कलम मेरी.... न ही चैन से.....
रहती है ,न ही रहने देती है।
दिखा नहीं ,सुना नहीं ,
किसी का दर्द बेचैन हो उठती है।
भाव मेरे ,विचार मेरे...... ,
किन्तु कलम की ताकत बढ़ जाती है।
डरना तो जैसे ,उसने सीखा ही नहीं ,
गलत को गलत ,सही को सही कह जाती है।
जब तक न उठा लूँ ,बेचैन करती जाती है।
लिखती है ,एक माँ का दर्द...... ,
एक बहन की राखी लिखती है।
लिखती है ,भावों को...... !
ख़ुशियों को लिखती जाती है।
त्यौहार मनाती और सिखलाती है ,कभी -कभी !
दर्द से बेचैन हो ,मौत का ग़म भी लिखती है।
ये इतनी ताकतवर है....... ,
छोटी होने पर भी ,शूल बन जाती है।
अर्ध रात्रि को उठा ,लिखने लग जाती है।
मैं थक जाती हूँ ,कभी -कभी ! ये चलती ही जाती है।
