बचपन वो सीधा -साधा ,
भोला -भाला नजर आता है।
न कोई अपना ,न ही पराया ,
कुछ समझ नहीं आता है।
न कोई छल ,न ही कपट हो,
भी तो पहचान कहाँ पाता है ?
अपना ही निर्मल मन ,
सब कुछ निश्छल होता जाता है।
परखना नहीं चाहता है।
कसता नहीं कसौटी पर.......
बचपन का खेल ,उस.......
रिश्ते को कहाँ परख पाता है ?
आगे बढ़ने की होड़ ,
सब दोस्तों संग सुहाता है।
इतने भोले मासूम ,निश्छल ,
बचपन को भूल नहीं पाता है।
क्या और क्यों चाहिए ?
इस बचपन से वो......
स्वयं ही नहीं समझ पाता है।
इसीलिए तो बचपन सुहाता है।
बचपन के संगी -साथियों को,
आज भी, भुला नहीं पाता है।
बड़े हसीन ,ज़माने थे ,
बचपन के वो दोस्त पुराने थे।
आज भी तन्हाइयों में आ जाते हैं।
मुझे मेरे ,बचपन की याद दिलाते हैं।
सब स्मरण हो जाते हैं ,
कुछ पल के लिए ही सही ,
हम फिर से बच्चे बन जाते हैं।
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