Maryada purushottam ram

राम -राम बहनों और दोस्तों ! दीपावली की शुभकामनाओं के साथ ,आज हम अपनी चर्चा आरम्भ करते हैं।जी हाँ ,दीपावली पर ''मर्यादा पुरुषोत्तम राम '' चौदह वर्ष का वनवास पूर्ण करके अपने राज्य अयोध्या में वापस आये थे। जी हाँ ,भगवान राम ,पुरुषोत्तम राम ,सीता के राम ,दशरथ के बेटे श्री राम ,कौशल्या नंदन राम की ही हम चर्चा करने जा रहे हैं। कहते हैं -राम शब्द बोलने और मनन करने से ही ,आदमी भवसागर पार कर  जाता है। राम को मर्यादा पुरुषोत्तम क्यों कहा जाता है ?क्योकि उन्होंने अपने जीवन में कभी भी मर्यादा का उललंघन नहीं किया। गुरु की आज्ञा मान ,राक्षसों को मारा ,पिता की आज्ञा से वनवास चले गए ,अपने पिता की बात का मान रखा। आदर्श पुत्र ,पति और भाई बनकर रहे। राजा के पुत्र होते हुए भी ,उनके अंदर तनिक भी अहंकार नहीं था। साधारण मानवों से भी प्रेमपूर्ण व्यवहार करते थे। जैसे -मल्लाह केवट और भीलनी शबरी ,जिसकी भक्ति देखकर , उन्होंने उसके झूठे बेर भी खाये।  अपने जीवन में अनेक कठिनाई देखीं किन्तु सभी परिस्थितियों का सामान्य जनों की भाँति  सामना किया।



 

कहते हैं -राम को भगवान विष्णु का अवतार माना  जाता है , विष्णु का अवतार होने के बावजूद भी ,सामान्य जनों की भांति उन्होंने जीवन यापन किया। पत्नी सीता के बिछुड़ जाने पर ,आम आदमी की तरह उनके वैराग्य में रोये और उनकी खोज प्रारम्भ की। कहते हैं -राम से बड़ी  तो राम के नाम में शक्ति थी। तभी उनके नाम के पत्थर समुन्द्र में तैरने लगे। उन्होंने अपने जीवन में किसी को भी छोटा नहीं माना। यहाँ तक कि उनकी सेना में वानर और जामवंत रीछ जैसे जानवर भी थे। 

राम एक नाम ही नहीं ,उन्होंने अपने कर्मों द्वारा भी ,अपने को राम साबित किया है। वो साहस ,शौर्य ,शांति और  ,समाज के नियमो को मानकर चलने वाले थे। तभी तो ,उन्होंने एक धोबी के कहने पर ही ,अपनी गर्भवती पत्नी का त्याग कर दिया। एक राजा होकर भी ,उन्होंने मानव जीवन के सभी कर्तव्यों को पूर्ण किया। क्षत्रिय कुल में जन्म लेने के पश्चात भी ,अपने कर्त्तव्यों का ,मर्यादा में रहकर पालन किया। राजा होने के बावजूद भी वैरागी जैसा जीवन और उनकी सोच थी। जब राजा बन रहे थे ,तब न ही अत्यधिक प्रसन्नता थी और जब पिता की आज्ञानुसार वनवास गए ,न ही दुःख था। इसीलिए मानवों में वो श्रेष्ठ माने जाते हैं। क्योकि साधारण मानव पर, हर परिस्थिति का प्रभाव पड़ता है किन्तु वे हर सुख में दुःख में सामान्य रहे ,हर कठिनाई को सामान्य जनों की तरह झेला। इतना होने पर भी ,वो किसी की भी सहायता से पीछे नहीं रहे। कभी राजकुमार होने का भी दम्भ नहीं दिखाया।

ये बात तो दीदी आप सही कह रहीं हैं ,सबसे बड़ी बात -'' जिस समय पर एक राजा कई -कई रानियाँ रख सकता था ,उस समय भी ,उन्होंने एक पत्नी व्रत धारण किया। स्वयं उनके पिता  राजा दशरथ के तीन रानियां थीं ,उन्होंने अपने जीवन को मर्यादाओं में रखा, कीर्ति बोली।

वो चाहते तो, एक ही तीर में ,सागर की सुखा सकते थे किन्तु समुद्र से विनम्र प्रार्थना की। मानव जीवन में रहकर मानव की प्रत्येक सीमाओं का कभी भी उललंघन नहीं किया। शक्तिशाली होकर भी ,कभी अपनी मर्यादाओं का त्याग नहीं किया ,उस शक्ति का दूसरों की रक्षा के लिए उपयोग किया रेनू ने भी अपने ज्ञान का परिचय देते हुए कहा। 

शबरी तो भील जाति  की थी ,केवट एक मल्लाह था ,इससे पता चलता है कि वो जाति -पाती के भेदभाव को भी नहीं मानते  थे, रेखा बोली। 

वो चाहते तो, वनवास नहीं जा सकते थे ,आज के बच्चों की तरह कह देते ,माँ से ये वायदा मैंने नहीं किया पिता ने किया है ,मैं क्यों राजभोग छोड़कर वनों में भटकूँ ?किन्तु पिता का दिया वचन ,उन्होंने निभाया। 

नारी का अपमान करने वाला मृत्यु दंड का भागीदार हो जाता है ,ये भी उनके चरित्र को पढ़ने पर पता चलता है ,तभी तो भाई की पत्नी पर जबरदस्ती अधिकार दिखाने के कारण ,स्वयं उनकी पत्नी का अपहरण करने पर ,बाली और रावण को मृत्यु को प्राप्त होना पड़ा नंदिनी बोली। 

आजकल !जैसे लोग समाज की ,अपने बड़ों की बात का मान नहीं रखते और  समाज की परवाह नहीं करते ,तब उन्होंने समाज के महत्व को भी दर्शाया कि जिस समाज में हम रह  रहे हैं या जिस समाज का हम हिस्सा हैं ,उसके नियमों को भी मानना  आवश्यक है क्योंकि समाज भी तो हम जैसे लोगों से मिलकर ही बना है। उस समाज की हम भी एक इकाई हैं ,और उस समाज के क़ायदों को मानना हमारा ,कर्त्तव्य बनता है चाहे वो राजा हो या फिर कोई आम इंसान। 

राम कोई साधारण इंसान नहीं थे ,उनमें असामान्य और अद्भुत शक्तियां भी थीं किन्तु उन्होंने कभी भी उन शक्तियों का व्यर्थ प्रदर्शन नहीं किया और समय आने पर ,उनका उपयोग भी किया ,जैसे कि अहिल्या को उसके शाप से मुक्त किया ,इतना बड़ा और शक्तिशाली  शिव धनुष तोडा।



  

जी हाँ ,रामचंद्र जी में अद्भुत शक्ति ,साहस ,बुद्धि की कमी नहीं थी ,न ही धन ऐश्वर्य की ,तब भी ,उन्होंने अपने जीवनकाल में ,कभी भी अपनी शक्तियों का दुरूपयोग नहीं किया और एक वैरागी  की तरह जीवन व्यतीत किया। तभी तो उनके नाम में इतनी शक्ति है ,कि राम -राम को मरा -मरा जपने से रत्नाकर डाकू  भी महर्षि  वाल्मीकि जी बन गए ,जिन्होंने रामायण की रचना कर डाली।  

 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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