मनु मंदिर के अंदर तहखाने में चली जाती है ,जहाँ उसकी मुलाक़ात उसके पूर्वजन्म के माता -पिता से होती है ,जो उसके जन्म के विषय में बताते हैं और ये भी बताते हैं कि वो तांत्रिक के चक्रव्यूह से अभी भी बची है या नहीं। इससे पहले जन्म में वो एक रियासत की राजकुमारी के रूप में जन्म लेती है ,जिसमें वो तांत्रिक अभी भी उसकी प्रतीक्षा में है और वो अपनी शक्तियों के दम पर ,उसका हम उम्र बन जाता है। किन्तु उसको ये भी पता चल जाता है कि राजकुमारी को वो छू भी नहीं सकता क्योंकि उस राजकुमारी के हाथ में पहले से ही ''सुरक्षा कवच ''बंधा हुआ था।
जब राजकुमारी के पिता महाराज को इस बात का पता चलता है कि कोई लड़का हमारी बेटी का दोस्त है ,तब वो उससे मिलना चाहते हैं। राजकुमारी ने पारस को अपने जन्मदिन पर निमंत्रण भी दिया किन्तु वो नहीं आया। राजकुमारी ने, उदास मन से अपने जन्मदिन मनाया ,दिन भर उसकी प्रतीक्षा करती रही।
शाम को ,जब सभी मेहमान चले गए ,तब अचानक पारस उसके सामने आ गया।वो भी उसके कमरे में ,ऐसा कैसे हो सकता है ?तुम्हें किसी ने रोका नहीं ,हैरान होते हुए चंद्रिका ने पूछा।तभी उसे स्मरण हुआ कि वो उसके जन्मदिन पर ,बुलाने पर भी नहीं आया।तब मुँह फुलाते हुए बोली - अब यहां क्या करने आये हो ?जाओ ! मैं तुमसे बात नहीं करती।
मेरी बात तो सुनो ! मैं तुम्हारे लिए कोई कीमती उपहार नहीं ला सकता था ,तब राजा साहब के और अन्य मेहमानों के सामने ,तुम्हारा कितना अपमान होता ? पारस ने उसे समझाते हुए कहा ,वो चाहता तो ,एक से एक कीमती वस्तु उसके चरणों में रख सकता था किन्तु उसने राजकुमारी के सामने अपने को ग़रीब घर से बताया था। जिसके कारण ही ,चंद्रिका को उससे सहानुभूति हुई थी।
नहीं ,हमने पिताजी महाराज ,को पहले ही सब बता दिया था ,इसी कारण वो तुमसे मिलना चाहते थे।
नहीं ,मुझे किसी की भी सहानुभूति की आवश्यकता नहीं ,मैं पहले कुछ लायक़ बन जाऊँ , तभी पिताजी महाराज से मिलूँगा। ये बातें सुनकर चंद्रिका को अच्छा लगा। जब पारस को लगा राजकुमारी उसकी बातों से प्रभावित हुई है ,तब उसने अपना अगला तीर छोड़ा और बोला -क्या तुम मुझे पसंद करती हो ?
चंद्रिका शरमा कर बोली -ये भी कोई कहने की बात है ,तभी तो तुम्हारे साथ खेलती हूँ ,तुम मेरे दोस्त हो।
नहीं ,हम दोस्त तो हैं ही ,क्या तुम मुझ पर पूर्ण विश्वास करती हो ?
ये क्या बात हुई ?विश्वास करती हूँ।
मैं एक अलग बात कहना चाहता हूँ।
ओफ्फो..... कुछ कहोगे भी ,या फिर मुझसे ऐसे ही प्रश्न पूछते रहोगे।
तुम तो नाराज हो रही हो ,अभी मैं जाता हूँ ,कहीं कोई हमें देख न ले ,कहकर वो चलने का उपक्रम करता है क्योंकि वो जानता है ,चंद्रिका उससे बात पूछने के लिए उत्सुक होगी।
तभी चंद्रिका ने उसे रोका -सुनो ! तुम इस तरह नहीं जा सकते ,जो भी कहना चाहते हो ,खुलकर कहो !
नहीं आप नाराज़ होंगी ,हो सकता है ,अपने पिताजी महाराज से कहकर मुझे बंदी भी बना लें।
अब तो राजकुमारी परेशान हो उठी ,ऐसी क्या बात हो सकती है ?जिसको कहने में ये इतना हिचक रहा है।
नहीं ,तुम कहो !जो भी कहना चाहते हो।
एक बार फिर से सोच -समझ लीजिये ,राजकुमारी जी !
हाँ -हाँ कहो !
आप और मैं दोनों अच्छे मित्र हैं।
हाँ..... इसमें नई बात क्या है ?
आप मुझे बीच में टोकिये नहीं ,कहते हुए ,'उसने राजकुमारी से ,इशारे से ,अपने मुँह पर अंगुली रखने के लिए कहा और अपनी बात जारी रखते हुए बोला - अब तो आप सोलह बरस की हो गयीं हैं ,यानि कि आपकी ब्याह की उम्र हो गयी है। मुझे भी आप बहुत अच्छी लगती हैं ,क्यों न हम दोनों....... बात को बीच में ही रोककर बोला -हम दोनों दोस्त भी हैं ,[राजकुमारी ने मुँह पर अंगुली रखे -रखे ही ,हाँ में गर्दन हिलाई ]और एक -दूसरे पर विश्वास भी करते हैं। तब उसने चंद्रिका को नजरें नीची करते हुए देखा और बोला -मुझे लगता है ,मुझे किसी से प्रेम हो गया है।
अब तो चंद्रिका से रुका ही नहीं गया ,वो लगभग चीखते हुए बोली -क्या..... ??
वो उसका मुँह बंद कर सकता था किन्तु उसके हाथ में बंधे तावीज़ की जलन ,वो एक बार झेल चुका था। वो चाहकर भी उसका चिल्लाना रोक न सका वरन स्वयं कहीं छिप गया। तभी एक दासी अंदर आई ,क्या हुआ ?राजकुमारी जी ! तब चंद्रिका को अपनी गलती का एहसास हुआ कि अचानक चीखकर उसने कितनी बड़ी गलती कर दी ? तब उसने अपने चारों ओर देखा। पारस वहाँ नहीं था।
कुछ नहीं ,वो हम ऐसे ही ,किसी कीड़े को देखकर ड़र गए।
कहाँ है ?
वो उधर खिड़की से चला गया , अब तुम जा सकती हो !
जी.... वो तो चली गयी किन्तु चंद्रिका पारस को खोजने लगी वो कुछ कहना चाहता था किन्तु हमने चीखकर सब गड़बड़ कर दी।
पारस भी राजकुमारी से बात करने का इच्छुक था किन्तु चंद्रिका की तड़प देखकर ,उसे अच्छा लगा कि उसका कार्य शीघ्र ही पूर्ण होगा ,जो वो चाहता है ,वो होकर रहेगा ,यही सोचकर वो चला गया।

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