क्रोधावेग में ,वो जलती रही ,
धधकती रही ,ज्वालामुखी सी।
उसका क्रोध इस जीवन पर था।
इस जीवन के राहगीरों पर था।
जो उसके 'प्रेम ,विश्वास ,माधुर्य
को धोखा दे ,छलते रहे......
छीन लेना चाहते थे,
उसके बालमन की चंचलता को.....
क्रोध आता था विश्वासघातियों पर ,
भड़क उठती थी ,वो मशाल सी।
क्रोध उसका , दिखता सभी को ,
जाना नहीं ,किसी ने उसके मन को ,
क्यों चली अंगारों पर ?
ये तान उसने क्यों ली ?
माना कि ,क्रोध स्वयं को जलाता है।
क्रोध न करे ,तो इंसान ही इंसान को खा जाता है।
इंसानियत का जामा पहने ,बहुत ऐसे बैठे हैं ,
नाजुक़ कली को मसलने को रहते हैं।
क्रोध उसका स्वभाव नहीं ,
उसका शस्त्र है ,बचाव है,उसके मन की पीड़ा है।
