पापा की बदली...... 

 दूसरे शहर में हो गयी।  

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

Post a Comment (0)
Previous Post Next Post