ये जंगल भी अजीब ही दुनिया है ,इस दुनिया में होते हुए भी, दुनिया से अलग लगता है। इस स्थान पर आकर लग रहा है ,जैसे किसी अन्य दुनिया या फिर जिस दुनिया में हम रहते हैं उस दुनिया से अलग ही लग रहा है किन्तु यहाँ भी हमारी दुनिया के लोगों ने आकर अपना आधिपत्य जमा लिया। तन्मय ! एक बात बता ,ये बात समझ नहीं आई ,यार..... इस मनु को यहाँ के विषय में ,इतनी सब जानकारी कैसे है ? वो कहती है, ''इससे पहले तो वो कभी इस डगर आई ही नहीं'।
हाँ ,ये बात तो मेरे मन में भी आई ,जबकि श्याम तो इसके आस -पास बचपन से ही रहा है किन्तु वो तो कभी इधर आकर फटका ही नहीं ,न ही कभी इधर आया। मुझे तो लगता है ,मनु भी यहाँ हमारे संग पहली बार ही आई है फिर उसे मंदिर के पीछे का वो दरवाजा ,वो सुरंग कैसे पता है ? रोहित एक बात बता ?ऐसा कैसे हो सकता है कि कोई उस स्थान पर आया ही न हो और उसे वहां की चीजों को देखकर ,उनके विषय में पहले से ही जानकारी हो जाती है। ऐसा कैसे हो सकता है ?
जब तो वो बता रही थी कि श्याम के दादाजी ने कोई कहानी उसे सुनाई थी कहीं उसने ये सब अपनी कल्पना तो नहीं कर ली।
यार..... कोई कल्पना भी करेगा तो क्या ?उसे मंदिर के पीछे का रास्ता ,उसे खोलने का तरीका ,ये सब पहले से ही कैसे मालूम हो सकता है ?और वो तो तू भूल गया ,जब उसने हमें बताया था ,कि उन सीढ़ियों से हम नीचे जा सकते हैं। ये उसे कैसे मालूम ? कि उधर सीढियाँ हैं।
सो तो है ,चल तो रहे ही हैं ,पूछ भी लेंगे।
कीर्ति ,उन डॉक्टर्स के पीछे ही बाहर निकली ,वो उन मुर्दों में इतनी देर कैसे रही ?वही जानती है ,किन्तु अब तो कोई दुविधा ही नहीं रही और वो अपने मित्रों से मिलने के लिए ,उस कमरे से बाहर आ गयी। किन्तु जिस स्थान पर वो खड़ी थी ,वो उसे नहीं मालूम ,कि किधर जाना है ? वो डॉक्टर्स भी पता नहीं ,इतनी जल्दी कहाँ गायब हो गए ? एक बड़ी सी गैलरी दिख रही थी ,दूसरा रास्ता खुला था ,तीसरा रास्ता कुछ देर सीधा दिखने के बाद ,उसमें मोड़ आ गया था। वो असमंजस में खड़ी कुछ देर सोचती रही। फिर सोचा जो होगा ,देखा जायेगा ,सोचकर पूर्व दिशा की और उसने अपने कदम बढ़ाये। तभी उसके सामने एक विशाल सर्प आ गया। उसे देखकर वो बुरी तरह ड़र गयी और उस सर्प को देखकर उसकी चीख़ निकली।
चीख़ इतनी तेज थी ,सर्प तो वहाँ से चला गया , किन्तु वहीं एक दीवार रूपी दरवाजा खुला और दो लोग बाहर आये।उसने देखा , यहाँ जो भी निर्माण हो रहा है ,बड़े ही आधुनिक तरीक़े से हो रहा है। दरवाज़े भी इस तरह बने हैं ,दिवार और दरवाज़े का अंतर् पता ही नहीं चल रहा। कोई भी अनजान ,व्यक्ति इधर आया तो भूल -भुलैया सी, इस जगह में तो खो ही जायेगा। वे दोनों व्यक्ति किसी सैनिक की तरह लग रहे थे ,उनके हाथ में बड़ी -बड़ी बंदूकें थीं।हो सकता है,'सुरक्षा गार्ड्स ' हों कीर्ति ने मन ही मन अंदाजा लगाया जिन्हें देखकर कीर्ति और भी ज्यादा डर गयी और उसने आव देखा न ताव। जिस भी दिशा में उसे रास्ता खुला मिला ,उधर ही दौड़ लगा दी।
सुनो ...... पीछे से एक आवाज आई किन्तु कीर्ति भागे जा रही थी। वो किसी भी सूरत में उनके हाथ लगना नहीं चाहती थी। उसने पीछे मुड़कर देखा ,वो अभी भी उसके पीछे थे। तभी उसने एक दीवार में दरवाजे का अंदाजा लगाया और उसने उसे धक्का दिया और वो खुल गया और वो शीघ्रता से उसके अंदर घुस गयी। दरवाजे के पीछे खड़े होकर ,तब उसने गहरी साँस ली। ये तो अच्छा हुआ ,उसने उन लोगों को ही इस तरह निकलते देख लिया था ,तभी उसने भी इसी तरह उस स्थान को दरवाजा समझ धक्का दिया और अब वो सुरक्षित है ,आश्वस्त होकर जब उसने अपनी आखें खोली तो......
