Asi bhi zindgi [ part 35]

नीलिमा अपने घर में आती है ,और अपने परिवार को उपहार देती है। सभी उसके आने से प्रसन्न हैं ,उसकी बहन चंद्रिका भी ,नीलिमा से मिलने ,वहीं आ जाती है। सभी प्रसन्न हैं किन्तु पापा ऐसे ही हैं ,अब नीलिमा पर इस बात का कोई असर नहीं पड़ता है क्योंकि पापा के इस व्यवहार की उसे आदत बन चुकी है और अब तो अपनी नई ज़िंदगी में बहुत ख़ुश है और अपनी ख़ुशियों में किसी भी तरह का विघ्न नहीं चाहती। धीरेन्द्र उसे लेने आने वाला है इसीलिए ,घर में खाने की सभी तैयारियाँ की हुई हैं। चंद्रिका अपन बहन के लिए खुश है  किन्तु मन ही मन उसे इस बात का भी दुःख है कि मैं अपनी छोटी बहन से कम रह गयी। चंद्रिका ने नीलिमा से पूछा -वहां किसी भी प्रकार की कोई ,परेशानी तो नहीं।



 

नहीं दीदी !मैं प्रसन्न हूँ।  अभी उसे परेशानियों का क्या मालूम होगा ?अभी तो उसने अपनी नई ज़िदगी में पदार्पण किया है। ज़िंदगी तो बहुत लम्बी है ,अपने घर से तो बेहतर ज़िंदगी जी रही है। 

घरवालों से विदा ले वो धीरेन्द्र के साथ गाड़ी में जा रही थी। प्रातः काल की ठंडक लिए वो भोर थी ,वो लोग रात्रि वहीं बिताकर ,तड़के ही उठकर निकल गए ,ताकि समय पर पहुंच सके। वो वातावरण बहुत ही खुशनुमा था। न हीं सड़कों पर किसी भी तरह का शोर -शराबा ,न ही धूल -मिटटी के गुब्बार , कहीं -कहीं चाय की दुकाने खुली थीं। नीलिमा ने गाड़ी की खिड़की  खोली हुई थी ,जब थोड़ी ठंड लगने लगी तो शॉल ओढ़ लिया किन्तु खिड़की बंद नहीं की। तभी अचानक से ,धीरेन्द्र से बोली -चलो गर्मागर्म चाय पीते हैं। 

धीरेन्द्र ने बाहर झांक कर देखा और बोला -यहाँ ....... कोई अच्छी सी जगह देखकर पीते हैं। 

नहीं ,मैंने सुना है ,कुल्हड़ की चाय ,बहुत ही स्वादिष्ट होती है ,क्या तुमने कभी कुल्हड़ में चाय पी है ?

नहीं ,

चलो तो आज दोनों मिलकर कुल्हड़ की चाय पीते हैं ,कहकर वो गाड़ी से बाहर आ गयी। उस दुकान के बराबर में ही एक ,टूटी सी बेंच पड़ी थी। देखने में तो वो गंदी लग रही थी किन्तु नीलिमा बैठ गयी किन्तु धीरेन्द्र वहां नहीं बैठा ,वो खड़ा रहा और वहां कार्य करते उन हाथों को देख रहा था जो चाय बनाने में मशगूल थे किन्तु धीरेन्द्र उसके चाय बनाने का तरीका नहीं देख रहा था। वो देख रहा था कि वो व्यक्ति स्वच्छता का कितना ख़्याल रख रहा है ?जब चाय ,बनकर आ गयी। तब आटे से बने कुछ बिस्किट भी निलिम ने लिए ,चाय बहुत ही स्वादिष्ट बनी थी। चाय वाले को ,पैसे देने के साथ -साथ उसकी प्रशंसा भी की। नीलिमा का मन अभी और घूमने का कर रहा था किन्तु गाड़ी में नहीं ,किन्तु अब किस बहाने से वो रुके ? तभी उसे दूर से कहीं मंदिर के घंटे की आवाज आई। 

उसने चायवाले से पूछा -यहाँ क्या आस -पास कोई मंदिर है ?

जी ,जहाँ आपने गाड़ी खड़ी की है ,उसी के पीछे गली में है।

वो मंदिर जाने लगी किन्तु धीरेन्द्र बोला -मुझे अपने ऑफिस भी जाना है ,जल्दी चलो !

