मन चंचल है ,......कोई
योगी- मुनि नहीं हम ,
स्थिर मन हो ! जिनका ,
जिनकी लौ जली हो ,
अंतर् की.......
ऐसी रूह नहीं हम।
जीवन में ,अनेक लालसा ,
पूर्ण करने की चाह में ,
विचलित मन ,हैरान है।
परेशान है ,ललक है ,
आगे बढ़ने की ,
लहरों के ,उतर -चढाव सा ,
सुख -दुःख के अनजाने भय ,
से विचलित होता ये मन !