Bachpan ke dost

बचपन वो सीधा -साधा ,
भोला -भाला नजर आता है। 
न कोई अपना ,न ही पराया ,
कुछ समझ नहीं आता है। 
न कोई छल ,न ही कपट हो,
 भी तो पहचान कहाँ पाता है ?
अपना ही निर्मल मन ,
सब कुछ निश्छल होता जाता है। 
परखना नहीं चाहता है। 
कसता नहीं कसौटी पर.......  
बचपन का खेल ,उस.......
 रिश्ते को कहाँ परख पाता है ?
 आगे बढ़ने की होड़ ,
सब  दोस्तों संग सुहाता है।
इतने भोले मासूम ,निश्छल ,
बचपन को भूल नहीं पाता है। 
क्या और क्यों चाहिए ?
इस बचपन से वो...... 
 स्वयं ही नहीं समझ पाता है।
इसीलिए तो बचपन सुहाता है।
बचपन के संगी -साथियों को,
आज भी, भुला नहीं पाता है। 



 बड़े हसीन ,ज़माने थे ,
बचपन के वो दोस्त पुराने थे।
 
आज भी तन्हाइयों में आ जाते हैं। 
मुझे मेरे ,बचपन की याद दिलाते हैं।

सब स्मरण हो जाते हैं ,
कुछ पल के लिए ही सही ,
हम फिर से बच्चे बन जाते हैं।     
laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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