एक गंजा बड़ी -बड़ी आँखों वाला ,मोटी नाक का व्यक्ति उसे घूर रहा था। कीर्ति ने अपने मुख पर हाथ रख लिया ताकि चीख़ न निकले। उस आदमी को देखने के पश्चात ,उसने कमरे में चारों और नजर दौड़ाई ,वहां खून ही खून था। कीर्ति की आँखें फटी की फटी रह गईं ,इतना सारा खून उसने पहली बार देखा था। वो उस कमरे में ,अपनी जान उन लोगों से बचाने आई थी किन्तु अब लगता है ,यहाँ तो उसे और भी खतरा है ,सोचकर वो बाहर की तरफ भागी। वो व्यक्ति उसे देखकर डरावनी सी हंसी हँसा। शायद वो जानता था कि ये कितनी दूर तक भाग सकती है ?उसने उठने का कष्ट भी नहीं किया।
उस कमरे से बाहर निकलते ही ,वो दोनों सिपाही उसे दिख गए। एक तो लगभग उसके क़रीब आ गया। अब कीर्ति के पास कोई चारा नहीं था।
उसने पूछा -तुम कौन हो ? क्यों भाग रही हो ?
कीर्ति घबराती सी आवाज में बोली -पता नहीं ,मैं यहाँ कैसे आ गयी ? अब मुझे बाहर जाने का कोई रास्ता नहीं मिल रहा। उन दोनों ने एक - दूसरे को देखा और इशारों ही इशारों में एक -दूसरे को समझाया।
तब एक ने कहा -चलो ! मैं तुम्हें छोड़ आता हूँ। कहकर वो एक दिशा में चलने लगा कीर्ति ने उस दूसरे व्यक्ति को देखा किन्तु उसने अपनी नजरें नीची कर लीं। अब कोई उम्मीद न देख ,वो उसके पीछे चल दी।
कीर्ति को लगा ,इस आदमी की नियत ठीक नहीं है ,वो मन ही मन सोच रही थी -क्या ?आज सारी मुसीबतें मेरे लिए ही हैं। पहले उस दीवार के पीछे फंसना ,छिपकलियों से बचकर भागी तो उन मुर्दों -कंकालों में आ गिरी और अब यहाँ ,पता नहीं ,ये मुझे कहाँ ले जाने वाला है ?यदि इसने मेरे साथ कुछ भी ऐसी -वैसी हरकत की तो मैं भी इसे मज़ा चखा दूंगी। मेरे ये सभी दोस्त न जाने कहाँ चले गए ?कोई भी ,कहीं नहीं दिख रहा उसने चारों ओर नजर दौड़ाते हुए सोचा। कहीं ,उन्होंने मुझे मरा तो नहीं समझ लिया। वो ये नहीं जानते ,मैं ही उनके लिए धांसू ख़बर लाऊंगी किन्तु वो मिले तो सही। उधर मनु और श्याम छुपते -छुपाते कई गलियारों को पार कर गए किन्तु उन्हें कहीं भी कीर्ति नहीं दिखी।

