Kshnikayen

 ज़िंदगी का चौराहा -

ज़िंदगी के चौराहे पर , मिले  मुसाफिर अनेक !

किस डगर जाऊँ ?चार रास्ते !डगर जाना है एक !

चौराहे पर मिले ,अच्छे -बुरे और नेक !

 मिल जाते हैं ,लोग अनेक ! किन्तु डगर सभी की एक !



कलम कटार -

माना कि ,समय आने पर ,

ये कलम कटार बन जाती है। 

दर्द भरे ,दिलों पर ,मरहम भी यही लगाती है। 

ये सब विचारों का खेल है ,दोस्तों !

जिसके हाथ लग जाती है ,

वैसा ही खेल दिखाती है। 


मील का पत्थर -

हज़ारों मील दूरी तय कराते हैं। 

हर मंजिल का पता बताते हैं। 

वो मील का पत्थर...... 

कल भी वहीं था ,

आज भी वहीं है। 


घर की मुर्गी -

ज़िंदगी में जब तक हम न थे ,

तब उन्हें 'परवाह 'थी हमारी ,

ज़िंदगी में आते ही ,वो..... 

लापरवाह हो गए।

बेपरवाह इश्क़ -

इश्क़ की बेपरवाही तो देखिये !

हम उसके साथ होकर भी ,साथ नहीं हैं। 

सामने होकर भी ,वो नजरंदाज किये जाते हैं  

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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