दिल से.......
संजीदगी से किया गया,इश्क़...
हो सकता है, कैसे ?बेपरवाह !
छोड़ सकता है ,कैसे ?
उसका हाथ अपने हाथों से ,
इश्क़ ! हो सकता है।
बेबस ,लाचार
बेपरवाह नहीं ,
इश्क़ !दर्द देता है ,
नींदें ,उडाता है ,
बेचैन ,करता है।
जलता है ,घुटता है ,
पाना चाहता है।
अपनी उस मंजिल को !
पता पूछता है।
उस रहनुमा का !
ख्यालों में ,बेचैनियों में ,
ढूढंता है ,उस ख़्याल को !
संजीदगी से ,तराशता है।
उससे जुड़े ख्यालों को !
पा लेना चाहता है ,
उसके ख्वाबों को !
ज़िंदगी को जोड़ता है ,
उसके हर ग़म ,ख़ुशी से !
ये बेपरवाही नहीं ,
ये इश्क़ की पराकाष्ठा है।
