नमस्कार बहनों और दोस्तों ! कुछ समझ नहीं आता कैसे और क्या बताएं ?कभी लेखन कार्य के लिए आगे बढ़े ,तब घर में इसका विरोध हुआ ,ये भी कोई कार्य है। ये शौक तो पूर्ण हो सकते हैं किन्तु पेट नहीं भर सकता। हमने भी कई लेखक, कवि पढ़े जिनकी ज़िंदगी गरीबी में ही बीत गयी ,उनकी मृत्यु के पश्चात ,उनका ''काव्य संग्रह '' सराहा गया या फिर वो लोगों की नजर में उच्च साहित्यकार बने। घर के तमाम विरोध के बावजूद ,हमने अपने मन की सुनी ,उसकी कुलबुलाहट को महसूस किया। हमारे सामने ,ऐसा भी कोई प्रश्न नहीं था कि घर के खर्चे कैसे चलेंगे ?या हम पर कोई पारिवारिक ज़िम्मेदारी भी नहीं थी। हमने छुप -छुपकर भी लिखना नहीं छोड़ा। साहित्य पढ़ा ,लोगों को जाना ,विचार सुने , उनके व्यवहार को परखा ,किन्तु हममें इतना साहस नहीं, कि कह सकें ,हम स्वतंत्र रूप से लिखना चाहते हैं ,किन्तु कहते हैं न -फूल की खुशबू छुपाये नहीं छुपती ''इसी तरह हमारे कुछ लेख जिन्होंने भी पढ़े ,सराहे।
अब तो हम मैदान में आ गए ,और अपने लेख ,कहानी ,अन्य रचनाएँ लिखने लगे।
मेरे तो कुछ काव्य छपे भी ,सराहना भी मिली। बस यहीं तक सीमित होकर रह गये ,किसी ने कहा -ये समझदारी भरी बातें ,कौन पढ़ता है ? कुछ चटपटा ,मसालेदार लिखिए ! निशा ने अपना दर्द बयाँ किया।
ऐसा कुछ जो दिल को छू जाये ,किन्तु उसके पश्चात क्या ? सबको मेरी कहानियाँ लुभाती तो हैं प्रशंसा भी मिलती है किन्तु भीड़ नहीं ,नंदिनी ने अपना दर्द बयान किया।
इसी कारण दीदी मैंने तो अपने ,लेखन में जिससे मुझे सुकून मिलता था ,उससे हटकर ड़रावनी ,भूतिया कहानी लिखी ताकि लोग इसके आकर्षण में आकर ,अन्य रचनाओं पर भी दृष्टि डालें। अब तो प्रतियोगिता ही बहुत हो गयी। मैंने देखा है ,जिनकी हिंदी भी ठीक से नहीं ,वो यदि लिख दें ,''बालिगों के लिए '' भीड़ जुट जाती है ,फिर चाहे कहानी में कुछ हो या नहीं, टीना बोली।
अरे तनु ,ये तो कुछ भी नहीं ,लोग तो चुपचाप आते हैं और एक या दो स्टार देकर चलते बनते हैं ,कुछ समीक्षा दें ,तब पता भी चले, कि उन्हें क्या सही नहीं लगा ?बस रेटिंग कम करने से मतलब है ,जैसे अपनी खुन्नस निकाल रहे हों। पता नहीं ,कैसे -कैसे समय निकालकर हम लिखते हैं ?और उन्हें तनिक भी समय नहीं लगता ये सब करने में।
अरे यार ! ये तो कुछ भी नहीं ,लोगों को तो लाइक करते भी जोर पड़ता है ,जैसे ये लाइक उनकी जेब से निकल रहा हो।
तुम्हें तो नंदिनी हमें बधाई देनी थी ,तुम्हारी क़िताब छप गयी। अब तो खुश हो !
काहें की ख़ुशी दीदी ! अपनी पुस्तक छपने पर ,अपनी ही जेब से पैसे देने पड़े और नहीं बिकी तो डूब गए। मुफ़्त में तो ,भीड़ मिल जाती है ,किन्तु पैसों के नाम पर........
नहीं यार ! ऐसा भी नहीं है , कुछ लोग तो बहुत कमा रहे हैं।
बस वो ही कमा रहे हैं ,जो पहले से ही प्रसिद्ध हो चुके हैं और मसालेदार लिखते हैं। अब हम भी तो लिखते हैं ,मेहनत तो हम भी कर रहे हैं। कुछ लेखकों को छोड़कर ,अभी भी संघर्ष ही कर रहे हैं।
अब हम ये तो नहीं कह सकते ,किसको क्या पसंद आता है ? किसी पर अपनी सोच भी नहीं थोप सकते ,हम लिखते तो आत्मतुष्टि के लिए ही हैं किन्तु ये भी चाहते हैं ,कि कोई पढ़े !आगे बढ़ना कौन नहीं चाहता ?जिस लेखन में हम अपना समय दे रहे हैं ,तब एक उम्मीद बन जाती है किन्तु आज का लेख़क आज भी शायद संघर्षरत है ,इससे इतनी आमदनी भी नहीं कि वो अपने महीने के ''वाई -फाई ''का खर्चा भी निकाल सके।
उनकी बात सुनकर ,सभी हँस दीं।
चलो जी ! आज की चर्चा यहीं समाप्त करते हैं ,पढ़ते रहिये ,खुश रहिये !धन्यवाद !