ज़नाब आज आप कहाँ हैं ?आज तो रविवार है ,इसीलिए तो आपको बुलाया था। ताकि मस्ती कर सकें।

 धीरेन्द्र अब उसके समीप आकर बोला -मस्ती ही करनी थी तो पहले बतातीं ,मैं होटल बुक कर लेता। 

धत ! ऐसी मस्ती नहीं चलो !अब मंदिर के नज़दीक आये हैं तो दर्शन करके ही जायेंगे।

मंदिर के अंदर जाने से पहले ,वो धीरेन्द्र का हाथ पकड़ लेती है और आगे बढ़ जाती है। दर्शन करने के पश्चात ,वो मंदिर की परिक्रमा करती है। बाहर आते हुए ,उसे एक साधु ,पेड़ के नीचे बैठे दिखाई दिए  दिखाई दिए ,वो धीरेन्द्र का हाथ पकड़कर उधर ही चली। आज वो धीरेन्द्र को किसी बच्चे की तरह हर जगह खींचकर ले जा रही थी। अपने परिवार से भी मिल ली और साथ में पति है ,पापा का भी अब इतना भय  नहीं रहा। वो साधु बाबा के समीप आकर बैठ गयी। वो आँखें मूंदे बैठे थे , उनकी  बंद पलकों को देखकर उसे निराशा हुई ,शायद उसका आना विफ़ल गया। उसने धीरेन्द्र की तरफ देखा ,उसने इशारे से चलने का इशारा किया। वो उठकर चलने ही वाली थी ,बाबा ने आँखें खोल दीं ,बोले -बहुत जल्दी में  हो। 

नहीं बाबा ! वो आप अपनी भक्ति में लीन थे , हम आपकी पूजा में व्यवधान डालना नहीं चाहते थे। 

बाबा उसके चेहरे को देख रहे थे ,बोले -बेटी तुम्हारे चेहरे पर सच्चाई का तेज़ है किन्तु ये कब तक ठहरता है ? ये तो तुम्हारे ऊपर निर्भर हैं। खुशियां मिली हैं ,उनका स्वागत करो किन्तु समय बदलते देर नहीं लगती।तुम्हें अभी और मजबूत होना होगा। ज़िंदगी कब ,क्या रंग दिखा दे ?कब किस्मत का पलड़ा पलट जाये कोई कुछ नहीं कह सकता। न जाने कितने राज़ खुलेंगे ? जो ज़िंदगी दिखाई देती है , ऐसी नहीं होती। तुम अपनी सच्चाई पर डटे रहना। बहुत परिश्रम करना पड़ सकता है ,अकेली पड़ जाओगी ,तुम्हें धैर्य से काम लेना  होगा। 

उनकी बातें सुनकर ,नीलिमा के चेहरे की प्रसन्नता गायब हो गयी किन्तु बाबा के समीप ही बैठी रही और बोली -बाबा ,कैसी परेशानी आ सकती है ?

घबराने की आवश्यकता नहीं ,ज़िंदगी में अभी प्रवेश ही किया है , ख़ुशी से जिओ ! किन्तु साहस नहीं छोड़ना। साहस और धैर्य ही तुम्हारा साथ देगा। ये दुनिया आनी है ,जानी है , इस दुनिया का डटकर मुकाबला करना  है। मेरा आशीर्वाद है ,ज़िंदगी में सफल हो। 

नीलिमा ने महसूस किया ,बाबा ने धीरेन्द्र को आशीर्वाद नहीं दिया। नीलिमा ने धीरेन्द्र से भी ,आगे बढ़कर ,उनसे आशीर्वाद लेने के लिए कहा ,नीलिमा के कहने पर वो आगे बढ़ा - बाबा ने दूर से ही ,खुश रहो !कहकर आशीर्वाद दिया। 


मंदिर से बाहर आते समय ,नीलिमा के चेहरे पर नक़ली मुस्कुराहट थी ,क्योंकि बाबा के शब्द ,अभी भी उसके कानों में गूँज रहे थे। जिनका अर्थ वो समझते हुए भी समझ नहीं पा रही थी ,कोई अनजाना सा  भय उसके अंदर समाहित हो चुका था। मन ही मन , उसका मन अनेक प्रश्नों से जूझ रहा था किन्तु उसके इन प्रश्नों का जबाब भविष्य के गर्भ में छिपा था। गाड़ी में बैठकर ,उसकी चंचलता कहीं गुम हो चुकी थी। जो धीरेन्द्र को ख़ल रही थी। धीरेन्द्र बोला -तुम्हें मंदिर जाने की क्या आवश्यकता थी ?

ये क्या बात हुई ?किसी भी बात के ड़र से ,हम मंदिर जाना या किसी अन्य स्थान पर जाना तो नहीं छोड़ सकते। हमें अभी ये भी तो नहीं मालूम बाबा का इस तरह कहना ,उसके पीछे उनकी क्या मंशा है ?वो क्या कहना चाहते हैं ,अभी हमारी समझ से बाहर है। नीलिमा ने धीरेन्द्र को समझाया।   

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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