ज़िंदगी का चौराहा -
ज़िंदगी के चौराहे पर , मिले मुसाफिर अनेक !
किस डगर जाऊँ ?चार रास्ते !डगर जाना है एक !
चौराहे पर मिले ,अच्छे -बुरे और नेक !
मिल जाते हैं ,लोग अनेक ! किन्तु डगर सभी की एक !
कलम कटार -
माना कि ,समय आने पर ,
ये कलम कटार बन जाती है।
दर्द भरे ,दिलों पर ,मरहम भी यही लगाती है।
ये सब विचारों का खेल है ,दोस्तों !
जिसके हाथ लग जाती है ,
वैसा ही खेल दिखाती है।
मील का पत्थर -
हज़ारों मील दूरी तय कराते हैं।
हर मंजिल का पता बताते हैं।
वो मील का पत्थर......
कल भी वहीं था ,
आज भी वहीं है।
घर की मुर्गी -
ज़िंदगी में जब तक हम न थे ,
तब उन्हें 'परवाह 'थी हमारी ,
ज़िंदगी में आते ही ,वो.....
लापरवाह हो गए।
बेपरवाह इश्क़ -
इश्क़ की बेपरवाही तो देखिये !
हम उसके साथ होकर भी ,साथ नहीं हैं।
सामने होकर भी ,वो नजरंदाज किये जाते हैं
