घर का तू !मान -सम्मान ,
अपने कुल की पहचान ,
घर और समाज की नीव ,
वो लड़ती है ,आगे बढ़ती है ,
भटक जाती है.......
पथरीली बेगानी राहों में ,
भूल जाती है ,अपनी डगर ,
चूक जाती है ,जिंदगानी में ,
भटक जाती है ,ग़ैर की बाहों में ,
खो जाती है ,बेगाने ख्वाबों में ,
बंट जाती है , टुकड़ों में ,
पहुंच जारी है ,''फ़्रिज 'में
अपने रिश्तों को झुठला ,
नफ़रत को प्यार समझने वाली ,
''वो लड़की ''छोड़ जाती है ,
अपनों को रोते - बिलखते ,
बस रही है ,किसी के संदेशों में ,
जो कहती है ,हर इक लड़की से ,
धोखा न खाना, बेगानों से,
रहना हमेशा साथ ,अपनों में ।
