सजा है ,इच्छाओं का अनंत संसार ,
टिमटिमाते तारे सी ,इच्छाएँ हैं अपार।
मन में ,विचारों में , कुलबुलाती हैं ,
मन के धरातल को.......
पुनः -पुनः चूमती जाती हैं।
चाहता हैं मन ,उन तारों को.........
अपने आँचल में समेट लेना ,
इच्छाएँ हैं कि.... बढ़ती ही जाती हैं।
कुछ की हत्या हो जाती है ,
कुछ गिनी नहीं जाती हैं।
इच्छाओं को समेटने में ,जीवन बीत जाता है।
कुछ इच्छाएँ पूर्णता को ले ,आगे बढ़ जाती है ,
कुछ अपनी बारी की प्रतीक्षा में हैं।
कुछ दरवाज़े पर देती दस्तक़ ,नज़र आती हैं।
जीवन !अपना सफ़र पूर्ण कर आगे बढ़ जाता है।
किन्तु कुछ इच्छाएं !समयाभाव में अपूर्ण रह जाती हैं।
