वो पत्र !जो कभी ,
डाक से नहीं आया।
जब भी आया ,
दिल धड़काया ,
आते ही मन को ,
बहुत लुभाया।
पत्र आता ,चोरी से ,चुपके से ,
आया नहीं, किसी डाक से ,
न जाने कब ,किसके हाथ से ?
कहीं कोई देख न ले ,
घबराये से जज़्बात थे।
डर लगता था ,उसे देखने से ,
पत्र पढ़ा ,तो जाना.....
वो मेरा ही 'प्रेम पत्र ' था।
पढ़ते ही ,गाल सुर्ख़ गुलाबी हुए ,
हया से हम ,पानी -पानी हुए।
न जाने किसने ?अपने.....
जज्बातों को उड़ेला था।
पत्र !पढ़ने से पहले ही ,
दिल बल्लियों उछला था।
किसी ने देखा तो नहीं ,
ड़र बहुत लगता था।
न जाने कौन ?
आशिक़ निहारता था।
चुपके -चुपके से बिना ,
नाम वाला पत्र भिजवाता था।
अच्छा भी लगता था ,
कोई तो है ,जो हमसे छुप -छुपकर,
प्रीत की रीत निभाता था।
इतनी ही हिम्मत है ,
सामने नहीं आता था।
सोचकर ही, उसकी हरकतों पर ,
कभी -कभी बहुत क्रोध आता था।
बात पत्रों तक ही रह गयी ,
पापा की बदली......
दूसरे शहर में हो गयी।
